इच्छाओं से भी कीजिए संवाद

 एस.पी जैन

इच्छा की जन्म स्थली मन है। मन ही मनुष्य को पशु.पक्षियों से भिन्न करता है। इच्छा हमेशा लोभ के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करती है, इसीलिए कहा गया हैं .लोभ पाप का मूल है क्योंकि इसी के वशीभूत होकर इंसान से अनुचितए गैर सैद्धान्तिक और अन्याय पूर्ण कार्य हो जाते हैं।ये भविष्य में दुःख का कारण बनते हैं। अर्थशास्त्र कहता है, एक इच्छा दूसरी इच्छा को जन्म देती हैए परन्तु साथ.साथ हमारी शिक्षा और हमारा ज्ञान हमें प्रेरित भी करता है, ये इच्छाएं हमारे लिए कितनी आवश्यक हैं। जहन में यह सवाल बार-बार कौंधता है, क्या इनकी पूर्ति के लिए इंसान को कोई असंवैधानिक और अनैतिक कार्य तो नहीं करना पड़ रहा है। सच यह है, मनुष्य को इच्छाओं का गुलाम नहीं होना चाहिए। ऐसे में इच्छाओं पर नियंत्रण होना आवश्यक है। जिस प्रकार घोड़े की लगाम जब तक हाथ में होती है हम सुरक्षित हैं। बेलगाम होते ही दुर्घटना निश्चित है। ठीक उसी प्रकार इच्छाएं अगर हमारे मन पर हावी हो जाएं तो हमारा कष्टों के भंवर में फंस जाना निश्चित है।

इच्छा का महत्वपूर्ण दोष आदत में परिवर्तित हो जाना है। यह इंसान के लिए पीड़ादायक हो जाता है, क्योंकि आदत मनुष्य की कमजोरी होती है। प्रायः लोगों की धारणा हैए इच्छा का दमन होना चाहिए परन्तु यह सर्वथा सही मार्ग नहीं है, क्योंकि अगर इसका दमन किया जाता है तो थोडे़ अन्तराल के उपरान्त पुनः तीव्रता से जागृत हो जाती है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार अगर किसी गेंद को दीवार पर जिस तीव्रता से फेंकी जाएगीए तो वह वापस उससे ज्यादा तीव्रता से आएगी। अतः इच्छा जागृत होने पर उसे दमन न करके उससे संवाद किया जाए तो परिणाम सकारात्मक निकलेगा। उदाहरणतः अगर शराब, सिगरेट पीने की इच्छा है तो हमारा संवाद होना चाहिए। शराब, सिगरेट पीने से क्या फायदा या क्या नुकसान है, हो सकता हैं, फायदा थोड़ी देर का आनन्द दें, परन्तु नुकसान हमें आर्थिक, सामाजिक,आध्यात्मिक,शारीरिक दृष्टि से देखना होगा। यह स्थायी भी हो सकता है। विभिन्न असाध्य रोगों का निमंत्रणए गंदी आदतों का शिकार, सीमित साधन वालों के आर्थिक बोझ, कर्ज की आदत, अंधकारमय भविष्य इत्यादि शिक्षा और ज्ञान की कसौटी पर हम इसे परखेंगे तो नुकसान के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं। शायद हम इस इच्छाओं को आदत बनने से रोक पायेंगे और अपने और परिवार के ऊपर परोपकार कर स्वर्णिम भविष्य की कल्पना कर पाएंगे।

अगर एक साधारण व्यक्ति अपने जीवन में शराब, सिगरेट, तम्बाकू व्यसन जैसी इच्छाओं पर नियंत्रण रख पाता है तो उसे अपने जीवन काल में बच्चों की पढ़ाई, विवाह इत्यादि में असुविधाओं का सामना नहीं करना पड़ेगा। कहा भी जाता हैं, वर्तमान की बचत, भविष्य की कमाई । कभी.कभी यह भी होता है कि एक सम्पन्न व्यक्ति असीमित साधनों के अभिमान में अनेक अवांछित इच्छाओं का गुलाम हो जाता है। अनजाने में अपना भविष्य कष्टदायक बना डालता है। समाज में अनेक उदाहरण है, जिसमें राजा को रंक बनते देखा गया है। जब उनकी इच्छाएं परछाई की भांति उनका पीछा नहीं छोड़ती तो उनकी असहनीय वेदना वे ही समझ पाते हैं। यह कहना उचित नहीं होगा कि इच्छाएं अच्छी नहीं होती हैं। सकारात्मक इच्छाएं सदैव लाभप्रद होती हैं। अगर हमारे मन में इच्छा जागृत होती हैं कि गरीब बच्चों को पुस्तकें दी जाएं। अनाथालय में बच्चों को भोजन कराया जाए। अस्पताल में दवाइयों के जरिए मरीजों की मदद की जाए। ठंड में गरीब को कंबल दिए जाएं तो यह हमारा सौभाग्य होगा कि हमारे मन के अन्तर्गत ऐसी पवित्र इच्छाओं का जागरण हुआ, जो न केवल हमारे सुंदर भविष्य अपितु हमारे कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती हैं। हर समय हमारे मन में कभी-कभी अनावश्यक इच्छाएं भी जागृत होती रहती हैं। इसका प्रमुख कारण.इंसान के इर्द.गिर्द समाज का कृत्रिम आडम्बर है। हम भी नकल करना चाहते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं, हमारा आर्थिक अस्तित्व कितना मजबूत है। परिवारजनों की इच्छाओं को पूर्ण करना हमारा कर्तव्य भी है और धर्म भी है, परन्तु साथ-साथ हमें भी याद रखना कि रोटी बनाते.बनाते हमारे हाथ ही न जल जाएं। शिक्षा के जरिए हमने जो ज्ञान प्राप्त किया है, उसके माध्यम से अपनी इच्छाओं को कुम्भकरण की मानिंद सुस्तावस्था में रखना, सिद्धान्तों को सम्मान देना, भविष्य के प्रति सचेत रहना हमारा नैतिक कर्तव्य है।

(लेखक तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी में निदेशक एडमिशंस हैं)

 

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