कामकाजी महिलाओं का यौन उत्पीड़न

सावधानी ही सुरक्षा

बाल मुकुन्द ओझा

आज आजादी के 74 सालों बाद भी भारत में महिलाओं की स्थिति संतोषजनक नही कही जा सकती। कार्यस्थल पर कामकाजी महिलाओं को जबरन परेशान करना, उनके साथ अश्लील बातें करना और छेड़छाड़ करना, शरीर को छूने का प्रयास करना, गंदे इशारे करना आदि जैसे कृत्य यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आते हैं। यौन उत्पीड़न केवल शारीरिक छेड़छाड़ तक ही सीमित नहीं है। यह मौखिक तौर भी हो सकता है जिसमें सेक्सुअल कॉमेंट्स, सेक्सुअल जोक्स और नारी विरोधी हास्य हो सकता है। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न कामकाजी महिलाओं के लिए एक आम समस्या है. देश में हर दिन किसी न किसी दफ्तर में कोई न कोई महिला इस समस्या से सामना करती है। एक अध्ययन रिपोर्ट के अंसार देश में कार्यस्थलों पर हर 10वीं महिला को किसी न किसी रूप में यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। आश्चर्य की बात तो यह है की कानून बनने के बाद भी ऐसी शिकायतें करने वाली ज्यादातर महिलाओं के कार्यस्थल पर आंतरिक शिकायत समिति भी नहीं थी।
कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न, लैंगिक समानता, जीवन और स्वतंत्रता को लेकर महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन है। कार्यस्थल पर महिलाओं के लिए अनुरूप वातावरण न होने की स्थिति में उनके लिए वहां कार्य करना मुश्किल हो जाता है और अगर ऐसे में यौन उत्पीड़न होता है तो महिलाओं की भागीदारी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस वजह से, देश की महिलाओं आर्थिक सशक्तिकरण और उनके समावेशी विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव होता है।कामकाजी महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न पर कई बार देश की सर्वोच्च अदालत ने सख्त रुख अपनाया है मगर इसके बावजूद ये खबरें मीडिया में अभी भी सुर्खिया लिए हुए है। यौन उत्पीड़न को लेकर देशभर से रोजाना अलग-अलग खबरें सामने आती रहती हैं। महिलाओं की सुरक्षा के तमाम दावों और वादों के बाद भी उनकी हालत जस की तस है। रोज दुष्कर्म, छेड़छाड़, घरेलू हिंसा और अत्याचार से रूबरू होती है हमारे देश की महिलाएं। इसी बीच ट्रेनों और रेल परिसरों में महिलाओं से बलात्कार और छेड़छाड़ की दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है।
समाज के नजरिए में भी महिलाओं के प्रति अब तक कोई खास बदलाव देखने को नहीं मिला है। यौन अपराध चिंताजनक रफ्तार से बढ़ रहे हैं। पिछले चार दशकों में अन्य अपराधों की तुलना में रेप की संख्या में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी हुई है और दोषियों को सजा देने के मामले में हम सबसे पीछे हैं।
आजकल प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न और छेड़छाड़ की खबर रोज दिखाई जाती है परंतु इसकी रोकथाम के उपाय पर चर्चा कहीं नहीं होती है। इस तरह के अत्याचार कब रुकेंगें। क्या हम सिर्फ मूक दर्शक बन खुद की बारी का इंतजार करेंगे। लड़कियों पर अत्याचार पहले भी हो रहे थे और आज भी हो रहे हैं अगर इसके रोकने के कोई ठोस उपाय नहीं किये गये। आज भी हमारे समाज में बलात्कारी सीना ताने खुले आम घूमता है और बेकसूर पीड़ित लड़की को बुरी और अपमानित नजरों से देखा जाता है । न तो समाज अपनी जिम्मेदारी का माकूल निर्वहन कर रहा है और न ही सरकार। ऐसे में बालिका कैसे अपने को सुरक्षित महसूस करेगी यह हम सब के लिए बेहद चिंता की बात है। कामकाजी महिलाओं को सुरक्षित घर पहुँचने की चिंता सताने लगती है। देश में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में कमी नहीं आरही है। भारत में आए दिन महिलाएं यौन उत्पीड़न और अत्याचारों का शिकार हो रही हैं। घर से लेकर सड़क तक कहीं भी महिला सुरक्षित नहीं है।
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

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