चुनावी सर्वे कितना खर्रा कितना खोटा

बाल मुकुंद ओझा

चुनाव आते ही सर्वेक्षणों की बहार भी आ जाती है। चुनाव के दौरान निर्वाचकों और मतदाताओं से बातचीत कर विभिन्न राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों की जीत हार के पूर्वानुमानों के आकलन की प्रक्रिया चुनावी सर्वे कहलाती है। मुख्य तौर पर ओपिनियन पोल सर्वे चलन में है। इसमें क्वेश्चनॉयर तैयार कर सर्वे टीम घर-घर जाती है। बाद में वोटर्स के जवाब के आधार पर परिणाम निकाला जाता है।
चुनावी सर्वे कराए जाने की शुरुआत दुनिया में सर्वप्रथम अमेरिका में हुई थी। अमेरिकी सरकार के कामकाज पर लोगों की राय जानने के लिए जॉर्ज गैलप और क्लॉड रोबिंसन ने इस विधा को अपनाया, जिन्हें ओपिनियन पोल सर्वे का जनक माना जाता है। भारत में वर्ष 1960 में ही चुनाव पूर्व सर्वे का खाका खींच दिया गया था। तब ‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज’ (सीएसडीएस) द्वारा इसे तैयार किया गया था। भारत में एग्जिट पोल की शुरूआत का श्रेय इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ पब्लिक ओपिनियन के प्रमुख एरिक डी कोस्टा को दिया जाता है, जिन्हें चुनाव के दौरान इस विधा द्वारा जनता के मिजाज को परखने वाला पहला व्यक्ति माना जाता है। चुनाव के दौरान इस प्रकार के सर्वे के माध्यम से जनता के रूख को जानने का काम सबसे पहले एरिक डी कोस्टा ने ही किया था। शुरूआत में देश में सबसे पहले इन्हें पत्रिकाओं के माध्यम से प्रकाशित किया गया जबकि बड़े पर्दे पर चुनावी सर्वेक्षणों ने 1996 में उस समय दस्तक दी, जब दूरदर्शन ने सीएसडीएस को देशभर में एग्जिट पोल कराने के लिए अनुमति प्रदान की। 1998 में चुनाव पूर्व सर्वे अधिकांश टीवी चौनलों पर प्रसारित किए गए और तब ये बहुत लोकप्रिय हुए थे लेकिन कुछ राजनीतिक दलों द्वारा इन पर प्रतिबंध लगाए जाने की मांग पर 1999 में चुनाव आयोग द्वारा ओपिनियन पोल तथा एग्जिट पोल पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। तत्पश्चात् एक अखबार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के फैसले को निरस्त कर दिया।
एक बड़े न्यूज चैनल के हालिया सर्वे के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज भी देश के सबसे लोकप्रिय नेता बने हुए है। मोदी के आस पास भी कोई नेता नहीं फटक रहा है। पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, असम और पुदुचेरी में इस साल विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। सर्वे एजेंसियां भी इस दौरान सक्रीय हो गयी है इनमें सी वोटर जैसी नामी गिरामी एजेंसी भी शामिल है। कई बार सर्वे सटीक बैठता है तो कई बार सर्वे मन माफिक नहीं होता। फिर भी लोग सर्वे को पसंद करते है।
इस साल बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुदुचेरी में विधानसभा चुनाव होने जा रहे है। देश का ध्यान इन्हीं राज्यों के चुनाव परिणामों पर टिका है। एबीपी ने सी वोटर के जरिये कराये सर्वे में बंगाल में ममता दीदी के तृणमूल कांग्रेस की सत्ता में वापसी की भविष्यवाणी की है। तमिलनाडु में डीएमके और पुदुचेरी में एनडीए के सत्ता में काबिज होने की बात कही है। असम में भाजपा और केरल में वामपंथियों के वापस आने की बात कही है। इसके बावजूद एक बात बिलकुल सटीक कही गयी है की नरेंद्र मोदी की बादशाहत अभी भी ज्यों की त्यों कायम है और उनका जादू मतदाताओं पर सिर चढ़कर बोल रहा है।
हमारे देश में दो चीजों का विकास करीब-करीब एक साथ ही हुआ है। पहला इन चुनावी सर्वेक्षणों और दूसरा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या कहें समाचार चैनलों का। समाचार चैनलों की भारी भीड़ ने चुनावी सर्वेक्षणों को पिछले दो दशक से हर चुनाव के समय का अपरिहार्य बना दिया है। आज बिना इन सर्वेक्षणों के भारत में चुनावों की कल्पना भी नहीं की जाती। बल्कि कुछ समाचार चैनल तो साल में कई बार ऐसे सर्वेक्षण करवाते हैं और इसके जरिये सरकारों की लोकप्रियता और समाज को प्रभावित करने वाले मुद्दों की पड़ताल करते रहते हैं। ऐसे में यह जानना दिलचस्प है कि आखिर भारत में इन सर्वेक्षणों का अर्थशास्त्र क्या है? आखिर इन सर्वेक्षणों को करवाने से किसका भला होता है।
टीवी चैनल टीआरपी के चक्कर में अपनी लोकप्रियता दांव पर लगा देते है। यदि सर्वे सही जाता है तो बल्ले बल्ले अन्यथा साख पर विपरीत असर देखने को मिलता है। चुनाव के पहले और मतदान के बाद कई एजेंसियां सर्वेक्षण कराती हैं और संभावित जीत- हार के अनुमान पेश करती हैं. कई बार इन सर्वेक्षणों के नतीजे चुनावी नतीजों के करीब बैठते हैं तो कई बार औंधे मुंह गिर जाते हैं। मतदाताओं का मूड भांपने का दावा करने वाले ऐसे सर्वेक्षणों में कई बार लोगों और राजनीतिक दलों की दिलचस्पी दिखाई देती है। कोई दावा नहीं कर सकता कि हमारे देश में चुनाव पूर्व सर्वेक्षण तरह विश्वसनीय होते हैं ।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

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