बलात्कार की महामारी की ओर बढ़ता देश

बाल मुकुन्द ओझा

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की हालिया जारी रिपोर्ट का विश्लेषण करें तो पाएंगे देश में कानून का इकबाल खत्म हो गया है विशेषकर महिलाओं से दुष्कर्म के मामलों में।चाहे किसी पार्टी का शासन हो, दावे अवश्य बढ़ चढ़ कर किये जाते है मगर अपराधियों के खौफ के आगे सभी बेबस है। नेता हो या अभिनेता, साधु वेषधारी हो या सफेदपोश, महिला से जोर जबरदस्ती में सब आगे है। दो साल की बच्ची से लेकर बुजुर्ग महिला तक दुष्कर्म की शिकार हो रही है। ऐसे में कानून के पालनहार कोई सख्त कदम उठाने के बजाय अपनी गलतियों को छिपाने के लिए नित नए बहाने ढूंढ रहे है।
देश में महिला सशक्तिकरण के तमाम दावे तब खोखले साबित हो जाते हैं, जब सरेआम कोई मनचला एक लड़की या महिला के साथ छेड़छाड़ करता है। निर्भया के अपराधी सात साल बाद भी अब तक फांसी पर नहीं चढ़ पाए है। अदालतों के चक्रव्यूह के आगे जैसे सभी बेबस है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट कहती है कि भारत में 2018 में औसतन हर रोज 91 महिला बलात्कार की शिकार हो रही है । ये तो वे आंकड़े है जो सरकारी कागजों में दर्ज है। हकीकत में देखा जाये तो उन पीड़ित महिलाओं की संख्या भी कम नहीं है जो किसी न किसी वजह से रिपोर्ट दर्ज नहीं करवा पाती। एनसीआरबी के मुताबिक 2018 महिलाओं ने करीब 33,356 बलात्कार के मामलों की रिपोर्ट की। एक साल पहले 2017 में बलात्कार के 32,559 मामले दर्ज किए गए थे। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक देश में दुष्कर्म के दोषियों को सजा देने की दर सिर्फ 27.2 प्रतिशत है। 2017 में दोषियों को सजा देने की दर 32.2 प्रतिशत थी। आंकड़े बताते हैं कि हत्या, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में पिछले साल के मुकाबले बढ़ोतरी हुई है। छेड़खानी की बात करे तो प्रतिदिन सैंकड़ों लड़कियां इस घिनौने कृत्य का सामना कर रही है। इन सबके लिए केवल पुलिस अथवा कानून व्यवस्था को दोषी ठहराना ठीक नहीं है। हमारा समाज भी समान रूप से दोषी है क्योंकि यह हम सब का दायित्व है की हम ऐसे अपराधियों को सजा दिलाने में आगे आये अपराधी किस्म के ऐसे लोगों पर निगरानी रखे।

समाज के नजरिए में भी महिलाओं के प्रति अब तक कोई खास बदलाव देखने को नहीं मिला है। ऐसा लगता है जैसे हमारा देश भारत धीरे-धीरे बलात्कार की महामारी से पीड़ित होता जा रहा है। यौन अपराध चिंताजनक रफ्तार से बढ़ रहे हैं। पिछले चार दशकों में अन्य अपराधों की तुलना में रेप की संख्या में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी हुई है और दोषियों को सजा देने के मामले में हम सबसे पीछे हैं।
आजकल प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर महिलाओं के साथ दुष्कर्म और छेड़छाड़ की खबर रोज दिखाई जाती है परंतु इसकी रोकथाम के उपाय पर चर्चा कहीं नहीं होती है। इस तरह के अत्याचार कब रुकेंगें। क्या हम सिर्फ मूक दर्शक बन खुद की बारी का इंतजार करेंगे। लड़कियों पर अत्याचार पहले भी हो रहे थे और आज भी हो रहे हैं अगर इसके रोकने के कोई ठोस उपाय नहीं किये गये। आज भी हमारे समाज में बलात्कारी सीना ताने खुले आम घूमता है और बेकसूर पीड़ित लड़की को बुरी और अपमानित नजरों से देखा जाता है । न तो समाज अपनी जिम्मेदारी का माकूल निर्वहन कर रहा है और न ही सरकार। ऐसे में बालिका कैसे अपने को सुरक्षित महसूस करेगी यह हम सब के लिए बेहद चिंता की बात है।
सच तो यह है कि एक छोटे से गांव से देश की राजधानी तक महिला सुरक्षित नहीं है। अंधेरा होते-होते महिला प्रगति और विकास की बातें छू-मंतर हो जाती हैं। रात में विचरण करना बेहद डरावना लगता है। कामकाजी महिलाओं को सुरक्षित घर पहुँचने की चिंता सताने लगती है। देश में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में कमी नहीं आरही है। भारत में आए दिन महिलाएं हिंसा और अत्याचारों का शिकार हो रही हैं। घर से लेकर सड़क तक कहीं भी महिला सुरक्षित नहीं है। बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, अपहरण, खून, हत्या जैसी कितनी ही वारदातें पुलिस तक पहुँचती ही नहीं है। बसों और ट्रेनों में गुंडे-लफंगे लड़की को छेड़ते हैं तो उन्हें डाँटना-डपटना तो दूर, सहयात्री तमाशबीन बने मजे लेते रहते हैं।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

Post add

Leave A Reply

Your email address will not be published.