लेकगीतों और नृत्य के संग मनाया जाता है लोहड़ी पर्व

बाल मुकुन्द ओझा

लोहड़ी देश का प्रसिद्ध त्योहार है। यह मकर संक्रान्ति के एक दिन पहले 13 जनवरी को मनाया जाता है। मकर संक्रांति के दिन तमिल हिंदू पोंगल का त्योहार मनाते हैं। इस प्रकार लगभग पूर्ण भारत में यह विविध रूपों में मनाया जाता है। मकर संक्रान्ति की पूर्व संध्या पर इस त्यौहार का उल्लास रहता है। रात्रि में खुले स्थान में परिवार और आस-पड़ोस के लोग मिलकर आग के किनारे घेरा बना कर बैठते हैं। इस समय रेवड़ी, मूंगफली, लावा आदि खाए जाते हैं। इस अवसर पर अलाव जलाकर और प्रसाद चढ़ाकर लोकगीतों के माध्यम से देश में खुशहाली की कामना की जाती है। आज जिस तरह से समाज व परिवार में एकजुटता का माहौल खत्म हो रहा है, ऐसे में लोहड़ी जैसे पर्वों को सामूहिक रूप से मनाना बेहद जरूरी है।
लोहड़ी मनाने के पीछे भी एक कहानी है जिसके नायक दुल्ला भट्टी है। बताया जाता है कि सांदल बार इलाके के जागीरदार ने एक ब्राह्मण की दो बेटियों को उठा लिया था। यह इलाका अब पाकिस्तान के मुल्तान शहर के पास है। दुल्ला मुगलों के खिलाफ तब गुरिल्ला लड़ाई कर रहे थे। कहानी के मुताबिक कि दुल्ला भट्टी ने दोनों लड़कियों को छुड़ाया और खद गरीब ब्राह्मण की जगह उनका बाप बना। लड़कियों के सिर के सालू (पल्लू) को बेटियों की इज्जत माना जाता था जिसे उसने रखवाया। तब किसी गरीब के हक में और वह भी लड़कियों के हक में खड़े होना बड़ी बात थी।
हर त्योहार की तरह यह भी दोस्तों, परिवार और रिश्तेदारों के साथ मिलकर मनाया जाता है। उपले और लकड़ी की मदद से बोनफायर जलाया जाता है। पंजाब में लोहड़ी का त्योहार प्रमुख रूप से बड़ी धूमधाम के साथ मनाई जाती है। ऐसा मान्यता है कि इस दिन दिन छोटा और रात काफी बड़ी होती है। फसल कटाई के मौके पर मनाए जाने वाले इस त्योहार को बोनफायर जलाकर सेलिब्रेट किया जाता है। वहीं लोग इसके चारों तरफ घूमकर नाचते हैं और आग में प्रसाद डालते हैं। वैसे तो यह त्योहार मूल रूप से पंजाबियों का है लेकिन पूरे उत्तर भारत में इसे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। मुख्य रूप से पंजाब के अलावा हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों में इसकी धूम होती है। पारिवारिक समूह के साथ लोहड़ी पूजन करने के बाद उसमें तिल, गुड़, रेवडी एवं मूँगफली का भोग लगाया जाता है। ढोल की थाप के साथ गिद्दा और भाँगड़ा नृत्य इस अवसर पर विशेष आकर्षण का केंद्र होते हैं। पंजाबी समाज में इस पर्व की तैयारी कई दिनों पहले ही शुरू हो जाती है।
लोहड़ी से 10-12 दिन पहले ही बच्चे ‘लोहड़ी’ के लोकगीत गाकर दाने, लकड़ी और उपले इकट्ठे करते हैं। इस सामग्री से चौराहे या मुहल्ले के किसी खुले स्थान पर आग जलाई जाती है। रेवड़ी और मूंगफली अग्नि की भेंट किए जाते हैं तथा ये ही चीजें प्रसाद के रूप में सभी लोगों को बाँटी जाती हैं। घर लौटते समय ‘लोहड़ी’ में से दो चार कोयले प्रसाद के रूप में, घर पर लाने की प्रथा भी है। लोग अग्नि के चारो ओर चक्कर काटते हुए नाचते-गाते हैं व आग मे रेवड़ी, मूंगफली, खील, मक्की के दानों की आहुति देते हैं । आग के चारो ओर बैठकर लोग आग सेंकते हैं व रेवड़ी, खील, गज्जक, मक्का खाने का आनंद लेते हैं। जिस घर में नई शादी हुई हो या बच्चा हुआ हो उन्हें विशेष तौर पर बधाई दी जाती है। पहले बेटा होने पर त्योहार मनाया जाता था मगर अब कन्या होने पर दूने जोश और उत्साह से कन्या लोहिड़ी का पर्व मनाया जाता है। इस आयोजन का उद्देश्य बेटियों को समाज में बेटों के बराबर मान-सम्मान मिले व लोगों की नकारात्मक सोच को बदलना है। आज लोहड़ी के त्योहार की पवित्रता सैकड़ों गुणा बढ़ गई है क्योंकि यहां भारतीय संस्कृति में देवी के रूप में पूजी जाने वाली कन्याओं की लोहड़ी मनाई जा रही है। सच है जिनके यहां बेटी ने जन्म लिया है वे समाज की रूढियों को तोड़कर बेटी की पहली लोहड़ी हर्षोल्लास से मना रहे हैं। पंजाबी समाज ने कन्या लोहड़ी मनाने की पहल कर देशवाशियों का ध्यान बेटी के मान सम्मान से जोड़कर पर्व मानाने की पवित्रता को द्विगुणित किया है। इन पर्वों से सामाजिक चेतना जगाने के साथ परस्पर मैत्री एवं सद्भाव का भी सन्देश मिलता है।
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

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