युवाओं में नयी ऊर्जा का संचार

अंकित भारद्वाज

प्रश्न उठता है कि नया भारत क्या है? तो मेरे अनुसार नया भारत अर्थात् एक सशक्त, समृद्ध, सुरक्षित, गौरवशाली, स्वस्थ, शिक्षित, स्वच्छ, समरस, अनुशासित, रचनात्मक, आत्मनिर्भर एवं व्यावसायिक, औद्योगिक, आर्थिक, तकनीकी, सांस्कृतिक तथा वैज्ञानिक रूप से संपन्न व दक्ष भारत। और ऐसे नये भारत के निर्माण का आधार है- इंद्रधनुषी स्वप्नों व आकांक्षाओं से प्रेरित राष्ट्रहित सर्वोपरि की धारणा लिए हुए नव भारत के निर्माण के लिए कटिबद्ध, दृढ़ संकल्पित व समर्पित भाव से निज कर्तव्यों का निर्वहन करने वाली भारत की 36 करोड की युवा आबादी।
अब अगला प्रश्न आता है कि युवा आबादी को ऊर्जस्वित, उत्साहित व नव भारत निर्माता कैसे बनाया जाए? तो इसके लिए आवश्यक है कि युवाओं को उनकी योग्यता व क्षमतानुसार अधिकाधिक रोजगार के अवसर सृजित करने वाली तथा उनकी प्रतिभा को निखारने वाली सरकार की अनेक महत्वाकांक्षी नीति व योजनाओं यथाः- स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया, डिजिटल भारत, ग्राम स्वरोजगार योजना, आत्मनिर्भर भारत, नई शिक्षा नीति 2020, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, स्टैंड अप व स्टार्ट अप इंडिया आदि का लाभ लेने के लिए जागरूक किया जाए जिससे नौजवान अपने पथ से विचलित न हों। युवा संसद, युवा महोत्सव, विज्ञान मेला जैसे रचनात्मक कार्यक्रमों, कार्यशालाओं का अधिकाधिक आयोजन हो जिनसे हरेक युवा के हरेक नए विचार का सम्मान हो। ऐसी नीतियों, योजनाओं व व्यवस्था का निर्माण हो जिससे भारतीय युवा में यह आत्मविश्वास पैदा हो कि ‘मैं राष्ट्र के लिए कुछ कर सकता हूँ’ और ‘मैं राष्ट्र के लिए कुछ करुँगा’ इसके लिए संकल्पित हो सके तथा उनका सर्वांगीण, समग्र व चहुँमुखी विकास सुनिश्चित हो।
स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं कि कोई भी राजनैतिक व सामाजिक व्यवस्था उससे जुडे मनुष्यों की सच्चारिता पर निर्भर करती है। इसलिए राष्ट्रीय चरित्र को चरितार्थ करने के लिए आवश्यक है कि देश के युवा विवेकानंद जी जैसे महापुरुषों के विचारों, आदर्शों, शिक्षाओं एवं नैतिक व मानवीय मूल्यों को आत्मसात कर मातृभाषा, संस्कृति व राष्ट्र के प्रति प्रेम व गौरव की उत्कट भावना का संचार करें। युवाओं को अपने मनोमस्तिष्क में सकारात्मक व नवोन्मेषी विचारों को स्थान देकर, नवचौतन्य लाकर स्वाभिमान के साथ अपनी आंतरिक शक्तियों को उद्घाटित कर राष्ट्रहित में उनका इष्टतम उपयोग करना चाहिए। वे इस प्रकार के कौशलों व नवाचारों का विकास करें जिससे वे रोजगार देने वाले बनें व आपदा को अवसर में बदलने की, सृजन की क्षमता पैदा कर सकें। यदि भारत का युवा मानसिक, शारीरिक, चारित्रिक रूप स्वस्थ होकर ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ का भाव सँजोकर समर्पित भाव से उत्साह व रचनात्मकता के साथ लक्ष्योन्मुखी होकर पुरुषार्थ करे तो मैं पूर्ण दावे के साथ कहता हूँ कि यही ऊर्जावान युवाशक्ति, अभिनव भारत की स्वर्णिम संकल्पना को साकार कर राष्ट्र को विश्व गुरू का स्थान प्रदान करेगी।

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