धार्मिेक अतिक्रमण के चंगुल में हांफता सरकारी सिस्टम

अजय कुमार,लखनऊ

लखनऊ। इतिहास कभी झूठ नहीं बोलता है। बशर्ते लिखने वाले की नियत साफ रही हो। वह किसी एक खास विचारधारा से प्रभावित न हो। पिछली कई सदियों में क्या हुआ ? कैसे हुआ ? किसने किया ? कब किया ? क्यों किया? यह सब इतिहास के पन्नों में दर्ज है। जिसे हम कभी इतिहास तो कभी बेहद गर्व के साथ अपनी संस्कृति का हिस्सा बताते हैं। भारत में कब-कब किन-किन ‘हस्तियों’ ने जन्म लिया। यह भी इतिहास के पन्नों से ही पता चलता है। इन महान हस्तियों के नाम पर कई शहरों, गांव-देहातों, संस्थाओं,सड़को,स्टेशनों, भवनों आदि का नाम रखा गया है। तमाम धर्मो के इन महान विभूतियों का देश तो सम्मान करता ही है इसके साथ-साथ जिस कुल में इन हस्तियों ने जन्म लिया, वह कुल भी इन महान हस्तियों के साथ अपने आप को जोड़कर गौरवांनवित महसूस करता है,लेकिन सिक्के का एक पहलू और भी है। समाज में एक ऐसा तबका भी मौजूद है जिसके लिए किसी पीर बाबा की मजार, कब्रिस्तान-शमशान घाट, धार्मिक स्थल आदि आस्था के स्थल इबादत/पूजापाठ की बजाए अतिक्रमण करके कमाई का जरिया बन गए हैं। इनको न सरकार का डर रहता है, न ही जनता की परेशानियों से इनका वास्ता है। यह ऐसे रंगे सियार होते हैं जिनके ऊपर हाथ डालने से शासन-प्रशासन ही नहीं सरकार तक डरती है।
बात लखनऊ की ही कि जाए तो यहां सैकड़ों की तादात में कथित महापुरूषों की ऐसी मजारें मौजूद हैं जिनका इतिहास की किताबों में कहीं जिक्र नहीं मिलता है। न ही मुट्ठी भर लोगों के अलावा कोई इन कथित महापुरूषों को जानता- पहचानता है, लेकिन इनके नाम पर करोड़ों रूपए की सरकारी जमीन पर कब्जा हो रखा है। मोटा चंदा वसूला जा रहा है। पूरे शहर में अतिक्रमण करके बनाई गईं यह मजारे मुंह चिढ़ाती हुई शहर के हर कोने में नजर आ जाती हैं। धार्मिक आस्थाओं और भावनाओं की आड़ में शहर में कई ऐसे प्रमुख स्थान बन गए हैं जहां धर्म के नाम कब्जा कर लिया गया है और उसके चारों तरफ दुकानें खोलकर मोटी कमाई की जाती है। कुछ लोग तो अपने रहने का ठिकाना भी यहां बना लेते हैं। बापू भवन चैराहें पर हुसैनगंज मैट्रो स्टेशन के बगल में पर बनी मजार और उससे ठीक सौ कदम की दूरी पर लोकभवन के लालबाग की तरफ खुलने वाले गेट के सामने बना हनुमान जी का मंदिर इसकी बानगी भर है। यही हाल डालीगंज पुल (गोमती नदी के किनारे-किनारे )से नदवा कालेज होते हुए हनुमान सेतु की तरफ जाने वाले मार्ग का है। पूरा करीब दो किलोमीटर का गोमती नदी का किनारा इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है,जहां की बेसकीमती जमीन को मजार, मंदिर और मस्जिद आदि की आड़ में हथिया लिया गया है। इस रोड पर गोमती नदी के सौन्द्रीयकरण के लिए कुछ काम सरकारों द्वारा कराया गया तो बाकी बच्चे हिस्से को धर्म के कथित ठेकेदारों ने कब्जा लिया। निजी तौर पर नदी के किनारे का निर्माण किसने करवाया? इस बारे में कोई कुछ भी बता नहीं बताता है। पूछने पर इसे आस्था की चासनी में लपेट दिया जाता है। यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए की धर्म के आड़ में गोमती नदी का किनारा व्यवसाय का बड़ा केन्द्र बनता जा रहा है,जबकि हमारा जैसे तमाम लोगों के पास यह सब सोचने का समय ही नहीं है। बचपन से देखते आ रहे हैं कि यहां आकर लोग अपना सिर झुकाते हैं,यह कभी नहीं सोचते की इस धार्मिक तो हम भी अपना ऊपर वाले के सदके में अपना सिर झुका देते हैं। भगवान/खुदा के नाम की आड़ में अतिक्रमण का खेल इतने शातिराना ढंग से अंजाम दिया जाता है कि कहीं कोई चूं तक नहीं कर पाता है।यह बानगी पूरे शहर की है।
अतिक्रमण भी तरह-तरह का होता है। कुछ लोग धर्म की आड़ में अतिक्रमण करते हैं तो तमाम लोग सिस्टम की खामियों का फायदा उठाने में माहिर हैं। कुल मिलाकर कुछ अचूक नुस्खे अपनाकर लखनऊ में कहीं भी अतिक्रमण करना बेहद आसान है। धार्मिक आस्थाओं की आड़ में करना चाहें तो वो रास्ता भी खुला है। और अधार्मिक अतिक्रमण करना है तो आपको पुलिस और नगर निगम वालों की जेब करनी होगी। ऐसा नहीं है कि अतिक्रमण सिर्फ धूर्त और मक्कर लोग ही कर पाते हैं। आम आदमी भी तरह-तरह के हथकंडे अपनाकर अतिक्रमण का खेल खेलने में माहिर है। घर के मेन गेट के बाहर फुटपाथ पर कार-वेहिकल खड़ा करना। ब्यूटीफिकेशन या ग्रीनरी के नाम पर घर के मेन गेट के अगल-बगल दोनों साइड प्लांटेशन करवा देना या घास लगवा देंना। घर के एक तरफ दुकान खोल देना और काउंटर या चेयर्स डालकर चबूतरे पर कब्जा कर लेने वाला अतिक्रमण इसी श्रेणी में आता है। इसी प्रकार शुरूआत में दुकान का काउंटर आधा अंदर और आधा बाहर फुटपाथ पर रखना शुरू फिर दो-तीन दिन बाद लकड़ी या लोहे की रैक पर सामान सजाकर फुटपाथ को घेर लेना, दुकान के ठीक सामने अपना वेहिकल खड़ा करें और उसके ठीक बगल में ही स्टैंडी बोर्ड भी रख दें, कुछ दिनों बाद दोनों तरफ रैक-अलमारियों को दुकान के दोनों तरफ रख दें। और काउंटर पूरा बाहर रखना शुरू कर दें। आजकल ज्यादातर मार्केट्स में प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड तैनात रहते हैं। उन्हें एक्स्ट्रा पैसा दीजिए तो आपको अपनी अलमारियां और रैक्स रात में अंदर नहीं रखनी पड़ेंगी। मतलब, 24 घंटे फुटपाथ आपके कब्जे में रहेगा. धार्मिक स्थल के नाम पर घर के आसपास कोई पेड़ तलाश लीजिए। पेड़ के नीचे भगवानों की मूर्तियां, फोटो-पोस्टर लगवा दें। स्वयं या क्षेत्र के लोगों से ही चंदा करके पेड़ के चारों ओर चबूतरा बनवा दीजिए। फिर मूर्तियों के ऊपर टीनशेड या पॉलिथिन कवर लगवा दें।जब पैसों का इंतजाम हो जाए तो पक्का निर्माण करवाना शुरू कर दें। निर्माण होता देख कुछ और लोग आपसे जुड़ेंगे मदद के लिए। उनसे भी पैसे ऐंठे और फुटपाथ को घिरवा दें.। एक बार मंदिर बन गया तो समझिए चल निकली आपकी दुकान। लोग श्रद्धा के साथ माथा टेकने तो आएंगे ही, साथ में दानपात्र में पैसे अलग से डाल जाएंगे।
लब्बोलुआब यह है कि अतिक्रमण का कोई धर्म नहीं होता फिर वो चाहे किसी धार्मिक आस्था से जुड़ा हो या अधार्मिक यानि लालच की आस्था से ? उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ ऐसे हजारों अवैध कब्जों और अतिक्रमण से पटा पड़ा है। हैरानी की बात यह है कि जिम्मेदार अफसर आंख मूंदे बैठे हैं। या आप कह सकते हैं कि अवैध कब्जेदारों और अतिक्रमण विरोधी दस्ते के बीच ‘सहमति’ इतनी तगड़ी होती है कि इनके खिलाफ होने वाली कार्यवाही दिखावा मात्र ही होती है। जहां अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाया जाता है। वहां चंद घंटों बाद ही वहां दोबारा अतिक्रमण पहले की तरह सजा दिया जाता है। लखनऊ के चारबाग स्टेशन के बहार लगी दुकानें हांे या फिर लखनऊ का दिल कहे जाने वाले हजतरंगज का फुटपाथ अथवा अमीनाबाद,नख्खास, रकाबगंज, पत्रकारपुरम, आलमबाग चैराहा, भूत नाथ मंदिर आदि शहर का तमाम इलाका सभी अतिक्रमण की चपेट में हैं। यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि नगर निगम या पुलिस का अतिक्रमण विरोधी अभियान ‘हाथी के दांत,खाने के और दिखाने के और जैसा ही रहता है। लखनऊ में कमिश्नरिेयेट पुलिस व्यवस्था शुरू होने के बाद उम्मीद थी कि पुलिस के अतिक्रमण में कुछ कमी आएगी,शुरू-शुरू में ऐसा दिखा भी,लेकिन अब वही पुराना ढर्रा चल पड़ा है। सच्चाई यह भी है कि नगर निगम और पुलिस ने पूरे शहर में अपने ‘गुर्गे’ फैला रखे हैं जो दिन भर अतिक्रमण करने वालों, शहर के अंदर चलने वाले पब्लिक वाहनों आदि से वसूली करके इस रकम को ऊपर तक पहुंचाने का काम करते हैं,जिसके बदले में इनका भी कमीशन तय होता है। इसी वजह से शहर में ‘अवैध कब्जेदारी’ और अतिक्रमण की संख्या में दिन पर दिन इजाफा होता जा रहा है। शहर में धार्मिक भावनाओं और आस्था की आड़ में पूजा-पाठ और दुआओं की छोटी सी शुरूआत ने आज बड़ा रूप अख्तियार कर लिया है। अब इनकी इलाके में मठाधीशी चलती है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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