परिवार के आर्थिक विकास में महिलाओं का योगदान

बाल मुकुन्द ओझा

देश की सर्वोच्च अदालत ने परिवार के आर्थिक विकास में महिलाओं के योगदान पर अपनी मुहर लगा दी है। अदालत का कहना है यह रूढ़िवादी सोच है कि जो महिलाएं घर में रहती हैं, वे काम नहीं करती हैं। इसे बदलना चाहिए। महिला घरों में पुरुषों के मुकाबले अधिक काम करती हैं। यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने वाहन दुर्घटना के एक मामले में क्षतिपूर्ति राशि बढ़ाते हुए की। सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले से देशभर में महिला समानता और अधिकारों के लिए संघर्ष को बड़ी सफलता मिली है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने लिखित निर्णय में कहा है कि महिलाओं के घरेलू कार्यों में समर्पित समय और प्रयास पुरुषों की तुलना में अधिक होता है। गृहिणी भोजन बनाती हैं, आवश्यक सामान खरीदती हैं। बच्चों की देखभाल से लेकर घर की सजावट, मरम्मत और रखरखाव का काम करता है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो महिलाएं खेतों में बुवाई, कटाई, फसलों की रोपाई और मवेशियों की देखभाल भी करती हैं। उनके काम को कम महत्वपूर्ण नहीं आंका जा सकता है। भले ही महिलाएं घरेलू काम अवैतनिक करती हैं, लेकिन उनके काम का परिवार के आर्थिक विकास में योगदान है। वे राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में भी योगदान करते हैं। इस महत्वपूर्ण तथ्य के बावजूद गृहिणियों को पारंपरिक रूप से आर्थिक विश्लेषण से दूर रखा गया है। हमारा दायित्व है कि आंतरिक कानूनों की तरह इस मानसिकता में बदलाव किया जाए।
गृहिणी के रूप में महिलाओं के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। गृहिणी एक ऐसी नौकरी करती है जहां कोई छुट्टी नहीं मिलती। काम के बदले वेतन नहीं मिलता। दुनिया की हर महिला बगैर किसी शिकायत के यह काम करती है। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक औसत भारतीय महिला दिन में करीब छह घंटे ऐसे काम करती है, जिसके लिए उन्हें कोई मेहनताना नहीं मिलता। यदि यह काम बाहर के कराया जाए तो इसकी एक निश्चित कीमत होगी। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भले ही गृहणी को काम के लिए कोई मेहनताना न मिलता हो, मगर उनके द्वारा किया गया काम भी आर्थिक गतिविधियों में शामिल होता है और इसे भी राष्ट्रीय आय में जोड़ा जाना चाहिए। ऐसा न कर, हम आर्थिक विकास में महिलाओं की हिस्सेदारी कम करे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक 2011 की जनगणना के अनुसार, लगभग 159.85 मिलियन महिलाओं ने “घरेलू काम” का उल्लेख अपने मुख्य व्यवसाय के रूप में किया, केवल 5.79 मिलियन पुरुषों के खिलाफ। कोर्ट ने राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की हालिया रिपोर्ट ‘टाइम यूज इन इंडिया-2019’ का भी जिक्र किया, जिसमें बताया गया था कि महिलाएं औसतन प्रतिदिन करीब 299 मिनट बिताती हैं। अवैतनिक घरेलू सेवाएं के लिये घर के सदस्य बनाम पुरुषों द्वारा 97 मिनट। इसी तरह, एक दिन में महिलाएं पुरुषों द्वारा 76 मिनट की तुलना में घर के सदस्यों के लिए अवैतनिक देखभाल सेवाओं पर 134 मिनट खर्च करती हैं। इन गतिविधियों पर प्रति दिन कुल समय भारत में तस्वीर को और भी स्पष्ट करता है। महिलाएं औसतन 16.9 प्रतिशत और अपने दिन का 2.6प्रतिशत अवैतनिक घरेलू सेवाओं और क्रमशः घर के सदस्यों के लिए अवैतनिक देखभाल सेवाओं पर खर्च करती हैं, जबकि पुरुष 1.7 प्रतिशत और 0.8 प्रतिशत खर्च करते हैं।
हमारे देश में गृहणियों को हमेशा पुरुषों की तुलना में कम आँका जाता है। एक गृहणी सारा जीवन घर और बच्चों की सेवा में बिता देती है। सारा दिन वो काम करती है फिर भी घरवाले उसे यह कहने से बाज नहीं आते कि सारा दिन घर पर बैठकर करती क्या हो। इन सब बातों को नजर अंदाज करते हुए वह अपने कर्त्तव्य को अच्छे से निभाती है। अगर कामकाजी महिलाओं को घर और बाहर दोनों संभालना पड़ता है तो गृहणी की जिन्दगी भी कोई आरामदायक नहीं होती। एक धोबी, रसोइया , काम वाली बाई, अध्यापिका, नर्स और न जाने कितनी तरह की भूमिकाओं को एक साथ निभाकर वो घर का खर्च बचाती है। इस तरह वो घर के खर्च को बचाकर आर्थिक सहयोग प्रदान करती है।
हम चाहते हैं कि लड़कियों को समान अधिकार मिले और देश खुशहाली की ओर कदम बढ़ाये तो हमें अपनी पुरानी सोच को बदलना होगा और लड़कियों को पर्दे के पीछे से बाहर लाकर संसार की प्रगति और विकास की सोच की ओर आगे बढ़ाना होगा।

(वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार) 

 

 

Post add

Leave A Reply

Your email address will not be published.