खाद्य तेलों ने बिगाड़ा रसोई का बजट

बाल मुकुन्द ओझा

नया साल महंगाई के मोर्चे पर जनता के लिए दुखदायी साबित हो रहा है वहीँ भाजपा सरकार के लिए भी सुखदायी नहीं कहा जा सकता। कोरोना काल में लोगों ने महंगाई का रौद्र रूप देखा था। फिर आलू, प्याज और दालों ने लोगों को रुला दिया। अर्थव्यवस्था पहले से ही बिगड़ी हुई है। बेकारी अपने चर्म पर है। पेट्रोल डीजल के भाव लगातार बढ़ने से लोगों में रोष है। रही सही कसर खाद्य तेलों ने निकाल दी है। खाने-पीने की चीजें काफी महँगी हो गई हैं। बाजार में सरसों, मूंगफली और सोयाबीन तेल और चावल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि ने रसोई का बजट बिगाड़ दिया है। खाने में उपयोग होने वाले सभी खाद्य तेलों की कीमतें एक बार फिर बढ़ गई हैं। उपभोक्ता मामलों के मूल्य निगरानी विभाग पर उपलब्ध खाद्य तेल की कीमतों पर नजर डालें तो सभी में बीते दो महीने में तेजी से उछाल आया है। खाद्य तेलों के भावों में 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। नया आलू आने के बाद भाव कुछ नरम हुए तो प्याज भी पकड़ में आ गया। हरी सब्जियां बाजार में बहुतायत से आने से लोगों को राहत मिली मगर दालों के भाव आसमान छू रहे। इस दौरान आम आदमी को सबसे ज्यादा परेशान खाद्य तेलों ने किया। महँगाई को नियंत्रण में रखने का दावा करने वाली बीजेपी सरकार के लिए यह बड़ी चुनौती है। जब सामान इतने महँगे हो जाएँ कि लोगों की जेबें खाली होने लगे तो सरकारों के सामने चिंताएँ मँडराने लगती हैं। फिलहाल जिस तरह के आर्थिक हालात हैं उसमें महँगाई का बढ़ना मोदी सरकार के लिए एक तरह से संकट से कम नहीं है। पेट्रोल और डीजल के भाव पहले से ही बढे हुए है। इसके कारण माल ढ़ुलाई महँगी हुई और लोगों को आम जरुरत की वस्तुएं महँगी मिलने लगी। लगातार 29वें दिन पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर रहने के बाद बुधवार को 30वें दिन कीमतों में बढ़ोतरी की गई है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों का फायदा उपभोक्ता को नहीं मिल रहा है।
बहरहाल देश में महंगाई का कहर जारी है। आर्थिक तंगी से जूझ रहे देशवासियों को महंगाई ने बेहाल कर रखा है। आर्थिक मोर्चे पर विफलता और बढ़ती बेरोजगारी से आहत मोदी सरकार पर अब महंगाई ने जोरदार हमला कर दिया है। महंगाई का सीधा अर्थ है वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों का बढ़ जाना यानि रूपये की कीमत का कम हो जाना है। महंगाई पर लगाम लगाने के सरकार के सारे प्रयास फेल हो गए है।
आजादी के बाद देश में महंगाई लगातार बढ़ी है, इसके कई कारण गिनाये जा सकते है। भाजपा की पूर्ववर्ती पार्टी जनसंघ ने छठे और सातवें दशक में कांग्रेस सरकारों के खिलाफ महंगाई को लेकर कई बार जोरदार आंदोलन किया था। भाजपा बनने के बाद भी महंगाई को लेकर भाजपा काफी मुखर रही है। महंगाई के खिलाफ पार्टी ने भारत बंद से लेकर जेल भरो आंदोलन का आगाज भी किया था। मनमोहन सरकार के दौरान भाजपा और नरेंद्र मोदी ने महंगाई को लेकर कई बार कांग्रेस सरकार को घेरा। मोदी सरकार का यह दूसरा कार्यकाल है। जनता महंगाई से राहत का इंतजार कर रही है मगर महंगाई सुरसा के मुंह की तरह लगातार बढ़ती ही जा रही है।
भारत की राजसत्ता दूसरी बार सँभालने के बाद भाजपा सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को महंगाई से दो दो हाथ करने पड़ रहे है। जन साधारण को फिलहाल महंगाई से राहत मिलती नहीं दिख रही है। महंगाई ने एक बार फिर से देश में दस्तक देकर लोगों का जीना हराम कर दिया है। इसने मोदी द्वारा जनता से किए वादों पर सवाल खड़ा कर दिया हैं। लोगों ने विभिन्न मोर्चों पर राहत पाने के लिए भाजपा के हाथों में सत्ता सौंपी थी, लेकिन महंगाई सरकार की छवि पर सवालिया निशान लगा रही हैं।
मोदी राज में देश में महंगाई लगातार बढ़ती ही जा रही है। इसकी सबसे ज्यादा मार दिहाड़ी मजदूरों और गरीबों पर तो लाजिमी रूप से पड़ी ही है साथ ही मध्यम वर्ग भी इसकी बेरहम मार से अछूता नहीं रहा है। हालाँकि भ्रष्टाचार पर कुछ हद तक लगाम लगाने में मोदी सरकार कामयाब रही है। मगर महंगाई के मोर्चे पर सरकार को आम आदमी के आक्रोश का सामना करना पड़ेगा। महंगाई दर बढ़ने का का अर्थ है कि वस्तुओं के दाम बढ़ेंगे। महंगाई दर में बढ़ोतरी के साथ रुपये की क्रय शक्ति घटेगी, जिससे खपत घटेगी और जीडीपी ग्रोथ पर नकारात्मक असर पड़ेगा, जिससे लक्ष्य अपनी राह से भटक सकता है।

(वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार)

 

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