बाल श्रम निषेध दिवस मनाना शर्मनाक

बाल मुकुन्द ओझा

कोरोना ने हमारे अनेक राष्ट्रीय और वैश्विक कार्यक्रमों की पोल खोलकर रख दी है इनमें अंतर्राष्ट्रीय बाल श्रम निषेध दिवस भी शामिल है। खबरिया चैनलों और अखबारों में हमने देखा की बालक किस प्रकार कोरोना के नाम पर श्रम की भेंट चढ़ रहे है। सैंकड़ों किलोमीटर दूर पैदल चलकर भूखे प्यासे अपने घर का रास्ता नाप रहे थे। कहीं मां बाप के कन्धों पर सवार थे तो कहीं साईकिल जैसे साधनों पर। कुल मिलाकर बच्चों के साथ यह हृदय विदारक दृश्य था जो आप और हम ने देखा। श्रम कानूनों का यह खुल्लम खुल्ला मजाक था। ऐसे में बाल श्रम निषेध दिवस मानना हमारे लिए शर्मनाक ही कहा जा सकता है।
बाल मजदूरी के प्रति विरोध एवं जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से हर साल 12 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने समाज में जागरूकता पैदा करने के लिए 2002 से विश्व बाल श्रम विरोधी दिवस के रूप में मनाने की शुरूआत की। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुमान के अनुसार विश्व में 21 करोड़ 80 लाख बाल श्रमिक हैं। भारत में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2 करोड़ और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार लगभग 5 करोड़ बच्चे बाल श्रमिक हैं। इन बाल श्रमिकों में से 19 प्रतिशत के लगभग घरेलू नौकर हैं। बाल श्रम से हमारा तात्पर्य ऐसे कार्यों से है जिसमें काम करने वाला व्यक्ति कानून द्वारा निर्धारित उम्र से छोटा होता है और इस प्रथा को अनेक देशों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने शोषित करने वाली माना है। इस दिवस का उद्देश्य बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा की जरुरत पर बल देना तथा इसके प्रति लोगों को जागरूक करते हुए बाल श्रम तथा विभिन्न रूपों में बच्चों के मौलिक अधिकारों को संरक्षित करना है।
भारत सरकार ने बालश्रम पर विभिन्न कानूनों को अमलीजामा पहना कर निषेध घोषित किया है। कानूनों के बावजूद आज भी करोड़ो बच्चों का बचपन बाल श्रम की भेंट चढ़ रहा है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में छोटे स्तर पर होटल, घरों व फैक्टरी में काम कर या अलग अलग व्यवसाय में मजदूरी कर हजारों बाल श्रमिक अपने बचपन को तिलांजलि दे रहें हैं जिन्हे न तो किसी कानून की जानकारी है और न ही पेट पालने का कोई और तरीक पता है। इन्हें न तो समाज का कोई संरक्षण मिला है और न ही सरकारी स्तर पर प्रभावी रोक की कोई व्यवस्था है। घरेलू कार्य के अलावा इन बालश्रमिकों को पटाखे बनाना, कालीन बुनना, वेल्डिंग करना, ताले बनाना, पीतल उद्योग में काम करना, कांच उद्योग, हीरा उद्योग, माचिस, बीड़ी बनाना, खेतों में काम करना ,कोयले की खानों में, पत्थर खदानों, सीमेंट उद्योग, दवा उद्योग तथा होटलों व ढाबों में झूठे बर्तन धोना आदि सभी काम मालिक की मर्जी के अनुसार करने होते हैं। आज पूरी दुनिया में बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जा रहा है। बाल मजदूरी खत्म करने के लिए लाख प्रयास किये जा रहे हों लेकिन हकीकत कुछ और है। इस दिवस से अनजान छोटे छोटे बच्चे होटलों, फैक्टरियों, दुकानों और घरों में मजदूरी करने को मजबूर हैं। अपने और अपने परिवार के पेट की आग को बुझाने के लिए मासूम बच्चों को छोटी उम्र में मजदूरी करनी पड़ रही है। चाहे तपती गर्मी हो या फिर कड़कड़ाती ठण्ड, बच्चे मजदूरी कर अपना और अपने घर का पेट पालने को मजबूर होते हैं। शिक्षा की रोशनी से मरहूम इन बच्चों के खेलने कूदने के दिन मजदूरी में बीतते है। भारत में बाल मजदूरी बहुत बड़ी समस्या है। यह समस्या सदियों से चली आ रही है। कहने को देश में बच्चों को भगवान का रूप माना जाता है। फिर भी बच्चों से बाल मजदूरी कराई जाती है। जो दिन बच्चों के पढ़ने, खेलने और कूदने के होते हैं, उन्हें बाल मजदूर बनना पड़ता है। इससे बच्चों का भविष्य अंधकारमय होता जा रहा है।
बच्चों को पढ़ने लिखने और खेलने कूदने से वंचित करना सबसे बड़ा अपराध है। बाल श्रम को केवल कानून बनाकर ही नहीं रोका जा सकता। आवश्यकता इच्छा शक्ति की है। हमें अपने प्रयासों को तेज करना चाहिये और बच्चों का भविष्य संवारने के लिए वह हर जतन करना चाहिये जिससे बच्चे बाल श्रम की इस कुत्सित प्रथा और मजबूरी से मुक्त हो सकें।

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