वैक्सीन पर विपक्ष का आत्मघाती विरोध

कोवैक्सीन एक महान स्वदेशी उपलब्धि है ,यह सक्षम और आत्मनिर्भर भारत का प्रमाण है

विष्णुगुप्त

भारत का विपक्ष अजीब है, उसका विरोध की नजरिया भी राष्ट्रहंता जैसी है, समय-समय पर ऐसे विरोध की विपक्ष की संस्कृति देखने को मिल ही जाती है। अगर विरोध नरेन्द्र मोदी की सरकार की उपलब्धियों और कार्यक्रमों पर आधारित हो तो फिर विरोध न केवल जहरीला होता है बल्कि आत्मघाती भी हो जाता है। एक नहीं कई उदाहरण यहां उपस्थित है। पाकिस्तान के खिलाफ एयर स्ट्राइक हो या फिर राष्ट्रीय जरूरतों के दृष्टिगत राफेल की खरीद के खिलाफ भारतीय विपक्ष न केवल गैर जरूरी विरोध करता है बल्कि राजनीतिक तौर पर अभियानी भी हो जाता है, एयर स्ट्राइक का सबूत तक मांगा जाता है, जब सीमा पर सेना विदेशी आक्रमणकारियों, विदेशी घुसपैठियों और भारतीय जयंचदों के खिलाफ वीरता पूर्ण कार्रवाई करती है तो फिर भारतीय सेना को ही बदनाम करने के लिए राजनीति होती है, भारतीय सेना को बलात्कारी और हिंसक बता कर दुश्मन देशों की पीठ थपथपाई जाती है, जब चीन के खिलाफ वर्तमान भारतीय सरकार वीरता दिखाती है, चीन को जैसे को तैसे में जवाब देती है तो फिर विपक्ष यह कहना नहीं चूकता कि भारतीय सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हिंसक है, युद्धशील हैं, देश को युद्ध हिंसा में झेलने का काम कर रहा है, विपक्ष यह नहीं देखता कि आजादी के बाद वर्तमान केन्द्रीय सरकार ही चीन को वीरतापूर्ण जवाब दिया है, चीन की उपनिवेशिक नीति और पड़ोसियों की भूमि को हडपने की नीति को मरोड कर रख दिया है। विपक्ष के विरोध में एक और खतरनाक प्रवृति शामिल हो गयी है। यह खतरनाक प्रवृति देशी वैक्सीन के विरोध का है। यह विरोध उस देशी वैक्सीन का है जिसके माध्यम से सपना देखा गया है कि भारत को महामारी के खिलाफ आत्मनिर्भर बनाना, महामारी से मुक्ति पाना, माहामारी से उन गरीब और फटेहाल नागरिकों की जान की सुरक्षा करना जो कोरोना महामारी की चपेट में आकर जान गंवा रहे हैं। निश्चित तौर पर स्वदेशी वैक्सीन तैयार करना अपने देश के लिए एक महान उपलब्धि है, इस महान उपलब्धि पर हमें उन बैज्ञाानिकों पर गर्व करने की जरूरत है जिन्होने दिन-रात परिश्रम कर यह वैक्सीन तैयार किये हैं और जिनके नतीजे भी संतोषजनक नहीं बल्कि प्रभावशाली है। हर देशवासी को इस वैक्सीन पर गर्व करने और देशी वैक्सीन की उपलब्धि के खिलाफ अफवाहों को खारिज करने की जिम्मेदारी है।
विरेध कितना जहरीला है, विरोध कितना अवैज्ञानिक है, विरोध कितना आधारहीन है, यह देख लीजिये। विरोध करने वाले सपा के अखिलेश यादव का बयान देख लीजिये। अखिलेश यादव का कहना है कि भाजपा के वैक्सीन पर उन्हें विश्वास नहीं है, भाजपा के वैक्सीन सीधे तौर पर नागरिकों को नपुंसक बना देगी, भाजपा इस वैक्सीन का इस्तेमाल अपने विरोधी लोगों को निपटाने और नपुंसक बनाने के लिए करेगी, इस भाजपा के वैक्सीन का बहिष्कार किया जाना चाहिए, वे खूद इस भाजपा के वैक्सीन को नहीं लगवायेंगे। इसी से मिलते-जुलते बयान कांग्रेस के सांसद शशि थरूर और जयराम रमेश ने दिये हैं। जयराम रमेश और शशि थरूर ने वैक्सीन प्रयोग के सभी आंकडे सार्वजनिक करने की मांग की है। सबसे पहले तो यह देखना होगा इस वैक्सीन का विरोध करने वाले अखिलेश यादव, जयराम रमेश और शशि थरूर जैसे लोग सिर्फ एक राजनीतिज्ञ है, ये कोई डॉक्टर नहीं है, ये कोई स्वास्थ्य वैज्ञानिक नहीं हैं। अभी तक कोई ऐसी बात जाहिर नहीं हुई है जिससे पता चला है कि सही में यह वैक्सीन उम्मीदों पर खरा नहीं उतरती है और इसके नतीजे खतरनाक हैं।
अखिलेश यादव और अन्य विपक्ष के नेताओं ने जो यह कहा है कि यह वैक्सीन भाजपा का है, यह भी मूर्खतापूर्ण बयानबाजी है, यह वैक्सीन भाजपा का है क्या? इस मूर्खतापूर्ण बात पर कौन देशवासी स्वीकार कर सकता है? इस वैक्सीन को तैयार करने वाली सरकारी-गैर सरकारी कंपनी है। इन वैक्सीनों का लगाने की जिम्मेदारी क्या भाजपा के पास है? उत्तर नहीं। इन वैक्सीनों को लगाने की जिम्मेदारी और नियंत्रण अधिकार सरकार और शासन के पास है। फिर यह वैक्सीन भाजपा के कैसे हुई? सबसे खतरनाक बयानबाजी तो विशेष आबादी को लेकर है। अखिलेश यादव आदि का कहना है कि भाजपा अपने विरोध की एक विशेष आबादी और विरोधियों को निपटाना चाहती है, उनका जान लेना चाहती है। यह विशेष आबादी का इशारा किस और है और इसके पीछे की राजनीति को समझा जा सकता है। देश के विशेष आबादी का राजनीतिक अर्थ उस अल्पसंख्यक आबादी से है जोेे हर समय भाजपा के खिलाफ रहती है और भाजपा के खिलाफ हर चुनाव में वोट करती है, इसके साथ ही साथ कांग्रेस, कम्युनिस्ट और सपा, बसापा, राजद जैसी पार्टियों की उंगलियों की गुलाम होती है। यह विशेष आबादी का राजनीतिक हथकंडा वैक्सीन के खिलाफ विद्रोह कराने की साजिश भी करार दिया जा सकता है। मोदी सरकार के कार्यकाल में इस विशेष आबादी को उकसाने और विद्रोह कराने की कई साजिशें रची जा चुकी हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात प्रयोग के आंकड़े सार्वजनिक करने की है। विपक्ष का कहना है कि अंतिम चरम में प्रयोग के आंकड़े सरकार क्यों नहीं सार्वजनिक कर रही है। ध्यान देने वाली बात यह है कि प्रयोग के आंकडे गोपनीय होते हैं,प्रयोग के आंकडे सार्वजनिक करने के भी खतरे कम नहीं है, उसका उपयोग दुष्प्रचार में हो सकता है। अभी तक दुनिया में जितनी भी कोरोना के खिलाफ वैक्सीनों के इस्तेमाल को स्वीकार किया गया है उन सभी के अंतिम चरण के प्रयोग के आकंडे जारी नहीं हुए है, वैक्सीन बनाने वाली कंपनी और सरकारों ने आंकडे जारी करने से मना कर दिया है। चीन और रूस ने जो वैक्सीनें बनायी है उन वैक्सीनों के अंतिम चरणों के प्रयोग के आकंडे भी जारी नहीं किये हैं। जबकि चीनी और रूसी वैक्सीन का इस्तेमाल होना शुरू हो गया है। चीन और रूस अपनी-अपनी वैक्सीन का इस्तेमाल युद्ध स्तर पर कर रहे हैं। ब्रिटेन और अमेरिका ने भी बिना विरोध का वैक्सीन इस्तेमाल शुरू कर दिया है। भारत का विपक्ष रूस और चीन का सबक क्यों नहीं लेता है?
भारत सरकार ने जो दो वैक्सीनों को इस्तेमाल करने की स्वीकृति प्रदान की है, उसमें से एक अर्द्ध्र देशी है तो दूसरी पूर्ण देशी है। कोविशील्ड और कोवैक्सीन नामक वैक्सीन को भारत सरकार ने स्वीकृति दी है। कोविशील्ड ऑक्सफोर्ड एस्ट्राजेनेका का भारतीय संस्करण है पर कोवैक्सीन पूरी तरह से स्वदेशी है, कोविशील्ड को भारत में सीरम इंस्टिटयूट आफ इंडिया बना रही है। कोवैक्सीन को भारत बायोटेक कंपनी इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च बना रही है। गौर करने वाली बात यह है कि ऑक्सफोर्ड एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन कोविशील्ड को ब्रिटेन में इस्तेमाल की स्वीकृति मिल गयी है। जब ब्रिटेन ने अपने यहां कोविशील्ड को इस्तेमाल करने की स्वीकृति प्रदान की कर दी है तब भारत में भी इस वैक्सीन के इस्तेमाल की स्वीकृति मिली है। विपक्ष इस तथ्य की अवहेलना क्यों कर रहा है?
स्वदेशी कोवैक्सीन की उपलब्धि महान है। यह उपलब्धि सक्षम भारत और आत्मनिर्भर भारत की पहचान है। दुनिया को भारत ने दिखा दिया है कि हमारे पास भी वैज्ञानिक शक्ति है और हम भी दुनिया की कोरोना महामारी संकट ही नहीं बल्कि हर उन संकटों से निपटने की शक्ति रखते हैं जिन संकटों से दुनिया त्राहिमाम करती है। दुनिया को यह विश्वास ही नहीं था कि भारत भी उसके साथ ही साथ कोरोना के खिलाफ वैक्सीन तैयार कर लेगा और अपने देश को कोरोना से मुक्ति दिलाने के रास्ते पर गतिमान हो जायेगा? दुनिया तो भारत को अभी भी सांप-सपेरे वाले देश के रूप में देखने की आदि है। पर दुनिया को यह नहीं मालूम है कि भारत आज ज्ञान-विज्ञान का हब बन गया है, ज्ञान-विज्ञान का आईकॉन बन गया है। यह मोदी का भारत है जो दुनिया से कदम-ताल मिलाने की शक्ति रखता है।
भारत की स्वदेशी वैक्सीन दुनिया के लिए चर्चा का विषय है। दुनिया के कई देशों ने भारत की स्वदेशी वैक्सीन पर दिलचस्पी दिखायी है। नेपाल सहित दुनिया के कई गरीब और विकासशील देशों ने कोवैक्सीन को खरदीने की राय जाहिर की है। भारत अपनी इस कोवैक्सीन कोरोना वैक्सीन के माध्यम से दुनिया भर में अपनी शक्तिशाली पैठ बनाने में कामयाब हो सकता है। खासकर गरीब और विकासशील देशों को भारत मदद कर सकता है। ऐशिया और अफ्र्र्रीका के देशों में भारत अपनी वैक्सीन की आपूर्ति कर एक महाशक्ति बन सकता है। नरेन्द्र मोदी ने कोरोना महामारी से मुक्ति दिलाने के लिए अपनी नीति पहले ही जाहिर कर चुके हैं। नरेन्द्र मोदी ने कोवैक्सीन कोरोना वैक्सीन के माध्यम से गरीब देशों को मदद करने की राय जाहिर कर एक शानदार काम किया है जिस पर पूरे देशवासियों को गर्व होना चाहिए।
वास्तव में हमारा विपक्ष कम्युनिस्ट संस्कृति का सहचर बन गया है। कम्युनिस्टों की संस्कृति थी कि सिर्फ कार्ल मार्क्स, लेनिन, स्तालिन और माओत्से तुग ही प्रेरक पुरूष है, उनके सामने गांधी, सुभाष और भगत सिंह कुछ भी नहीं हैं। कम्युनिस्ट देश की हर उस उपलब्धि का विरोध करते थे जिस उपलब्धि से भारत दुनिया को चकित करता था और यह उपलब्धि स्वदेशी होती थी। इसी कारण कम्युनिस्ट निपट गये, संग्रहालय में दर्ज होने की स्थिति में पहुंच गये। भारतीय विपक्ष अगर इसी तरह स्वदेशी उपलब्धि पर विरोध करते रहें तो फिर ये भी कम्युनिस्टों की तरह निपट ही जायेगे। ऐसे भी मोदी के सामने भारतीय विपक्ष लगातार निपट रहे हैं। कोवैक्सीन का विरोध विपक्ष के लिए हानिकारक ही नहीं बल्कि आत्मघातक भी है।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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