कश्मीर के स्थानीय प्रतिनिधियों की सुरक्षा जरूरी

विष्णुगुप्त

अजय पंडिता की हत्या से एक बार फिर मुस्लिम आतंकवादी संगठन और उनका आका पाकिस्तान बेनकाब हुए हैं और यह प्रमाणित हो गया कि मुस्लिम आतंकवादी संगठन किसी भी परिस्थिति में कश्मीरी पंडितों की घर वापसी नहीं चाहते हैं और घर वापसी करने वाले कश्मीरी पंडितों की हत्या करना उनका एक मात्र मकसद है। मुस्लिम आतंकवादी संगठनों को अब यह समझ लेना चाहिए कि कश्मीर सिर्फ मुस्लिमों का नहीं बल्कि कश्मीरी पंडितों का भी है। एक-दो हत्याओं से अब कश्मीर की राष्टवादी जानता डरने वाली नहीं है। जम्मू-कश्मीर की केन्द्रीय शासन और भारत सरकार अब न तो कमजोर दृष्टि अपनाने वाली है और न ही वे अब मुस्लिम आतंकवादी संगठनों  के सामने समर्पण करने वाली है।
कश्मीर में संरपंच अजय पंडिता की हत्या की चारो तरफ से आलोचना हो रही है, उदारवादी कश्मीरी जनता इसे कायरतापूर्ण कार्रवाई मान रही है। निश्चित तौर पर अजय पंडिता की हत्या का दांव उल्टा पड़ रहा है और आतंकवादी संगठन बेनकाब हो रहे हैं, उनके समर्थक तत्व कमजोर पड़े हैं, अब आतंकवादियों के पक्ष में बोलने वाले आतंकवादी समर्थक तत्वों को जवाब देना मुश्किल होगा। आतंकवादी संगठनों ने यह सोचा तक नहीं होगा कि जिस अजय पंडिता की वे हत्या कर रहे हैं उस अजय पंडिता की रचनात्मक और सीख लेने वाली कहानी पूरी दुनिया में प्रसारित हो जायेगी, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि अजय पंडिता  के रास्ते को आतंकवाद को परास्त करने का रास्ता बन जायेगा, अजय पंडिता का अनुसरण दूसरे लोग भी कर सकते हैैं?
अगर सही में अजय पंडिता का अनुसरण दूसरे लोग करने लगेंगे तो निश्चित तौर पर आतंकवादियों को लेने की जगह देने पड़ जायेगे, उनके हथियार का खौफ कमजोर पडने लगेगा, उनके आतंकवाद के खिलाफ लोग डर मुक्त होकर विरोध में उतरना शुरू कर देंगे। जब खौफ के खिलाफ डर समाप्त हो जाता है तो निश्चित तौर पर खौफ पैदा करने वाले लोग, समूह की पराजय भी निश्चित हो जाती है। पंजाब का उदाहरण हमारे पास उपस्थित है। पंजाब में जब सिख आतंकवाद के प्रति लोग गुस्से में आये, गुस्से में आकर लोग आतंकवादियों से लड़ना शुरू कर दिया, आतंकवादियों के छिपने की जगह पर हमला बोलना शुरू कर दिया और जनता का पुलिस व सरकार के समर्थन में उतरकर आना शुरू हुआ तो फिर आतंकवादी या तो पुलिस के हाथो मारे गये या फिर आतंकवाद छोड़कर अपनी पहचान ही छिपाने जैसे कार्य करने के लिए विवश हुआ। इसका सुखद परिणाम हुआ कि पंजाब से आतंकवाद का नामोनिशान मिट गया। इसी प्रकार अगर कश्मीरी पंडित भी मुस्लिम आतंकवादियों से लोहा लेना शुरू कर दिये तो फिर मुस्लिम आतंकवाद का कमजोर पडना भी निश्चित है। सबसे अच्छी बात यह है कि कश्मीर की स्थिति बदल चुकी है और अब धारा 370 हट चुकी है। पाकिस्तान परस्त मुस्लिम आतंकवाद का समर्थन करने वाले लोग सीधे जेल भेजे जा रहे हैं।
दुनिया में सबसे बड़ा कष्ट मातृभूमि से बेदखल हो जाना है। जिस मातृभूमि पर बचपन बिताया, जिस मातृभूमि से पीढ़ियों-पीढ़ियों तक का रिश्ता-संबंध होता है उस मातृभूमि को भुलाना आसान नहीं होता है। अपनी मातृभूमि से अजय पड़िता जैसे पडित खुद बेखदल नहीं हुए थे, बल्कि उन्हें बेदखल कर दिया गया था, बन्दूक की नोंक पर उन्हें बेदखल कर दिया गया था, कश्मीर नहीं छोड़ने वाले कश्मीरी पड़ितों की हत्याएं हुई, कश्मीरी महिलाओं के साथ बलात्कार हुए, कश्मीरी पंडितों के पूजा स्थलों का अपमान हुआ। फिर भी कश्मीरी पड़ित अपनी मातृभूमि छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए थे। जब मस्जिदोें से लाउडस्पीकर पर फतवा जारी होने लगा और उस फतवे के खिलाफ भारतीय सरकार का रवैया उदासीनता की कसौटी पर ही रहा था तो फिर कश्मीरी पड़ितों के पास विकल्प ही कहां था? मस्जिदों से लाउडस्पीकर पर सीधा फरमान था कि मुसलमानों नहीं बनोगे तो फिर कश्मीर छोड़ों या फिर मौत का रास्ता चुनों, हम तुम्हें गोलियों और बमों का शिकार बना देंगे।
वास्तव में उस काल में जब कश्मीरी पंडित कश्मीर छोड़ने के लिए बाध्य हुए थे और अपनी मातृभूमि से बेदखल होने के लिए मजबूर हुए थे तब उस काल में देश के उपर कमजोर और दिशाहीन तथा वीरताहीन सरकारें थी। राजीव गांधी की सरकार के समय कश्मीर में पाकिस्तान परस्त मुस्लिम आतंकवाद पला-बढा और वीपी सिंह, चन्द्रशेखर, आईके गुजराल और पीवी नरसिंह राव के समय मुस्लिम आतंकवाद विकराल रूप धारण कर लिया था। इन सरकारों के पास न तो कूटनीतिक वीरता थी और न ही देश की एकता और अखंडता के प्रति कोई प्रेरक समझ थी। इस कारण पाकिस्तान परस्त मुस्लिम आतंकवाद को पैर पसारने और कश्मीरी पंडितों को वहां से बाहर करने का अवसर प्राप्त हुआ था। जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार आयी थी तब बहुत विलंब हो चुका था और पाकिस्तान अपनी साजिश में कामयाब हो चुका था। कारगिल युद्ध और नेपाल से भारतीय विमान अपहरण कांड में ही अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार उलझी रही थी।
कश्मीरी पंडितों की घर वापसी किसी सरकार की प्राथमिकता नहीं थी। जबकि राष्ट की एकता और अखंडता के लिए और पाकिस्तान परस्त मुस्लिम आतंकवाद के सफाये के लिए कश्मीरी पंडितों की घर वापसी बहुत ही जरूरी थी। जब-जब देश के अंदर कश्मीरी पंडितों की घर वापसी की मांग उठती थी तब-तब यह कहा जाता था कि कश्मीरी पंडितों की घर वापसी खतरे से खाली नहीं है, उनके जान पर खतरा है, वे जिंदा नहीं बचेंगे, मुस्लिम आतंकवादी संगठन उनकी हत्याएं कर देगे। जम्मू-कश्मीर में जो मुस्लिम परस्त फारूख अब्दुला और उमर अब्दुला तथा मुुफ्ती मोहम्मद सईद और उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती सईद की सरकारे बनती थी वह सरेआम कहती थी कि कश्मीरी पंडितों की घर वापसी खतरे से खाली नहीं है, हम सुरक्षा नहीं देंगे, कश्मीरी पंडित हमारे भरोसे नहीं बल्कि अपने भरोसे और खुद की सुरक्षा के भरोसे घर वापसी करने के लिए स्वतंत्र है। ऐसी परिस्थिति में कौन कश्मीरी पंडित अपनी मातृभूमि पर वापसी करने के लिए तैयार होता? घर वापसी का साहस तो तब होता जब उनके साथ सरकारे खड़ी होती। कश्मीर की सरकारें तो मुस्लिम आतंकवादियों की समर्थक रही थी।
पर अजय पंडिता जैसे वीर कश्मीरी पंडित भी थे। जिनके अंदर में अतुलनीय वीरता थी, डर नाम की कोई चीज नहीं थी। कभी वे जरूर डरे हुए थे और डर कर ही कश्मीर छोड़ कर भागे थे। पर मातृभूमि का प्यार और चिंता ने उन्हें वीर बना दिया, साहसी बना दिया, मौत की चिंता से बाहर कर दिया। अजय पंडिता अपने कश्मीरी भाइयों से कहा करते थे कि हर व्यक्ति को एक न एक दिन मौत का सामना करना ही है, मौत आयेगी ही । पर तिल-तिल कर मरने की जगह वीरता के साथ, निडर होकर तथा साहस के साथ क्यों न मौत को गले लगाया जाये। क्योंकि कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की घर वापसी मौत को गले लगाने जैसी ही थी। जान पर खतरा था। पर उन्होंने अपनी जान के खतरे को अपने उपर हावी नहीं होने दिया। निडरता के साथ, वीरता के साथ घर वापसी करने का निश्चय किया। घर वापसी का निर्णय आसान नहीं था। उनके घर को तहस-नहस कर दिया गया था, उनके बागों पर कब्जा कर लिया गया था, उनके खेतों की भगोलिक स्थिति बदल दी गयी थी। ऐसे में आजीविका की समस्या भी थी। घर वापसी तो हो जायेगी पर आजीविका कैसे चलेगी? जब साहस होता है, विचार अटल होता है तब रास्ता भी निकलता है, सफलताएं भी चरण छुती हैं। अजय पंडिता के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उन्होंने सबसे पहले अपने तहस-नहस हुए घर को रहने लायक बनाया, फिर अपने खेतों और अपने बागों को ठीक किया। धीरे-धीरे बागों और खेतों से आमदनी बढती चली गयी, इस कारण उनकी आजीविका की समस्याएं दूर हो गयीं।
अपने साथ ही साथ अपने गांव का भी विकास और उन्नति उनके लिए जरूरी थी। उन्होंने सरपंच का चुनाव लडा, सरपंच का चुनाव लड़ना भी वीरता का काम था। मुस्लिम आतंकवादी संगठनों ने सरपंच का चुनाव लडने वालों को मौत का घाट उतार देने का फतवा सुनाया था। इस फतवे को नजरअंदाज करना साहस काम था। उन्होने न केवल सरपंच का चुनाव लडा बल्कि भाजपा के सरपंच पद के उम्मीदवार को पराजित कर सरपंच बने थे। उनका सरपंच बनना इस बात का परिचायक था कि उनकी लोकप्रियता थी और उनकी लोकप्रियता आतंकवादी संगठनों के लिए एक काल के तौर पर खड़ी थी। आतंकवादी संगठनों का समर्थक वर्ग में भी बचैनी थी। अजय पडिंता ने सुरक्षा भी मांगी थी पर उन्हें सुरक्षा नहीं मिली। जबकि उन्हें सुरक्षा दी जानी चाहिए थी।
मुस्लिम आतंकवादी संगठनों के निशाने पर स्थानीय प्रतिनिधि ही रहें हैं। स्थानीय प्रतिनिधि मुस्लिम आतंकवादियों के स्थानीय संपर्क और समर्थन को कमजोर करने की वीरता रखते हैं। आतंकवादी संगठन भी यह जानते हैं कि उनके लिए स्थानीय प्रतिनिधि काल के सम्मान हैं, क्योंकि स्थानीय स्तर पर उन्हें समर्थन लेने मेें मुश्मिलें आती हैं। भारत की सरकार को कश्मीर के स्थानीय प्रतिनिधियों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।
अजय पंडिता की हत्या का दांव उल्टा ही पडा है, खुद मुस्लिम आतंकवादी संगठन और उनका आका पाकिस्तान ही बनेकाब हुए हैं। दुनिया में यह संदेश गया कि ये मुस्लिम आतंकवादी संगठन मजहबी सोच से ही ग्रसित होते हैं और वे मजहब के आधार पर सिर्फ मुस्लिम वर्ग को कश्मीर के अंदर रहने देना चाहते हैं। अब मुस्लिम आतंकवादी संगठनों की समझ यह होनी चाहिए कि अगर अजय पंडिता के रास्ते पर अन्य कश्मीरी पंडित चल निकले तो फिर उनकी हिंसा और आतंकवाद खुद कमजोर पड़ जायेगा।

 

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