नासूर बन गई अवैध डेयरी और आवारा पशुओं की समस्या

बाल मुकुन्द ओझा

राजस्थान भारत के सर्वश्रेष्ठ पर्यटन स्थलों में से एक है। यही पर्यटन स्थल आज अवैध डेयरियों और आवारा पशुओं की सैरगाह बना हुआ है। राजस्थान की राजधानी जयपुर में आवारा पशुओं की समस्या नासूर बन गई है। यहाँ आवारा गाय, सांड, सूअर, बन्दर और कुत्ते राजधानी के लोगों की सबसे बड़ी परेशानी बन गए है। समूचा महानगर छोटी मोटी सैंकड़ों की संख्या में अवैध डेयरियों की समस्या से जूझ रहा है। राजस्थान हाईकोर्ट ने राजधानी जयपुर में अवैध डेयरियों को हटाने को लेकर जयपुर नगर निगम को कई बार कार्रवाई करने के आदेश दिये मगर शहरी सरकार नकारा साबित हुई। अब राजधानी में दो नगर निगम ग्रेटर और हेरिटेज के नाम से कार्यरत है। एक नगम निगम कार्यवाही करती है तो दूसरी क्षेत्राधिकार के नाम से रोड़ा अटका देती है। राजधानी में अवैध डेयरी का कारोबार बदस्तूर जारी है। जिसकी वजह से शहर में आवारा पशुओं की समस्या भी कम नहीं हो रही। कोर्ट की रोक के बावजूद जयपुर शहर में आवासीय इलाकों में अवैध पशु डेयरियां संचालित हो रही है।
इसी भांति आवारा पशु पहले की भांति बेखौफ होकर आतंक फैला रहे है। छोटे नगरों से लेकर बड़े मैट्रो शहरों में आवारा पशुओं के कातिलाना कहर की खबरें अकसर मीडिया में सुर्खियां बनती रहती हैं फिर भी उन पर लगाम नहीं कसी जा रही। अगर प्रशासन कुछ सख्ती दिखाता भी है तो आनन फानन में अभियान चलकर आवारा पशुओं को पकड़ने की मुहिम चलती है लेकिन फिर थोड़े दिन बाद मामला ठंडा पड़ जाता है। सही तो यह है आवारा पशुओं का यह मुद्दा हमें देखने में छोटा लगता है लेकिन है बड़ा गंभीर। गाय भैंस या सांड़ ही क्यों, आवारा कुत्ते भी लोगों की नाक में कम दम नहीं करते। बच्चे तो उन के डर से घर से बाहर तक नहीं निकल पाते। अब तो शहरों में बंदरों का खौफ भी देखा जा रहा है। अस्पतालों में बंदरों के काटने के बहुत से मामले सामने आने लगे हैं।
राजधानी जयपुर में पिछले कई महीनों से आवारा पशुओं की भरमार हो गई है। बाजार क्षेत्र सहित सकरी गलियों में साँडों व आवारा पशुओं का निरंकुश होकर घूमना लोगों के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है। इनके आपस में झगड़ने के कारण कई बुजुर्ग-महिलाएँ एवं बच्चे भी इनकी चपेट में आने के कारण चोटिल हो जाते हैं। कभी-कभार तो छोटे स्कूली बच्चे इन आवारा पशुओं के आपसी झगड़े को देख काफी भयभीत हो जाते हैं। अक्सर खाद्य व सब्जी आदि की दुकानों पर भी यह अपना मुँह मारते रहते हैं। विभिन्न क्षेत्रों में समुचित सफाई नहीं होने और जगह-जगह कचरे के ढेर लग रहने से वहाँ आवारा मवेशियों का जमघट लगा रहता है। भयावह स्थिति तब बन जाती है, जब ये आवारा मवेशी मार्गों के किनारे लगे कचरे के ढेरों पर आपस में झगड़ते हैं। कई बार तो बाजार क्षेत्र में भी इनके आपस में झगड़ने से यातायात बाधित होता है। दिन हो या रात आवारा पशु सड़क पर झुंड बनाकर बैठ जाते हैं जिससे लोगों का निकलना मुश्किल हो जाता है।
राजधानी जयपुर में बड़ी संख्या में पशु डेयरियां है। पशु पालक जब तक गाय भैंस दूध देती है उसका दूध निकालते हैं और उसके बाद पशुपालक इन्हें खुला छोड़ देते हैं। इसके बाद जब वह फिर से दूध देने की स्थिति में आती है तो उसे फिर से पकड़ लेते हैं। कुछ लोग तो सुबह शाम दूध निकालने के बाद जानवरों को खुला छोड़ देते हैं। राजधानी में पशु डेयरियों के अलावा हजारों की संख्या में आवारा पशु कॉलोनियों में विचरण करते मिल जाएंगे। इनके मालिक गायों का दूध निकलने के बाद इन्हें विचरण के लिए छोड़ देते है। ये ही पशु दिन भर गलियों और सड़कों पर धमाचौकड़ी मचाते है। सही बात तो यह है कि प्रशासन के पास इतने संशाधन नहीं है वे गली गली जाकर आवारा पशुओं को पकडे। राजधानी के यातायात मार्ग और बाजार भी सैंकड़ों की संख्या में है जहाँ आपको हर समय आवारा पशु विचरण करते मिल जायेंगे। प्रशासन मुख्य मार्गों से इन पशुओं को हटादे तो यह उनके लिए बड़ी बात होगी। आवारा पशुओं से शहर को मुक्त करने के लिए प्रशासन के साथ साथ नागरिकों को भी आगे आना होगा। गौवंश की रक्षा का दावा करने वाले लोग हो हल्ला मचाते अवश्य नजर आएंगे मगर नासूर बनी आवारा पशुओं की समस्या से आम नागरिक और देशी विदेशी पर्यटक को मुक्ति दिलाने के कार्य में कहीं नजर नहीं आएंगे।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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