वायु प्रदूषण ने की अर्थव्यवस्था पर करारी चोट

बाल मुकुन्द ओझा

भारत में वायु प्रदूषण का खतरा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। देश में वायु प्रदूषण के कारण बीमारियों के साथ-साथ असमय मौत के मामलों में तेजी से इजाफा हुआ है। इसका व्यापक असर हमारी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है। गत वर्ष वायु प्रदूषण के कारण हुई बीमारियों और अकाल मौतों की वजह से देश के सकल घरेलू उत्पाद को करीब 1.4 फीसद का नुकसान हुआ है। वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य और आर्थिक प्रभाव पर लांसेट प्लैनेटरी हेल्थ पत्रिका में हालिया प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया है कि वायु प्रदूषण के कारण राज्य स्तर पर जीडीपी का सबसे ज्यादा नुकसान उत्तर प्रदेश को झेलना पड़ा है, जबकि दिल्ली में सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति आय में गिरावट दर्ज की गई।
अध्ययन में बताया गया 2019 में भारत में प्रदूषण और जहरीली हवा के कारण की वजह से करीब 17 लाख लोगों की मौत हुई है। ये देश में हुई कुल मौतों का 18 फीसदी है। इन मौतों के कारण देश को 2.6 लाख करोड़ रुपए का आर्थिक नुकसान हुआ जो जीडीपी का 1.4 फीसदी है। हालाँकि भारत में घरेलू वायु प्रदूषण में कमी आई है, जिससे 1990 से 2019 के बीच इसके कारण होने वाली मृत्यु दर में 64 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है जबकि इस दौरान बाहरी वायू प्रदूषण की वजह से होने वाली मृत्युदर में 115 प्रतिशत का इजाफा दर्ज किया गया। इस दौरान मरीजों के इलाज व अन्य खर्चों की वजह से देश पर एक वर्ष में दो लाख 60 हजार करोड़ का आर्थिक बोझ पड़ा।
वायु प्रदूषण पर एक अन्य वैश्विक रिसर्च रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दूषित हवा हमारे स्वास्थ्य के लिए न केवल बेहद हानिकारक है अपितु पेट की आंत सम्बन्धी विभिन्न व्याधियों की भी कारक है। रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि की गई है की वायु प्रदूषण के कारण हमारे शरीर की आंत के बैक्टीरिया पर गहरा असर पड़ सकता है जिससे मधुमेह जैसी खतरनाक बीमारी के साथ मोटापा, पेट के आंत के संक्रमण सहित विभिन्न पुरानी बीमारिया बढ़ सकती है। इस रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है की वाहनों से उत्सर्जित होने वाली खतरनाक गैसें जब सूर्य की रोशनी के संपर्क में आती है तो वे बेहद खतरनाक रूप धारण कर लेती है जो हमारे स्वास्थ्य पर असर डालती है। रिसर्च के अनुसार वायु प्रदुषण मनुष्य की श्वास सम्बन्धी प्रणाली पर तो असर डालती है ही साथ ही हमारी आँतों को भी क्षतग्रस्त करती है। विशेषरूप से पेट सम्बन्धी बीमारिया बढ़ जाती है। हमारे पेट में बसने वाले जीवाणु और कीटाणु का हमारी सेहत से गहरा ताल्लुक है। इन असंख्य जीवों का हमारे शरीर की सेहत पर अच्छा और बुरा दोनों तरह का असर पड़ता है। इन्हें अंग्रेजी में माइक्रोबायोम कहते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक हमारे आस-पास की आबोहवा पर असर इन पर पड़ता है। वायु प्रदूषण इनमें से एक है। वायु प्रदूषण के लिए कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और धूल, परागण, धुआं वगैरह जिम्मेदार होते हैं। ऐसे प्रदूषण से न सिर्फ बीमारियां हो रही हैं, बल्कि लोगों की मौत भी हो रही है।
वायु प्रदूषण का खतरा अब घर घर मंडराने लगा है। देश और विदेशों की विभिन्न ग्लोबल एजेंसियों द्वारा वायु प्रदूषण के खतरे से बार बार आगाह करने के बावजूद न सरकार चेती है और न ही नागरिक। लगता है लोगों ने इस जान लेवा खतरे को गैर जरूरी मान लिया है। वायु प्रदूषण ने भारत को अपने पंजे में मजबूती से जकड रखा है। भारत की आबोहवा निरंतर जहरीली होती जा रही है। वैश्विक स्तर पर हवा की गुणवत्ता के बारे में सूचना देने वाली टेक कंपनी आइक्यू के शोधकर्ताओं ने अपने ग्राउंड मॉनीटरिंग स्टेशनों से आंकड़े एकत्रित किए हैं। यह पीएम 2.5 के सूक्ष्म कण पदार्थ के स्तर को मापता है। इसमें वे सूक्ष्म कण आते हैं जो कि 2.5 माइक्रोमीटर से छोटे होते हैं। इन्हें विशेष रूप से हानिकारक माना जाता है क्योंकि वे फेफड़ों और हृदय प्रणाली की गहराई में प्रवेश करने के लिए काफी छोटे होते हैं। पीएम 2.5 में सल्फेट, नाइट्रेट और ब्लैक कार्बन जैसे प्रदूषक शामिल हैं। इस तरह के कण आसानी से पहुंचकर के फेफड़ों और हृदय की परेशानियों को बढ़ा सकते हैं।
बताया जाता है उद्योगों, घरों, कारों और ट्रकों से वायु प्रदूषकों के खतरनाक कण निकलते हैं, जिनसे अनेक बीमारियां होती हैं. इन सभी प्रदूषकों में से सूक्ष्म प्रदूषक कण मानव स्वास्थ्य पर सबसे ज्यादा प्रभाव डालते हैं। ज्यादातर सूक्ष्म प्रदूषक कण,चलते वाहनों जैसे रोजमर्रा के इस्तेमाल किए जाने वाले स्रोतों और बिजली उपकरणों, उद्योग, घरों, कृषि जैसे स्रोतों में ईंधन जलाने से निकलते हैं। हवा में मौजूद ये सूक्ष्म कण हमारे सांस लेने के दौरान बिना किसी रुकावट के सांसों के नलियों के रास्ते फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं। इससे मनुष्य को कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी हो सकती है। महानगरों में वायु प्रदूषण अधिक फैला है। वहां चौबीसों घंटे कल-कारखानों और वाहनों का विषैला धुआं इस तरह फैल गया है कि स्वस्थ वायु में सांस लेना दूभर हो गया है। यह समस्या वहां अधिक होती हैं जहां सघन आबादी होती है और वृक्षों का अभाव होता है।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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