हंसते हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए बिस्मिल

बाल मुकुन्द ओझा

पंडित रामप्रसाद बिस्मिल का नाम आज भी देश के बच्चे बच्चे की जुबान पर है। आज क्रांतिकारी, लेखक, इतिहासकार, साहित्यकार रामप्रसाद बिस्मिल का 123 वां जन्मदिवस है। उनका जन्म 11 जून 1897 को यूपी के शाहजहांपुर में हुआ था। आजादी के आंदोलन के मसीहा बिस्मिल किसी परिचय के मोहताज नहीं है। उनके लिखे ‘सरफरोशी की तमन्ना’ जैसे अमर गीत ने हर भारतीय के दिल में जगह बनाई और अंग्रेजों से भारत की आजादी के लिए वो चिंगारी छेड़ी जिसने ज्वाला का रूप लेकर ब्रिटिश शासन के भवन को लाक्षागृह में परिवर्तित कर दिया। अंग्रेजी सत्ता को दहला देने वाले काकोरी काण्ड को रामप्रसाद बिस्मिल ने ही अंजाम दिया था।

बिस्मिल’ एक महान क्रन्तिकारी ही नहीं, बल्कि उच्च कोटि के कवि, शायर, अनुवादक, बहुभाषाविद् व साहित्यकार भी थे। तीस साल के नौजवान के जीवनकाल में उसकी कुल मिलाकर 11 पुस्तकें प्रकाशित हुईं जिनमें से एक भी गोरी सत्ता के कोप से नहीं बच सकीं और सारी की सारी जब्त कर ली गयीं। वह दुनिया का ऐसा पहला क्रांतिकारी था, जिसने क्रांतिकारी के तौर पर अपने लिए जरूरी हथियार अपनी लिखी पुस्तकों की बिक्री से मिले रुपयों से खरीदे थे। बिस्मिल ने हिन्दू-मुस्लिम एकता पर काफी काम किए हैं। सरकार ने अशफाकउल्ला खां को रामप्रसाद का दाहिना हाथ करार दिया।  बिस्मिल के गीत की ये पंक्ति सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है आज भी घर घर में गयी जाती है। उनका गीत आज भी जब लोग सुनते हैं, तो शरीर में एक अजब सी ऊर्जा दौड़ जाती है और रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इस गीत को तो हर कोई गुनगुनाता है। उन्होंने देश को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिये अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया।

भारत के आजादी के आंदोलन में काकोरी कांड एक बड़ी घटना है । काकोरी कांड की  योजना महान क्रन्तिकारी पंडित राम प्रसाद बिस्मिल ने बनाई थी। विद्रोही आंदोलन चलाने के लिए धन की कमी थी। बिस्मिल को रेल से सरकारी खजाने को ले जाने की सूचना अपने सूत्रों से मिली थी। सहारनपुर पैसेंजर ट्रेन से जा रहे सरकारी रेल की धनराशि को लूटने की योजना रामप्रसाद बिस्मिल ने 9 अगस्त 1925 को सायकाल के समय बनाई थी। जिसमें 10 सदस्यों का गठन किया गया था। काकोरी स्टेशन से ट्रेन जैसे ही काकोरी स्टेशन से ट्रेन आगे चली थी। उसी दौरान पंडित राम प्रसाद बिस्मिल ने ट्रेन की चेन खींच दी। उस ट्रेन में चंदशेखर आजाद ,अशफाक उल्ला खा ,राजेंद्र नाथ लाहिड़ी,ने ट्रेन के ड्राइवर व गार्ड को बंधक बना लिया था। इन क्रांतिकारियों ने लगभग 8 हजार रुपए की नगदी लूटने में सफलता हासिल की थी। इस कांड में 40 गिरफ्तारियां हुईं। पुलिस ने उन्हें भी पकड़ा, जो इसमें शामिल नहीं थे। गोविंद बल्लभ पंत, चंद्र भानु गुप्त और कृपा शंकर हजेला ने क्रांतिकारियों का केस लड़ा, लेकिन हार गये। मामला 16 सितंबर 1927 को चार लोगों को फांसी की सजा सुनायी गई। अंतिम सुनवाई के लिये लंदन की प्रिविसी काउंसिल भेजा गया, जहां से वापस भेज दिया गया। करीब 18 महीनों के बाद 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी दे दी गई। उसी दिन अशफाख उल्लाह खां को फैजाबाद जेल में और रौशन सिंह को इलाहाबाद जेल में फांसी दी गई। बिस्मिल के एक और साथी राजेंद्र नाथ लहिरी को दो दिन के बाद गोंडा जेल में फांसी दे दी गई।

 

 

 

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