नए उपभोक्ता कानून से मिलेगा उपभोक्ता हितों को संरक्षण

राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस 24 दिसंबर

बाल मुकुन्द ओझा

राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस 24 दिसंबर को मनाया जाता है। आज हर व्यक्ति उपभोक्ता है, चाहे वह कोई वस्तु खरीद रहा हो या फिर किसी सेवा को प्राप्त कर रहा हो। उपभोक्ता उस व्यक्ति को कहते हैं, जो विभिन्न वस्तुओं एवं सेवाओं का या तो उपभोग करता है अथवा उनको उपयोग में लाता है। वस्तुओं में उपभोक्ता वस्तुएं (जैसे गेहूं, आटा, नमक, चीनी, फल आदि) एवं स्थायी वस्तुएं (जैसे टेलीविजन, रेफरीजरेटर, टोस्टर, मिक्सर, साइकिल आदि) सम्मिलित है। जिन सेवाओं का हम क्रय करते हैं, उनमें बिजली, टेलीफोन, परिवहन सेवाएं, थियेटर सेवाएं आदि सम्मिलित है।
भारत सरकार ने तीन दशक पुराने उपभोक्ता संरक्षण कानून, 1986 को बदल कर इसकी जगह उपभोक्ता संरक्षण कानून, 2019 को लागू कर दिया है। नए कानून में उपभोक्ताओं के हित में कई कदम उठाए गए हैं और पुराने नियमों की खामियां दूर की गई हैं। यह कानून बेहद सख्त है और उपभोक्ता को ज्यादा ताकत देगा। नए कानून में सेंट्रल रेगुलेटर का गठन, भ्रामक विज्ञापनों पर भारी पेनाल्टी और ई-कॉमर्स फर्मों और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस बेचने वाली कंपनियों के लिए सख्त दिशा निर्देश शामिल हैं। बताते है नए कानून के अमल में आने से उपभोक्ता हितों का संरक्षण हुआ है और इससे पहले से ज्यादा अधिकार मिले है। अब कहीं से भी उपभोक्ता शिकायत दर्ज कर सकता है। पहले उपभोक्ता वहीं शिकायत दर्ज कर सकता था, जहां विक्रेता अपनी सेवाएं देता है। ई-कॉमर्स से बढ़ती खरीद को देखते हुए यह शानदार कदम है। कारण है कि इस मामले में विक्रेता किसी भी लोकेशन से अपनी सेवाएं देते हैं। इसके अलावा कानून में उपभोक्ता को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए भी सुनवाई में शिरकत करने की इजाजत है। इससे उपभोक्ता का पैसा और समय दोनों बचेंगे। मैन्यूफैक्चरिंग में खामी या खराब सेवाओं से अगर उपभोक्ता को नुकसान होता है तो उसे बनाने वाली कंपनी को हर्जाना देना होगा।
उपभोक्ता संरक्षण कानून जन हित का एक सार्थक प्रयास है। इसका निर्माण उपभोक्ताओं की हितों की रक्षा के लिए, उन्हें जागरूक करने के लिए और उन्हें न्याय दिलाने के लिए बनाया गया एक कानून है। यह दिवस उपभोक्ता आंदोलन को अवसर प्रदान करता है और उसके महत्व को उजागर करता है। इसके साथ ही हर उपभोक्ता को अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों के प्रति जागरुक करने की प्रेरणा देता है।

उपभोक्ताओं को ठगने के नये-नये तरीके बाजार में देखने को मिल रहे हैं। आम आदमी अपने घरेलू और रोजमर्रा के काम में आने वाले सामान की गारन्टी-वारन्टी, बीमा और सर्विसिंग के चक्कर में हैरान-परेशान है। उपभोक्ता ठगी और लूट के इस मायाजाल में फंसता चला जारहा है और इससे निकलने का कोई रास्ता उसे नजर नहीं आ रहा है। आजकल बीमा पॉलिसियों की जानकारी के नाम पर आने वाले फोन काल्स ने भी जीना दूभर कर रखा है। ठगी के अजब-गजब तरीकों से बाजार भरा पड़ा है। यदि आपने अपने वाहन का बीमा करा रखा है ओर यह जानकर अपने को सुरक्षित समझ रखा है कि दुर्घटना का क्लेम आपको सही-सही मिल जायेगा तो मुगालते में मत रहिये। बीमा कराने के दौरान बीमा प्रतिनिधि आपको आश्वस्त करता है कि दुर्घटना में होने वाला हर्जाना आपको शत प्रतिशत या मामूली राशि काटकर मिल जायेगा। मगर दुर्घटना का क्लेम लेते समय मोटर कम्पनियां बिल में से एक बड़ी राशि आपसे वसूल कर लेती है। आपको बताया जाता है कि इसमें फाइल चार्जेज और कुछ पाटसर्् के पैसे आपको वहन करने होंगेे। कार मालिक ठगा सा रह जाता है।
इसी भांति जब आप कोई घरेलू इलेक्ट्रॉनिक सामान खरीदते हो तो एक से पांच साल की वारन्टी दी जाती है। शर्तें बहुत ही छोटे अक्षरों में लिखी जाती है, जो कि पढ़ने में नहीं आती। वारन्टी पीरियड में आपका उपकरण खराब हो गया तो उसे ठीक कराना या बदलवाना टेढ़ी खीर है। आप जिस नम्बर पर शिकायत दर्ज करवाते हैं, वहाँ बड़ी मुश्किल से आपका सम्पर्क हो पाता है। शिकायत दर्ज कराने के बाद कई दिन तक कोई मैकेनिक आता नहीं है। यदि मैकेनिक आपके घर आ गया तो वह आपकी परेशानी बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। आपका फ्रीज खराब हो गया और वारण्टी पीरियड में है तो वह वर्कशॉप ले जाने के नाम पर आपसे हजार रूपये वसूलेगा। वह आपको बतायेगा कि परिवहन शुल्क आपको देना है। फिर बतायेगा जो पार्ट्स खराब है उसे ठीक कर दिया है मगर कुछ ऐसे पाटर््स होते हैं, जिनकी कोई वारन्टी नहीं होती, उसकी राशि आपसे वसूल करेगा। अच्छी सर्विस के नाम पर उपभोक्ता ठगी के मायाजाल में फंस कर अपने को असहाय महसूस करते है । इस मायाजाल से निकलने के लिए वारन्टी सर्विस की शर्तों को भलीभांति समझने और जागरूक होने की महत्ती जरूरत है।
सरकार ने उपभोक्ताओं को शोषण से बचाने के लिए नए कानून को अमलीजामा जरूर पहुँचाया है मगर देखने की बात है ऑनलाइन के इस युग में उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा में यह कानून कहाँ कारगर साबित होता है।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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