जनचेतना के प्रतीक थे स्वामी श्रद्धानन्द

बाल मुकुन्द ओझा

भारत के अनेक महापुरुषों ने अपने विचारों और सिद्धांतों पर चलते हुए देश और समाज की भलाई के लिए अपने प्राणों की आहुति दी उनमें स्वामी श्रद्धानन्द का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। देश के लिए सर्वस्व समर्पित करने वाले स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती भारत के महान शिक्षाविद, स्वतंत्रता सेनानी तथा आर्यसमाज के संन्यासी थे जिन्होंने देशभर में स्वामी दयानन्द सरस्वती की शिक्षाओं का प्रसार किया। वे भारत के उन महान राष्ट्रभक्त संन्यासियों में अग्रणी थे, जिन्होंने अपना जीवन स्वाधीनता, स्वराज्य, शिक्षा तथा वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया था। 23 दिसंबर, 2021 को उनके 95 वें बलिदान दिवस पर देश उन्हें श्रद्धा से नमन करता है। स्वामी श्रद्धानन्द की 23 दिसंबर, 1926 को चांदनी चौक, दिल्ली में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी ।
स्वामी श्रद्धानन्द का जन्म 2 फरवरी सन् 1856 को पंजाब के जालन्धर जिले के तलवान ग्राम में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके पिता, लाला नानक चन्द, ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा शासित यूनाइटेड प्रोविन्स (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में पुलिस अधिकारी थे। उनका बचपन का नाम मुंशीराम था। बताया जाता है एक बार आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती वैदिक-धर्म के प्रचारार्थ बरेली पहुंचे। पुलिस अधिकारी नानकचन्द अपने पुत्र को साथ लेकर स्वामी दयानन्द का प्रवचन सुनने पहुँचे। युवावस्था तक मुंशीराम ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते थे। लेकिन स्वामी दयानन्द के तर्कों और आशीर्वाद ने मुंशीराम को दृढ़ ईश्वर विश्वासी तथा वैदिक धर्म का अनन्य भक्त बना दिया। उनका विवाह श्रीमती शिवा देवी के साथ हुआ था। उन्होंने वकालत की शिक्षा ग्रहण की और एक सफल वकील बने तथा काफी नाम और प्रसिद्धि प्राप्त की। 1917 में उन्होने सन्यास धारण कर लिया और स्वामी श्रद्धानन्द के नाम से विख्यात हुए।
उनका राजनैतिक जीवन रोलेट एक्ट का विरोध करते हुए एक स्वतन्त्रता सेनानी के रूप में प्रारम्भ हुआ। अच्छी-खासी वकालत की कमाई छोड़कर स्वामीजी ने ”दैनिक विजय” नामक समाचार-पत्र में ”छाती पर पिस्तौल” नामक क्रान्तिकारी लेख लिखे। स्वामीजी महात्मा गांधी के सत्याग्रह से प्रभावित थे। जालियांवाला बाग हत्याकाण्ड तथा रोलेट एक्ट का विरोध वे हिंसा से करने में कोई बुराई नहीं समझते थे।
स्वामीजी ने 13 अप्रैल 1917 को संन्यास ग्रहण किया, तो वे स्वामी श्रद्धानन्द बन गये । आर्यसमाज के सिद्धान्तों का समर्थक होने के कारण उन्होंने इसका बड़ी तेजी से प्रचार-प्रसार किया। वे नरम दल के समर्थक होते हुए भी ब्रिटिश उदारता के समर्थक नहीं थे। आर्यसमाजी होने के कारण उन्होंने हरिद्वार में गंगा किनारे गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना कर वैदिक शिक्षा प्रणाली को महत्व दिया।
दलितों को धार्मिक स्थलों में प्रवेश नहीं दिए जाने से वह बहुत आहत थे। मनुष्य का मनुष्य से ऐसा बरताव उन्हें कचोटता था। स्वामीजी ने दलितों के साथ हो रहे छूआछूत का मुखर विरोध किया और हवन यज्ञ में साथ बिठाकर सदियों से चली रही असमानता को खत्म करने का काम किया। उस समय कट्टरवादियों ने उनका विरोध भी किया लेकिन वह सामाजिक असमानता के खिलाफ लड़ाई लड़ते रहे। स्वामी श्रद्धानन्द ने दलितों की भलाई के लिए आगे बढ़कर कार्य किये। उन्होंने कांग्रेस के स्वाधीनता आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। कांग्रेस में उन्होंने 1919 से लेकर 1922 तक सक्रिय रूप से महत्त्वपूर्ण भागीदारी की। 1922 में अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया, लेकिन उनकी गिरफ्तारी कांग्रेस के नेता होने की वजह से नहीं हुई थी, बल्कि वे सिक्खों के धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए सत्याग्रह करते हुए बंदी बनाये गए थे। स्वामी श्रद्धानन्द कांग्रेस से अलग होने के बाद भी स्वतंत्रता के लिए कार्य लगातार करते रहे। हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए स्वामी जी ने जितने कार्य किए, उस वक्त शायद ही किसी ने अपनी जान जोखिम में डालकर किए हों। उन्होंने समाज के हर वर्ग में जनचेतना जगाने का कार्य किया।

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