कमजोर की सहायता का दिन है मानव एकता दिवस

बाल मुकुन्द ओझा

अंतर्राष्ट्रीय मानव एकता दिवस हर साल 20 दिसंबर को मनाया जाता है। यह दिवस मनाने का उद्देश्य है लोगों को विविधता में एकता का महत्व बताते हुए जागरूकता फैलाना। दुनिया के विभिन्न देश इस दिन अपनी जनता के बीच शांति, भाईचारा, प्यार, सौहार्द और एकता के संदेश का प्रसार करते हैं। विश्व मैत्री पटल पर समग्र निगाह दौड़ाये तो पाएंगे दोस्ती की हमारी भावना तार तार हो रही है। यह किसी एक देश की कहानी नहीं है अपितु दुनियाभर में मानव एकता क्षीण होती जा रही है। .हमारे निहित स्वार्थ हम पर ही हावी हो रहे है फलस्वरूप भाईचारा और प्यार मोहब्बत का सन्देश लुप्त होता जा रहा है। आज विश्व एक परिवार के रूप में है। विश्व समुदाय को मिलकर एकता दिवस के महत्व को प्रमाणिक करना होगा तभी विश्व में शांति, एकता व भाईचारा कायम रहेगा ।
यह कोरोना संक्रमण का काल है। इस दौरान पीड़ित मानवता की सेवा के लिए बड़े कदम उठाने की महती जरुरत है। कोरोना महामारी ने जहाँ बेकारी और बेरोजगारी बढ़ाई है वहां गरीबी और भुखमरी में भी इजाफा किया है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने विकसित देशों से अपेक्षा की है की कोरोना महामारी से लोगों को बचाने के लिए गरीब और विकासशील देशों की हर संभव मदद करें ताकि मिलजुलकर मानव एकता की मिसाल कायम हो सके।
अंतर्राष्ट्रीय मानव एकता दिवस कमजोर की सहायता कर उसे बराबरी का सन्देश देता है। साथ ही सामाजिक, आर्थिक विषमता को दूर कर एकता को बढ़ावा देने और गरीबी उन्मूलन में मदद करने के लिए नवीन तरीकों को खोजने के तरीके पर बहस करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इस दिन सरकारों को अंतर्राष्ट्रीय समझौते का स्मरण कराया जाता है। एकता का महत्व समझाने और दुनिया से गरीबी मिटाने को लेकर भी यह दिन मनाया जाता है। वैश्विक समाज में एक हद तक अमीरी और गरीबी के बीच खायी को पाटना भी इस दिवस को मनाने का एक अहम् उद्देश्य है।
विश्व के अनेक देश आज भी भुखमरी के शिकार है। मानव एकता का सन्देश देने से पूर्व यह जरूरी है की हम लोगों को भुखमरी से बचाएं और उनमें गरीबी से लड़ने का जज्बा जगाएं और उनकी हर संभव सहायता करें तभी अंतर्राष्ट्रीय मानव एकता का हमारा सपना पूरा होगा। दुनिया भर में भूखे पेट सोने वालों की संख्या में कमी नहीं आई है। यह संख्या आज भी तेजी से बढ़ती जा रही है। विश्व में आज भी कई लोग ऐसे हैं, जो भुखमरी से जूझ रहे हैं। विश्व की आबादी वर्ष 2050 तक नौ अरब होने का अनुमान लगाया जा रहा है और इसमें करीब 80 फीसदी लोग विकासशील देशों में रहेंगे। एक ओर हमारे और आपके घर में रोज सुबह रात का बचा हुआ खाना बासी समझकर फेंक दिया जाता है तो वहीं दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें एक वक्त का खाना तक नसीब नहीं होता और वह भूख से मर रहे हैं। कमोबेश हर विकसित और विकासशील देश की यही कहानी है। दुनिया में पैदा किए जाने वाले खाद्य पदार्थ में से करीब आधा हर साल बिना खाए सड़ जाता है।
भारत की बात करें तो आजादी के 74 वर्षों के बाद भी हम गरीबी और कुपोषण से मुक्त नहीं हो सके है। ऐसे में विविधता में एकता कैसे होगी यह विचारणीय है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि भारत में हर साल कुपोषण के कारण मरने वाले पांच साल से कम उम्र वाले बच्चों की संख्या दस लाख से भी ज्यादा है। दक्षिण एशिया में भारत कुपोषण के मामले में सबसे बुरी हालत में है। देश के सामने गरीबी, कुपोषण और पर्यावरण में होने वाले बदलाव सबसे बड़ी चुनौती हैं। इससे निपटने के लिए हर स्तर पर प्रयास करने की जरूरत है। भारत में भूख की समस्या चिंताजनक स्तर तक पहुंच गई है।
वैश्विक खाद्य सुरक्षा सूचकांक की रिपोर्ट कहती है कि भारत की 68.5 फीसद आबादी गरीबी रेखा के नीचे रहती है। कुपोषण और भुखमरी गरीबी से जुड़ी हुई है। बताया जाता है विश्व स्तर पर लाख प्रयासों के बावजूद गरीबी, कुपोषण और भुखमरी में कमी नहीं आयी और यह रोग लगातार बढ़ता ही गया। इसका मुख्य कारण अन्न की बर्बादी को बताया गया। गरीबी और भूख की समस्या का निदान खोजने तथा जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। भोजन बर्बाद न करें और इसका सम्मान करें, क्योंकि आधी दुनिया मौलिक आवश्यकताओं के अभाव में जी रही है तथा काफी हद तक भुखमरी की शिकार है। विश्व समाज के संतुलित विकास के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य का सर्वांगीण विकास हो। विश्व में लोगों को संतुलित भोजन की इतनी मात्रा मिले कि वे कुपोषण के दायरे से बाहर निकल कर एक स्वस्थ जीवन जी सकें। लोगों को संतुलित भोजन मिल सके, इसके लिए आवश्यक है कि विश्व के देश आर्थिक रूप से कमजोर देशों की भरपूर मदद कर मानव एकता की भावना का परिचय दे।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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