घबराये हुए से लगते है मेरे सरकार

गहलोत सरकार के दो साल

बाल मुकुन्द ओझा

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के मुख्यमंत्रित्व के पहले दो कार्यकाल जितने आत्मविश्वास पूर्ण थे उनके मुकाबले वर्तमान कार्यकाल के दो वर्ष घबराये हुए से लगते है। इस दौरान गहलोत ने कोरोना संकट को तो काबू में कर लिया मगर आंतरिक विग्रह ने उनके तन मन को घायल कर दिया जिसके फलस्वरूप एक सौम्य मुख्यमंत्री को अपने ही एक साथी को निक्कमा और नकारा घोषित करना पड़ा। किसी भी सरकार की गति, प्रगति और अर्जित उपलब्धियों के लेखे जोखे के लिए दो साल पर्याप्त होते है। गहलोत सरकार का दावा है कि इन दो सालों में सरकार ने जनता की सरकार के रूप में संवेदनशीलता से कार्य किये और यह उसीका परिणाम है कि आज समाज के सभी वर्ग सरकार के कार्यों से बेहद संतुष्ट है। वहीँ विपक्ष का आरोप है कि सरकार की जनविरोधी नीतियों से सम्पूर्ण समाज खफा है।
गहलोत 1998 में पहली बार और 2008 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बने थे। उनके पूर्व के दोनों कार्यकाल एक दो अपवादों को छोड़कर अभूतपूर्व सूखा प्रबन्धन, विद्युत उत्पादन, संसाधनों का विकास, रोजगार सृजन, औद्योगिक और पर्यटन विकास, कुशल वित्तीय प्रबन्धन और सुशासन के लिए जाने जाते है। मुख्यमंत्री के रूप में गहलोत के पहले कार्यकाल के दौरान राजस्थान में इस सदी का भयंकार अकाल पड़ा। उन्होंने अत्यन्त ही प्रभावी और कुशल ढ़ंग से अकाल प्रबन्धन का कार्य किया। गहलोत को गरीब की पीड़ा और उसके दुख दर्द की अनुभूति करने वाले राजनेता के रूप में जाना जाता है। उन्होंने पानी बचाओ, बिजली बचाओ, सबको पढ़ाओ का नारा दिया जिसे राज्य की जनता ने पूर्ण मनोयोग से अंगीकार किया। अपने दूसरे कार्यकाल में गहलोत ने मुफ्त दवा, गरीब और असहाय को पेंशन सुविधा और सामाजिक सेवाएं उपलब्ध करने में देश विदेश में अपनी पहचान बनाई।
गहलोत 17 दिसंबर, 2018 को तीसरी बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने। गहलोत शासन के वर्तमान कार्यकाल के दो साल के कार्यों की समीक्षा करें तो पाएंगे इस अवधि में उनके आत्मविश्वास में कमी आयी है और वे बात बात पर अपनों के साथ केंद्र और मोदी पर हमलावर होते दिखाई दे रहे है। राजस्थान जैसे प्रदेश में जहां की राजनीति लगातार क्षत्रियों, जाटों और ब्राह्मणों के प्रभाव में रही हो, वहां जाति से माली और खानदानी पेशे से जादूगर के बेटे ने अपने आपको कांग्रेस के सबसे बड़े नेता के रूप में स्थापित कर लिया। वो 1998 में ऐसे समय पहली बार मुख्यमंत्री बने, जब प्रदेश में ताकतवर जाट और प्रभावशाली ब्राह्मण नेताओं का बोलबाला था। पहले कार्यकाल में वरिष्ठ नेता परसराम मदेरणा और नवल किशोर शर्मा के मुकाबले कांग्रेस आलाकमान ने गहलोत को तरजीह देकर सरकार का मुखिया बनाया था। तब उन्होंने भरपूर आत्मविश्वास के साथ अपनी सरकार चलाई। दूसरा कार्यकाल भी बिना विघ्न बाधा के पूरा किया। 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद सचिन पायलेट को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी गयी थी। पांच साल तक पायलेट जनता के बीच संघर्ष करते रहे और संगठन को मजबूत बनाते हुए 2018 में एक बार फिर कांग्रेस को सत्ता पर काबिज करवाया मगर मुख्यमंत्री की गद्दी तक नहीं पहुँच पाए। कांग्रेस आलाकमान ने पायलेट के संघर्ष को नजरअंदाज करते हुए एक बार फिर अपने सिपहसालार को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया।
सत्ता पर काबिज होने के चार माह बाद हुए लोकसभा चुनावों में प्रदेश में काँग्रेस का पाटिया साफ हो गया। दो सालों में उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट की बगावत और कोरोना महामारी ने प्रगति और विकास के मार्ग में कांटे बो दिए। गहलोत के दो वर्ष अपने लोगों से लड़ने के साथ केंद्र से लड़ने में ही बीत गए। उनके ये दो साल सियासी चुनौतियों से जूझते हुए बीते। गहलोत सरकार का दावा है इन दो वर्षों में चुनाव घोषणा पत्र में जनता से किये अनेक वादे पूरे किये जिनमें किसानों के कर्ज माफी का वादा भी शामिल है। बीस लाख से अधिक किसानों के 7692 करोड़ के अल्पकालिक फसली कर्जे माफ किये। सरकार का यह भी कहना है चुनाव घोषणा पत्र के 500 में से आधे से अधिक वादे पूरे कर दिए गए। इसके अलावा कोरोना संकट का कुशलता पूर्वक प्रबंधन कर जनता को राहत दिलाई। प्रधानमंत्री ने भी राजस्थान की सराहना की। युवाओं को रोजगार दिलाया साथ ही जन कल्याण के अनेक कार्यों को अमलीजामा पहनाया। सरकार की उपलब्धियों के साथ विफलताओं का बड़ा पिटारा भी खुला। पायलेट के साथ हुए सत्ता संघर्ष में विधायकों को 34 दिन बाड़े बंदी में रहना पड़ा। गहलोत ने पायलेट को निक्कमा और नकारा तक कहा और बाद में फिर गले लगाया। इसका सन्देश जनता में सही नहीं गया। लोगों को लगा गहलोत का आत्मविश्वास डोल गया है। इस दौरान राजनीतिक नियुक्तियां और मंत्री परिषद् का विस्तार भी गहलोत नहीं कर पाए। पायलेट खेमे की नाराजगी हाल फिलहाल कायम है। पंचायत चुनाव में कांग्रेस की हार भी गहलोत पचा नहीं पाए है हालाँकि निकाय चुनाव में जीत पर जरूर बल्ले बल्ले है।
भाजपा ने गहलोत के दो साल के शासन को विफलताओं से भरा करार दिया है। विपक्षी नेताओं का कहना है इस अवधि में भ्रष्टाचार और और दुष्कर्म के अपराधों में प्रदेश सिरमौर है। युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देने में सरकार विफल रही है। चहुंओर अराजकता का माहौल है।
गहलोत के ये दो साल निश्चय ही चुनौतीपूर्ण रहे है। मगर इससे कोई इंकार नहीं कर सकता की गहलोत के पहले के दो कार्यकालों के मुकाबले वर्तमान दो सालों में गहलोत ने अपने सियासी विश्वासों को खोया है। बात बात पर मोदी पर हमले को भी लोग हजम नहीं कर पा रहे है। केंद्र से बिना बात टकराव का रास्ता अख्तियार कर प्रदेश के विकास को अवरुद्ध किया है। गहलोत केंद्र पर ताबड़तोड़ हमला कर रहे है। इससे और कुछ नहीं तो संबंधों में खटास तो आएगी ही साथ में प्रदेश को किसी नयी परियोजना में धन मिलने में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है जिसका खामियाजा अंततोगत्वा प्रदेश को ही उठाना पड़ेगा।
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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