जलवायु सुधार कर भावी पीढ़ी का भविष्य सुनिश्चित करें

बाल मुकुन्द ओझा

जलवायु परिवर्तन दुनिया की सबसे बड़ी ज्वलंत पर्यावरणीय समस्याओं में से एक हैं। जलवायु परिवर्तन से लोगों को हो रही परेशानियों से दुनियाभर में चिंतन और मंथन का दौर चल रहा है। मगर इस पर अब तक कोई ठोस बात निकल कर सामने नहीं आयी है सिवाय वक्तव्य और संकल्पों के दोहराने के। अमीर देश गरीब देशों पर जलवायु बिगाड़ने की तोहमत लगा रहे है तो विकासशील देश विकसित देशों को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा रहे है। पांच साल पूर्व पेरिस समझौते में 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में 35 प्रतिशत तक कटौती का लक्ष्य तय किया गया था मगर इस दिशा में कोई ठोस प्रगति नहीं होने से पर्यावरण विशेषज्ञों ने चिंता और निराशा जाहिर की है। संयुक्त राष्ट्र ने भी देशों को चेतावनी दे दी है की वो अपने यहाँ तब तक जलवायु आपदा घोषित कर दें जब तक कि कार्बन निष्पक्षता का लक्ष्य नहीं हासिल कर लिया जाता है। संयुक्त राष्ट्र का केन्द्रीय उद्देश्य, इस सदी के मध्य तक कार्बन निष्पक्षता का लक्ष्य हासिल करने के लिये एक वैश्विक गठबन्धन बनाना है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने कहा है आइये, हम पृथ्वी पर हमले बन्द कर दें, और वो सबकुछ करें जो हमारे बच्चों और नाती-पोतों का भविष्य सुनिश्चित करने के लिये जरूरी है।
भारत ने कहा कि हमने 2005 के मुकाबले अपनी उत्सर्जन तीव्रता 21 फीसदी कम की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है हमारी सौर ऊर्जा क्षमता 2014 में 2.63 गीगावाट से बढ़कर अब 2020 में 36 गीगावाट हो गई है. हमारी नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता विश्व में चौथे नंबर पर है। ये 2022 से पहले 175 गीगावाट हो जाएगी और हमारा लक्ष्य 2030 तक इसे 450 गीगावाट करने का है।
लम्बे समय में मौसम में होने वाले परिवर्तन को जलवायु परिवर्तन कहते हैं। इस परिवर्तन के कारण मौसम में परिवर्तन आता है। जैसे अधिक गर्मी, ठण्ड, वर्षा या आवश्यकता से भी कम गर्मी, ठण्ड और वर्षा का होना। उत्तर भारत इस समय मौसम परिवर्तन की चपेट में है। कोरोना वायरस ने भी कोहराम मचा रखा है। बताते है ठंडा मौसम जाते ही गर्मी आएगी और कोरोना वायरस स्वत खतम हो जायेगा। मगर मौसम में आये परिवर्तन ने हमारी इस आशा को धूमिल कर दिया है। जलवायु विशेषज्ञों के अनुसार पिछली कुछ सदियों से हमारी जलवायु में धीरे-धीरे बदलाव हो रहा है यानी, दुनिया के विभिन्न देशों में सैकड़ों सालों से जो औसत तापमान बना हुआ था, वह अब बदल रहा है। भारत भी इसी मौसम परिवर्तन का शिकार हुआ है। ग्रीष्म ऋतु लंबी होती जा रही हैं और सर्दियां छोटी। पूरी दुनिया में ऐसा हो रहा है। इसे ही हम जलवायु परिवर्तन कहते है।
वर्तमान में जलवायु परिवर्तन विश्व के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभरा है। इससे निपटना वर्तमान समय की बड़ी आवश्यकता बन गई है। आँकड़े दर्शाते हैं कि 19वीं सदी के अंत से अब तक पृथ्वी की सतह का औसत तापमान लगभग 1.62 डिग्री फॉरनहाइट (अर्थात् लगभग 0.9 डिग्री सेल्सियस) बढ़ गया है। पृथ्वी के तापमान में वृद्धि होने से हिमनद पिघल रहे हैं और महासागरों का जल स्तर बढ़ता जा रहा, परिणामस्वरूप प्राकृतिक आपदाओं और कुछ द्वीपों के डूबने का खतरा भी बढ़ गया है। जैसे-जैसे मानवीय गतिविधियाँ बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी वृद्धि हो रही है और जिसके कारण वैश्विक तापमान में वृद्धि हो रही है। जानकारों ने अनुमान लगाया है जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियाँ और अधिक बढ़ेंगी तथा इन्हें नियंत्रित करना मुश्किल होगा। ऋतु परिवर्तन तापमान वृद्धि, समुद्र स्तर में वृद्धि, फसल चक्र में परिवर्तन आदि जलवायु परिवर्तन हमारे लिये भूस्खलन, सूनामी, महामारी, पलायन एवं स्वास्थ्य के लिये बड़ी आपदायें हैं।
जलवायु परिवर्तन ताजे पानी, कृषि योग्य भूमि और तटीय व समुद्री संसाधन जैसे भारत के प्राकृतिक संसाधनों के वितरण और गुणवत्ता को परिवर्तित कर सकता है। कृषि, जल और वानिकी जैसे अपने प्राकृतिक संसाधन आधार और जलवायु संवेदनशील क्षेत्रों से निकट रूप से जुड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश भारत को जलवायु में अनुमानित परिवर्तनों के कारण गंभीर संकटों का सामना करना पड़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र पैनल की रिपोर्ट में भारत पर पड़ने वाले असर का भी जिक्र है। इसका सबसे बड़ा असर हमारे जल संसाधनों पर पड़ सकता है। ब्रह्मपुत्र, गंगा और सिंधु नदी प्रणालियां हिमस्खलन में कमी के कारण विशेष रूप से प्रभावित हो सकती हैं। नर्मदा और ताप्ती को छोड़कर सभी नदी घाटियों के लिए कुल बहाव में कमी आ सकती है।
वैश्विक तापमान उम्मीद से अधिक तेज गति से बढ़ रहा है। कार्बन उत्सर्जन में समय रहते कटौती के लिए कदम नहीं उठाए जाते तो इसका विनाशकारी प्रभाव हो सकता है। ग्लोबल वार्मिंग (जलवायु परिवर्तन) यानी सरल शब्दों में कहें तो हमारी धरती के तापमान में लगातार बढ़ोतरी होना। ग्लोबल वार्मिंग जीवाश्म ईंधन उत्सर्जन में वृद्धि के कारण पृथ्वी के वायुमंडल के तापमान में वृद्धि को दर्शाता है। जलवायु परिवर्तन के बारे में बदलते जलवायु रुझान को दर्शाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो ग्लोबल वार्मिंग के कारण जलवायु परिवर्तन होता है।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

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