बदलती सोच और बदलते व्यवहार

डॉ. नन्दिनी शर्मा

21वीं सदी के जिस दौर में हम आज जी रहे हैं यह दौर तकनीकी उच्चता व अधिकतम प्रतिस्पर्धा का युग है। ऐसा लगता है मनुष्य एक दौड़ में भागा जा रहा है और यह आवश्यक भी है अन्यथा वह दुनिया की भीड़ में पीछे रह जाऐगा। वैसे जीवन चलायमान है। रूका हुआ तो पानी भी सड़ जाता है। परन्तु आजकल एक और चलन चल रहा है किसी की कही गई बात का तुरन्त जवाब देने का, जिस स्तर पर बात कही गई है उसी स्तर पर जवाब देने का बिना उसका परिणाम विचारें। व अपने आप को यह कह कर संतुष्ट करेंगे की ‘‘सुना दिया मैने भी‘‘ आदि। लोगों में सहनशक्ति ना के बराबर हो गई है। अगर हम जरा भी संभली हुई स्थिति में हैं तो क्या मजाल कोई हमें मजाक में भी कुछ बोल जाऐ चाहे उसका अर्थ वह हो या ना हो जो हम लगा के बैठे हैं परन्तु हमें उसका प्रतिकार तुरंत करना है। और अगर हम समाज या व्यवस्था में बहुत ही अच्छी स्थिति में हैं तो फिर बात ही क्या।
ऐसा लगता है किसी के द्वारा कहे गऐ शब्दों का अगर आपने प्रतिकार नहीं किया तो आप कमजोर व बेइज्जत व्यक्ति हैं। कैसी प्रतिस्पर्धा है ये, बड़ा कहलाने की कैसी चाहत है लोग शान से कहते हैं एक बार करारा जवाब दे दो तो दुबारा सामने वाला व्यक्ति आपसे संभल कर बोलेगा। हो सकता है किन्ही परिस्थितियों में यह सही भी हो लेकिन क्या हमें किसी व्यक्ति के व्यवहार को परखने के लिऐ उसे थोड़ा समय नहीं दे ना चाहिये? क्या यह नौबत ऐसे व्यवहार के एक से अधिक बार करने पर नहीं आनी चाहिये।
जो लोग कहे गऐ शब्दों का और ज्यादा ऊँची भाषा या सटीक शब्दों में जवाब दे देते हैं और अपने आप को संतुष्ट पाते हैं क्या यह उनका व्यवहार उनकी छवि खराब नहीं करता। अगर आज मैं अपने चारों तरफ नजरें घुमाऊ तो कई लोग मुझे ऐसे मिलेंगे जिनसे बात करने में ही लोग कतराते हैं। और वो इस बात का ज्रिक बड़े शान से करते हैं की मुझसे बोलने की हिम्मत नहीं है…..।
मैं ये मानती हूँ हमारे माता पिता द्वारा दिये गऐ संस्कार इस परिप्रेक्ष्य में 100 प्रतिशत मान्य नहीं है की फलों से लदा हुआ पेड़ झुक कर रहता है या मनुष्य की वाणी ही उसके स्तर व चरित्र को दर्शाती है वगैरह। क्योंकि इस तरह के संस्कार कई बार शोषण का भी शिकार हो जाते है क्योंकि लोग विनम्रता को कमजोरी भी मान लेते हैं परन्तु कोई बीच का रास्ता भी तो होगा। कहा गया है कि किसी को इतने कडवे मत बनो की वे थूक ही दे व किसी के इतने मीठे भी मत बनों की वो पी ही जाऐं।
आए दिन हम देखते हैं सोशल साईटस पर लड़ाई तकरार चलती रहती है। मुझे लगता है कई बार यह इस स्तर पर आ जाती है कि दोनों पक्षकार एक दूसरे को जवाब दे ने के लिऐ शोध करते रहते हैं व अधिक प्रभावकारी शब्दों का चयन करते रहते हैं व अपना सुख चौन खत्म करते रहते हैं। उनकी तकरार पर लोगों की प्रतिक्रियाऐ आती रहती हैं और वे और ज्यादा जोश में आते हैं उन्हे ये समझ नही आता की उनकी लड़ाई लोगों के मनोरंजन का विषय है।
पिछले कुछ दिनों कुछ सेलिब्रेटिज की बातें हमने देखी सुनी, मुझे आश्चर्य होता है लोगों के सोशल मीडिया पर अगरिमामयी भाषा के साथ जवाब पर जवाब दे कर कुछ समय तक तो आप हिट हो सकते हो पर क्या लम्बे समय तक ये सब रह सकता है, जवाब देने वाला व्यक्ति भी एक दिन थक जाऐगा तो क्या वो उस दिन छोटा हो जाऐगा।
कई बार हम किसी की बातों से व्यथित हो जाते है और शायद जवाब देना जरूरी हो जाता है तो क्या हम उससे निजी तौर पर बात नहीं कर सकते मतलब तो मन की शांति का है ना क्या वो शांति सबके सामने उसी मंच पर तमतमाकर बोलने से मिलती है नहीं बल्कि मन और अषांत होता है। गुस्सा, आवेश, आक्रोष ये मनुष्य की स्वाभाविक प्रक्रियाऐं हैं लेकिन ये तो मनुष्य के उदगम से मनुष्य के साथ है, परन्तु स्वयं ऊपर साबित करने की प्रवत्ति, किसी से कम नहीं आंके जाने का डर, प्रतिस्पर्धा, ये वो प्रवृत्तियां हैं जो हम देखें तो हाल के कुछ वर्षों में ज्यादा प्रभावी हुई है।

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