कुदरत और कुम्हार का घड़ा

मंगल व्यास भारती

हम जिस परमात्मा को मानते है। वह परमात्मा सब जगह है। सब समय रीति से परिपूर्ण है। केवल यह विश्वास कर लें। परमात्मा विश्वास से मिलते हैं। अगर हम यह मान ले। विश्वास कर लें धारणा कर लें कि परमात्मा सब जगह है तो बहुत सुगमता से परमात्मा की प्राप्ति हो जायेगी। संसार की प्राप्ति परिश्रम करने से होती है। स्वाभाविक हैं जो कि कुदरत के रुप छटा से चित्रण होती हैं। वो एक मिट्टी जो एक खामोशी से पैरों तले कण रुप में आलौकित रहती हैं। कभी किसी ने नहीं इसे जाना पहचाना। वो प्रथम चरण कृष्ण का था जो कि धरा पर धरते ही धरती माता ने कहा कि प्रभु मेरे पास और कुछ नहीं तब कृष्ण भगवान ने उसे प्रसाद भेट समझ स्वीकार किया। और मिट्टी का महत्व बताया। उसी प्रकार फिर इंसानी रुप में जाना पहचाना वो इंसान एक नाम कुम्हार जो मिट्टी के बर्तन बनाने लगा तब से उसे कुम्हार कहने लगे। क्योंकि कुदरत का सच्चा साथी जो कि पानी के महत्व को समझा और फिर एक घड़े का निर्माण हुआ जो हमारा युग युगांतर से साथी बन चला। जो हमारे वेद कहते हैं कि गर्मियों के मौसम में पानी पिलाने से धर्म होता हैं।
पानी चैत्र बैसाख जेष्ठ अषाढ चार महीने पिलाने का बहुत धर्म हैं जो जगह जगह प्याऊ लगाई जाती हैं। और ग्यारह स को पानी का घड़ा दिया जाता हैं। खेत में भी पेड़ के नीचे घड़ा धरा जाता जिससे आते जाते राहगीरों को ठंडा पानी मिल सके।इसी तरह तड़फ में भटकता कुदरत के प्रकाश में स्वयं को उस परमात्मा में लीन कर जाना की इस मिट्टी के स्वरुप को जो मूक मूरत बना देखा फिर जाना अपनी प्रभावी कला ओजस्व जिसमें उसे लगा कि कुदरत के इस पेड़ रुपी लकड़ी का क्या रुप बनाया जायें. इस प्रकार चाँक बनाई और उस पर गीली मिट्टी को गोंद कर मन की कल्पना से एक घड़ा तैयार हुआ. जो उस प्रभु की अपनी असीम शक्ति का आलौकित दर्शन का आभास होता हैं। जिसे चाँक पर बना भठ्ठे पर पका कर तैयार किया जाता हैं। और उस पर सुंदर चित्रण कर आर्कषित हो जाता हैं। और उसमें पानी अमृत के समान बन जाता हैं। जो ईश्वर का वरदान बन गया ये सब इतिहास में गवाह हैं कि मिट्टी का बर्तन जो कृष्ण के समय दही दूध आदि सब उन्हीं में कार्य किया जाता था। समय बदलता रहता हैं। जो कि आधुनिक युग यानी विज्ञान युग आया तब सब चीजें बदलती गई जो कि आज सामने है जो इलेक्ट्रिक चीजें आ गई जिसमें ठंडे पानी का फ्रिज आ गया तो घड़ा ओर कुम्हार भी लुप्त हो गए। ये सब कुछ समय के खेल है. जो इंसान को अपाहिज करनेचला हैं।आजकल हर घर में नल कनेक्शन आदि लगे हुए है. जिससे वह कोई काम शरीर को तकलीफ नहीं देता हैं। समझने की आवश्यकता है कि कुदरत और कुम्हार का घड़ा क्या गरीब का फ्रिज बनकर रह जायेगा। कुम्हार का घड़ा दर्शनालय में देखने योग्य बनकर रह जायेगा। सीख जो संस्कृति के रुप में हमारे घर में जो बड़े बुढों से मिलती थी. जो कहने में ये है कि बच्चा छोटा जब होता है कुम्हार के उस घड़े के समान होता हैं. जो बचपन में सीखता वही वह अपनी जिंदगी में आने वाले समय में करता है तो कच्चे घड़े को जबतक पकाया नहीं जाता तब तक उसकी दिशा बदलकर टेडा मेढा हो सकता हैं। उसी तरह बच्चों का भविष्य बदल सकता हैं।

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