भारत के 75 फीसदी ज़िले और आधी आबादी अतिविषम जलवायु से हो रहे हैं प्रभावितः CEEW अध्ययन

अध्ययन के अनुसार भारत के 40 फीसदी से अधिक ज़िलों में जलवायु संबंधी अतिविषम घटनाओं की प्रवृति में बदलाव देखा गया है

नई दिल्ली।  भारत के 75 फीसदी से अधिक ज़िले जहां, 63.8 करोड़ से अधिक लोग रहते हैं, उन्हें अतिविषम जलवायु जैसे चक्रवात, बाढ़, सूखा, लू और सर्द हवाओं का सामना करना पड़ता है। काउन्सिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेन्ट एण्ड वॉटर (CEEW) द्वारा किए गए विशेष स्वतन्त्र अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है। हाल ही के दशकों में इस तरह की जलवायु संबंधी अतिविषम घटनाओं की आवृति, तीव्रता और अप्रत्याशिता भी बढ़ी है। जहां एक ओर 1970 से 2005 के बीच भारत को अतिविषम जलवायु की 250 घटनाओं का सामना करना पड़ा, वहीं 2005 के बाद ऐसी 310 घटनाएं दर्ज की गई हैं। अध्ययन के अनुसार अतिविषम जलवायु घटनाओं की प्रवृति में भी बदलाव आया है जैसे भारत के 40 फीसदी ज़िलों में बाढ़-प्रभावी क्षेत्र अब सूखा-प्रभावी क्षेत्र बन गए हैं और इसकी विपरीत घटनाएं भी सामने आई हैं। अध्ययन का लॉन्च क्लाईमेट एम्बिशन समिट से दो दिन पहले किया गया जहां कई देशों के हिस्सा लेने की उम्मीद है, जो जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए इस अवसर पर कई ऐलान कर सकते हैं।

अबिनाश मोहंती, प्रोग्राम लीड, (CEEW) तथा अध्ययन के लेखक ने कहा, ‘‘पिछले 100 सालों में जलवायु में मात्र 0.6 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी के कारण जलवायु से सम्बन्धित भयावह घटनाओं के मामले तेज़ी से बढ़े हैं। अतिविषम जलवायु की बात करें तो भारत प्राकृतिक आपदाओं की दृष्टि से दुनिया का पांचवां सबसे अधिक जोखिम संभावनाओं वाला देश है और बाढ़ की दृष्टि से दुनिया की राजधानी बनने के लिए तैयार है। वित्त एवं तकनीक की उपलब्धता तथा मौसम एवं जलवायु संबंधी आंकड़ों को आम जनता तक पहुंचाना, जलवायु की प्रत्यास्थता के लिए बेहद ज़रूरी है, खसतौर पर दुनिया के दक्षिणी देशों जैसे भारत के लिए यह और भी महत्वपूर्ण है। इसी तरह भारतीय कृषि, उद्योगों, बड़े पैमाने की इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को जलवायु की अनियमितताओं से दूर रखने के लिए जोखिम मूल्यांकन के सिद्धान्त अपनाना भी महत्वपूर्ण है।

बाढ़ की आवृति में आठ गुना बढ़ोतरी

CEEW अध्ययन में पाया गया है कि पिछले 50 सालों में बाढ़ की आवृति तकरीबन 8 गुना बढ़ी है। इसक अलावा बाढ़ के कारण होने वाली घटनाएं जैसे भूस्खलन, भारी बारिश, तूफान और बादल फटना आदि में 20 गुना बढ़ोतरी हुई है। पिछले दो दशकों में बाढ़ की तीव्रता और आवृति तेज़ी से बढ़ी है। 1970 से 2004 के बीच, औसतन हर साल 3 विनाशकारी बाढ़ आती थी। हालांकि 2005 के बाद सालाना औसत बढ़कर 11 हो गया। साथ ही, 2005 तक इससे प्रभावित ज़िलों की संख्या 19 थी, जो 2005 के बाद अचानक बढ़कर 55 पर आ गई। 2019 में, भारत में विनाशकारी बाढ़ की 16 घटनाएं हुईं, जिनसे 151 जिले प्रभावित हुए।

अध्ययन में पाया गया है कि वर्तमान में भारत में 9.7 करोड़ से अधिक लोग विनाशकारी बाढ़ से प्रभावित हो रहे हैं। पिछले एक दशक में भारत के आठ सर्वाधिक बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में से छह जिले – बारपेटा, दरंग, धेमाजी, गोलपारा, गोलाघाट, सिवसागर- आसाम में थे। CEEW के अध्ययन में पता चला है कि जहां एक ओर मानसून के दौरान बारिश के दिनों की संख्या कम हुई है, वहीं राज्य में एक ही दिन में अत्यधिक बारिश की घटनाएं तेज़ी से बढ़ी हैं, जिसके चलते बाढ़ के मामले बढ़े हैं। 2000 के बाद, शहरी नियोजन, अतिक्रमण और वनों की कटाई के कारण भी शहरी बाढ़ में बढ़ोतरी हुई है।

पूर्वी तट पर चक्रवात के प्रभाव

CEEW अध्ययन के मुताबिक 2005 के बाद, चक्रवात से प्रभावित जिलों की सालाना औसत संख्या तीन गुना बढ़ी है और चक्रवात की आवृति दोगुना बढ़ी है। पिछले दशक में 258 जिले प्रभावित हुए। चक्रवात हॉटस्पॉट ज़िले- चेन्नई, कटक, पूर्वी गोदावरी, गंजम, नैलोर, उत्तरी 24 परगना, पुरी और श्रीकाकुलम- पूर्वी तट पर ऐसे मुख्य क्षेत्र रहे हैं। पूर्वी तट पर बढता तापमान, भूमि के उपयोग में बदलाव और वनों की कटाई के चलते चक्रवात के मामले बढ़े हैं। इसक अलावा, पूर्वी तट, पश्चिमी तट की तुलना में आर्थिक रूप से पिछड़ा है, ऐसे में अतिविषम जलवायु के प्रभाव यहां अधिक होते हैं। पिछले 50 सालों में चक्रवात के कारण होने वाली विनाशकारी घटनाओं जैसे बारिश, बाढ़ और तूफान में 12 गुना बढ़ोतरी हुई है। चक्रवात का संयुक्त प्रभाव किसी अन्य जलवायु घटना की तुलना में अधिक गंभीर है, क्योंकि इसके कारण जान-माल को अधिक नुकसान पहुंचता है।

हाल ही के वर्षों में गैर-तटीय ज़िले जैसे अरेरिया, बरेली, गोरखपुर और पटना में बादल फटने के बाद बाढ़ के मामले तेज़ी से बढ़े हैं। अध्ययन के मुताबिक स्थानीय जलवायु में बदलाव जैसे वनों की कटाई, भूमि के उपयोग में परिवर्तन, तापमान में बढ़ोतरी आदि के कारण मध्य भारत में इस तरह के मामले बढ़े हैं।

सूखे के कारण कृषि आय पर निरंतर प्रभाव पड़ रहा है

हालांकि पिछले दशकों में सूखे से निपटने के लिए तैयारी में सुधार हुआ है, किंतु अतिविषम जलवायु की घटनाएं आज भी भारतीय किसान को प्रभावित कर रही हैं। 2005 के बाद सूखे से प्रभावित ज़िलों का औसत 13 गुना बढ़ा है। तकरीबन 68 फीसदी भारतीय ज़िले सूखे या सूखे जैसी स्थितियों का सामना कर रहे हैं। पिछले दशक में भारत में सूखा-प्रभावी हॉटस्पॉट ज़िले थे- अहमदनगर, अनंतपुर, औरंगाबाद, बगलकोट, बीजापुर, चिक्काबल्लापुर, चित्तूर, गुलबर्गा और हसन। हालांकि सूखे के कारण जीवन के नुकसान के मामले कम हुए हैं किंतु कृषि और आजीविका की अनिश्चितताएं बढ़ी हैं।

जलवायु घटनाओं के बदलते प्रतिरूप

अध्ययन के मुताबिक बाढ़ प्रभावी ज़िले जैसे कटक, गुंटुर, कुरनूल, महबूबनगर, नालगोंडा, पश्चिम चम्पारन और श्रीकाकुलम हाल ही के वर्षों में सूखा प्रभावी हो गए हैं। तटीय दक्षिण भारतीय राज्य जैसे आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडू और कर्नाटक में भी सूखे के मामले बढ़े हैं। इसके अलावा बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा और तमिलनाडू के कई ज़िलों में एक ही सीज़न में बाढ़ और सूखा एक साथ पाए गए हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में जलवायु में होते बदलाव जैसे स्थानीय जलवायु, भूमि के उपयोग में बदलाव, वनों की कटाई, मैन्ग्रोव पर अतिक्रमण आदि इसका मुख्य कारण हैं।

अध्ययन के मुताबिक जोखिम मूल्यांकन के सिद्धान्त जलवायु नियन्त्रण की रणनीति में शामिल किए जाने चाहिए। पहले कदम के रूप में जोखिम एटलस के निर्माण की प्रस्तावना दी गई है जो मुख्य आपदा-संभावी क्षेत्रों जैसे तटों, गर्म क्षेत्रों, पानी के दबाव, फसलों के नुकसान, वेक्टर संचारी रोंगों एवं जैव विविधता के नाश आदि का मूल्यांकन कर सकें। इसमें एक समेकित आपातकालीन निगरानी प्रणाली का सुझाव भी दिया गया है जो आपदा की स्थिति में व्यवस्थित एवं स्थायी प्रतिक्रिया कर सके। इसके अलावा, इसमें सभी स्तरों पर जोखिम मूल्यांकन को महत्व दिया गया है, जिसमें हर स्तर पर सभी हितधारकों की भागीदारी को सुनिश्चित करना होगा।

CEEW का अध्ययन भारत में अतिविषम जलवायु के सूक्ष्म स्तरीय मूल्यांकन पर रोशनी डालता है। यह स्थानीकृत स्तर पर व्यापक जोखिम मूल्यांकन की ज़रूरत पर ज़ोर डालता है। इसके अलावा, जलवायु के जोखिम को पहचानना प्रधानमंत्री मोदी द्वारा यूएन क्लाइमेट एक्शन समिट 2019 के दौरान की गई घोषणा (global Coalition for Disaster Resilient Infrastructure-CDRI) के अनुरूप है।

यह अध्ययन भारत में अपनी तरह का पहला ज़िला स्तरीय मूल्यांकन है जो अतिविषम जलवायु की घटनाओं, इनकी जटिलताओं, गैर-रैखिक रूझानों एवं प्रतिरूपों पर चर्चा करता है। अतिविषम जलवायु कैटलॉग का विकास 50 वर्षों की एतिहासिक अवधि (1970-2019) के लिए स्थानीय एवं जलवायु के आधार पर मॉडलिंग के आधार पर किया गया है। CEEW भारत में जिला स्तर पर ऐतिहासिक पैमाने पर अतिविषम जलवायु कैटलॉग बनाने वाला पहला संगठन है।

Post add

Leave A Reply

Your email address will not be published.