अंधरे से जूझ रहे लोगों की जिंदगी में उजाला

बाल मुकुन्द ओझा

नेत्रदान की महत्ता को समझते हुए 10 जून को हर वर्ष अंतरराष्ट्रीय नेत्रदान दिवस के रुप में मनाया जाता है। आंखें स्वस्थ न हों तो संसार की सारी खूबसूरती बेमानी लगती हैं। फिर भी हम अपनी आंखों का पर्याप्त खयाल नहीं रख पाते। कई बार देखा गया है आँख में धूल अथवा अन्य किसी कारण से एलर्जी हो जाती है तो हम कितने बेचौन हो जाते है। इसलिए यह सच ही कहा गया है की आँख है तो जहान है।
हमारे सभी धर्मों में दया, परोपकार, जैसी मानवीय भावनाएँ सिखाई जाती हैं। यदि हम अपने नेत्रदान करके मरणोपरांत किसी की निष्काम सहायता कर सकें तो हम अपने धर्म का पालन करेंगे क्योकि इसमें कोई भी स्वार्थ नहीं है इसलिये यह महादान माना जाता है। नेत्रदान करने वाले व्यक्ति की मृत्यु के 6 से 8 घंटे के अंदर ही नेत्रदान कर देना चाहिए। जिस व्यक्ति को नेत्रदान के कॉर्निया का उपयोग करना है, उसे 24 घंटे के भीतर ही कॉर्निया प्रत्यारोपित कराना जरूरी होता है। नेत्रदान का मतलब शरीर से पूरी आंख निकालना नहीं होता। इसमें मृत व्यक्ति की आखों के कॉर्निया का उपयोग किया जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अनुमान के अनुसार विश्वभर में लगभग 285 मिलियन लोग नेत्रहीन हैं। इनमें से 39 लाख लोग अंधे और 246 मिलियन लोग मध्यम या गंभीर दृष्टि दोष वाले है। दृश्य दोष के प्रमुख कारणों में असंशोधित अपवर्तक कमियां 43 प्रतिशत और मोतियाबिंद 33 प्रतिशत हैं। अधिकांश अंधेपन (लगभग 80 प्रतिशत ) का बचाव यानि कि उपचार या रोकथाम की जा सकती है। विश्व के 20 प्रतिशत नेत्रहीन लोग भारत में हैं और हर वर्ष इनमें 20000 लोगों की वृद्धि हो रही है। शारीरिक, सामाजिक, मानसिक तथा आर्थिक चुनौतियों के कारण उनकी स्थिति सचमुच दयनीय है क्योंकि अक्षम लोग अपने आप से कुछ नहीं कर सकते और उन्हें दूसरों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। भारत मे करीब 1.25 करोड लोग दष्टिहीन है, जिसमे से करीब 30 लाख व्यक्ति नेत्ररोपण द्वारा दष्टि पा सकते हैं। सारे दष्टिहीन नेत्ररोपण द्वारा दष्टि नहीं पा सकते क्योंकि इसके लिये पुतलियों के अलावा नेत्र सबंधित तंतुओं का स्वस्थ होना जरुरी है। पुतलियां तभी किसी दष्टिहीन को लगायी जा सकती है जबकि कोई इन्हे दान में दे। नेत्रदान केवल मत्यु के बाद ही किया जा सकता है।
देश में हर साल 80 से 90 लाख लोगों की मृत्यु होती है लेकिन नेत्रदान 25 हजार के आसपास ही होता है। मृत्यु के बाद एक व्यक्ति चार लोगों को रोशनी दे सकता है। पहले दोनों आंखों से केवल दो ही कार्निया मिलती थी लेकिन अब नई तकनीक आने के बाद से एक आंख से दो कार्निया प्रत्यारोपित की जा रही हैं। डीमैक तकनीक से होने वाला यह प्रत्यारोपण शुरू हो गया है। खास बात यह है कि व्यक्ति के मरने पर उसकी पूरी आंख नहीं बदली जाती है केवल रोशनी वाली काली पुतली ही ली जाती है। दोनों कार्निया एक साथ नहीं बदली जाती है। मौत के छह घंटे तक ही कार्निया प्रयोग लायक रहती हैं।
देश में अभी 30 लाख लोग ऐसे हैं, जिन्हें कार्निया की जरूरत है। अगर उन्हें समय से कार्निया मिल जाए तो वे दुनिया का हर रंग देख पाएंगे। आँखों के स्वास्थ्य को बनाए रखना केवल एक व्यक्ति का नहीं कर्तव्य है, बल्कि यह समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। नेत्रदान द्वारा बड़ी संख्या में लोगों को लाभान्वित किया जा सकता हैं। मृत्यु के बाद किसी जरूरतमंद को अपनी आंखें देने की प्रक्रिया नेत्रदान कहलाती है। नेत्रदान महादान है, मनुष्य के जीवन में हर अंग का महत्व है, लेकिन द्ृष्टि के बिना जीवन का पूरा सुख नहीं मिलता। आंखें खुशी और दुख दोनों का भाव व्यक्त करती है। मृत्यु के बाद देहदान की तरह कुछ अंगों का दान किया जा सकता है। समाज में जागरूकता लाकर नेत्रदान के अभियान को गति दी जासकती है। दान की गई आंखें कार्निया संबंधी दृष्टिहीनता से प्रभावित लोगों के लिए ही उपयोगी होती है। इसमें किसी दृष्टिहीन व्यक्ति की आंख में दान किए गए कार्निया को ऑपरेशन द्वारा प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। कोई भी व्यक्ति चाहे, वह किसी भी उम्र, लिंग, रक्त समूह और धर्म का हों, वह नेत्रदाता हो सकता है। कम दृष्टि या दूर की दृष्टि के लिए लेंस या चश्मे का उपयोग करने वाले व्यक्ति या जिन व्यक्तियों की आँखों की सर्जरी हुई हों, यह सभी नेत्रदान कर सकते हैं। कमजोर दृष्टि नेत्रदान के रास्ते में बाधा नहीं है।

 

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