कोरोना काल में बचपन को सुरक्षित रखने के यूनिसेफ के प्रयास

11 दिसंबर 1946 में संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय बाल कोष स्थापित किया गया था

बाल मुकुन्द ओझा

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष को हम यूनिसेफ के नाम से भी जानते है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने यूनिसेफ को बाल अधिकारों के संरक्षण, समुचित विकास के अवसर उपलब्ध करने, बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में मदद देने तथा प्रतिभा के सर्वांगीण विकास का दायित्व सौंपा है। यूनिसेफ वंचित बच्चों- युद्ध, आपदा, गरीबी, हर प्रकार की हिंसा, शोषण तथा विकलांगता से पीड़ितों के लिए विशेष संरक्षण सुनिश्चित करने के प्रति संकल्पबद्ध है। 11 दिसंबर 1946 में संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय बाल कोष की स्थापना हुई थी। दुनियाभर में 11 दिसंबर को विश्व बाल कोष दिवस आयोजित किया जाता है। यूनीसेफ का मुख्यालय न्यूयॉर्क में है। यूनिसेफ 190 से अधिक देशों और बच्चों के जीवन को बचाने उनके अधिकारों की रक्षा करने बचपन से किशोरावस्था तक अपनी क्षमता को परिपूर्ण करने में उनकी मदद करने के लिए काम करता है। यूनिसेफ सभी बच्चों की रक्षा करने हेतु सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करने और नीतियों को बढ़ावा देने के लिए दुनिया भर के भागीदारोंके साथ काम करता है।
यूनिसेफ ने कहा है कोरोना महामारी बच्चों की शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य को खतरा पहुंचा रही है। यूनिसेफ ने कोरोना महामारी के दौरान बच्चों को मुश्किल स्थिति से निकालने के लिए दुनियाभर की सरकारों से विशेष अपील की है। यूनिसेफ के एक विश्लेषण के मुताबिक इस साल की शुरुआत में कोरोना महामारी का प्रकोप शुरू होने के बाद से विश्वभर में अतिरिक्त 15 करोड़ बच्चे गरीबी के दलदल में धंस गए हैं। इससे दुनियाभर में गरीबी के विभिन्न हालात में रह रहे बच्चों की संख्या करीब 1.2 अरब हो गई है। इसके अलावा स्कूले बंद होने से होने वाले नुक्सान पर भी चिंता व्यक्त की गयी है। यूनिसेफ के मुताबिक नवंबर तक करीब 60 करोड़ बच्चे स्कूल बंद होने से प्रभावित हुए हैं। यूनिसेफ का मानना है स्कूल खुले रखने के फायदे, उन्हें बन्द रखने से होने वाले नुकसान की तुलना में कहीं ज्यादा हैं। स्कूल बन्द रखने से कोरोना लड़ाई में कोई मदद नहीं मिली है, अलबत्ता, एक ऐसी व्यवस्था को हटा दिया गया है जिसमें बच्चों को सहायता व समर्थन, भोजन व सुरक्षा के साथ-साथ शिक्षा हासिल करने का मौका मिलता है। इसलिये सरकारों को स्कूल बन्द करने के बजाय, उन्हें खोलना चाहिये और कक्षाओं को यथासम्भव बनाने की कोशिश की जानी चाहिये।
यूनीसेफ के अनुसार महिलाओं और बच्चों के लिए पोषण सेवाओं में महामारी के कारण 135 देशों में 40 फीसदी की गिरावट देखी गई। अक्टूबर तक 26.5 करोड़ बच्चे स्कूल में मिलने वाले भोजन से वंचित रहे। इसके अलावा 25 करोड़ बच्चों को विटामिन ए का लाभ नहीं पा रहा। इन बच्चों की उम्र पांच साल से कम है। वहीं पांच साल से कम उम्र के 60-70 लाख अतिरिक्त बच्चे तीव्र कुपोषण का शिकार हो सकते हैं। गुणवत्ता युक्त स्वास्थ्य सेवाओं, टीकाकरण और संक्रमण से बचाव की पर्याप्त सुविधाओं के अभाव तथा जन्मजात शारीरिक दोष के कारण भारत में हर साल 11 लाख बच्चे पांच वर्ष की आयु पूरी करने से पहले ही काल के गाल में समा जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार पूरी दुनिया में भारत में शिशु मृत्यु दर 58 फीसदी से ज्यादा है। भारत में पांच साल से कम आयु वर्ग के 11.5 लाख शिशुओं की हर साल मौत हो जाती है। इनमें से नवजात शिशुओं की संख्या 6.60 लाख और तुरंत जन्मे बच्चों की संख्या 0.748 होती है। यूनीसेफ का कहना है कि गर्भवती महिलाओं और बच्चों की मृत्युदर घटाने के लिए पिछले 20 सालों के दौरान नीतिगत स्तर पर काफी प्रयास किए गए हैं जिसके बेहतर नतीजे भी सामने आए हैं लेकिन नवजात शिशुओं के लिए अनिवार्य स्वास्थ्य सेवाओं का पहलू उपेक्षित रह गया है और यही वजह है कि शिशुओं की मौत के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है।
यूनीसेफ का कहना है कि शिशुओं की अकाल मौत के ज्यादातर मामले निम्न आय वर्ग के परिवारों में होते हैं जहां कुपोषण ,शारीरिक दोष और मलिन वातावरण की समस्या बच्चे के जन्म से पहले ही मौजूद रहती है। ऐसे में अकेले सरकार के लिए इन स्थितियों को सुधारना मुमकिन नहीं है, इसके लिए समाज के हर जिम्मेदार व्यक्ति को सहयोगी की भूमिका में आना होगा। देश में हर साल लगभग 59 लाख बच्चों की मौत 5 वर्ष से कम उम्र में हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन, स्वास्थ्य मंत्रालय, यूनीसेफ व दूसरी संस्थाओं की रिपोर्ट बताती है कि आर्थिक वृद्धि के बावजूद भारत में बाल मृत्यु दर में कमी नहीं आ रही है। यूनिसेफ की रिपोर्ट का अनुमान है कि यदि सरकारों ने अपना रवैया नहीं बदला, तो साल 2030 तक दुनिया में उपचार योग्य बीमारियों के चलते 6.9 करोड़ बच्चों की मौत पांच साल से कम उम्र में ही हो सकती है

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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