मानवाधिकारों की चुनौतियां

बाल मुकुन्द ओझा

मानव अधिकारों को पहचान देने और उसके हक की लड़ाई को ताकत देने के लिए हर साल 10 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है। विश्व मानवाधिकार दिवस को मनाने का एक ही मकसद है की इस दुनिया में रहने वाले हर एक इंसान को उसके अधिकारों वंचित नहीं किया जाए।
किसी भी व्यक्ति की जिंदगी, आजादी, बराबरी और सम्मान का अधिकार है मानवाधिकार है। भारतीय संविधान इस अधिकार की न सिर्फ गारंटी देता है, बल्कि इसे तोड़ने वाले को अदालत सजा देती है। मानव अधिकारों से हमारा अभिप्राय मौलिक अधिकार एवं स्वतंत्रता से है जिसके सभी हकदार है। अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं के उदाहरण के रूप में जिनकी गणना की जाती है, उनमें नागरिक और राजनैतिक अधिकार सम्मिलित हैं जैसे कि जीवन और आजाद रहने का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के सामने समानता एवं आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के साथ ही साथ सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार, भोजन का अधिकार काम करने का अधिकार एवं शिक्षा का अधिकार। सवा अरब से भी ज्यादा संख्या वाली एक विविधतापूर्ण आबादी के लिए मानवाधिकार सुनिश्चित करने की चुनौती होती है, जिनके विभिन्न गुटों और समुदायों के बीच अपने ही हित कई बार एक-दूसरे से टकराते हुए प्रतीत होते हैं। मानवाधिकारों के मामले में हमारी स्थिति उस विद्यार्थी जैसी है, जिसकी उपलब्धियां कम नहीं हैं, लेकिन अभी उसे लंबी यात्रा तय करनी है।
हमारे देश में आये दिन मानवाधिकारों के हनन की बात उठायी जाती है विशेषकर सियासी हलकों में। चाहे कश्मीर का मुद्दा हो या नागरिक अधिकारों के आंदोलन का। वर्तमान में किसान बिलों को लेकर किसान दिल्ली में आंदोलनरत है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा है किसानों के शांतिपूर्ण अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए। दूसरी तरफ भारत सरकार किसी भी मानवाधिकारों के हनन से नकारती है। स्वतंत्रता और समानता से जीवन यापन करने के अधिकारों की रक्षा करना मानव के मूलभूत अधिकारों में निहित है। लोकतंत्र हमें मानव के सभी अधिकारों की रक्षा का वचन देता है मगर स्वतंत्रता की आड़ में आतंकवादी और विध्वंशक गतिविधिया बर्दाश्त नहीं की जाती। यह निर्णय तो देशवासियों को करना है की हमारे अधिकार क्या है और उनकी रक्षा कैसे की जाये। बहरहाल स्वतंत्रता के साथ शिक्षा और रोटी, कपडा और मकान का बुनियादी अधिकार सभी के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है जिस पर चिंतन और मंथन की जरुरत है।
मानव अधिकार वे अधिकार है जो किसी भी व्यक्ति के लिए सामान्य रूप से जीवन बिताने एवं उसके अस्तित्व के लिए आवश्यक है। मानवाधिकार का उद्देश्य है विश्व में किसी भी व्यक्ति, समाज या वर्ग को परेशान न किया जाये। सभी को जीवन जीने की आजादी एवं समान अधिकार मिले। मानवाधिकारों को सबसे ज्यादा चुनौती गरीबी से मिल रही है। विश्वभर में हर 8 में से 1 व्यक्ति भूख के साथ जी रहा है। दुनियां में 24 हजार व्यक्ति रोजाना भुखमरी के शिकार होकर अकाल मौत मर जाते है। ऐसे दौर में हम मानवाधिकारों की बात करते नहीं थकते यह सम्पूर्ण विश्व के लिए शर्मनाक है। मानवाधिकारों की बात करने वालों लिए यह किसी चुनौती से कम नहीं है। मानवाधिकार हर प्राणी के लिए मायने रखता है वह चाहे अमीर हो या गरीब। दुनियां के हर संपन्न व्यक्ति और देश को भूख से पीड़ित लोगों को पेटभर खाना खिला कर उनके मानवाधिकारों की रक्षा के लिए आगे आना होगा तभी हमारा सही अर्थों में मानवाधिकार दिवस मानना सार्थक होगा। भूख और गरीबी से लोगों के जीने का अधिकार खतरे में पड़ जाता है तो अन्य मानवाधिकारों, जैसे- समानता, विचार अभिव्यक्ति, धार्मिक स्वतंत्रता आदि के बारे में बातें करना बेमानी है । बाल मजदूरी, महिलाओं का यौन शोषण,धार्मिक अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न, जातिगत भेद-भाव, लूट-पाट, बलात्कार आदि सभी बातें मानवाधिकारों के खिलाफ जाती हैं।
सच तो यह है की हम ऐसे समय में मानव अधिकारों की चर्चा कर रहे है जब अधिकांश जनता को अपने अधिकारों की जानकारी नहीं है। यह जनता आज भी रोटी कपडे मकान की बुनियादी सुविधाओं की प्राप्ति के लिए झूज रही है। पीने का साफ पानी नही है, जिसके कारण हजारों बच्चे डायरिया का शिकार हो रहे हैं। जहां दो जून रोटी और गरिमा पूर्ण जीवन कि तलाश में कर्ज में डूबे किसान आत्महत्या कर रहे हैं। वहां अधिकार की बात करने कौन आगे आयेगा? यह भी सच्चाई है की सरकार आती जाती रहती है मगर गरीब के अधिकार आज भी कुचले जारहे है। गरीब ,दलित और दबे कुचले लोगों के चेहरों पर यदि मुस्कान आ जाये तो उन्हें मानवाधिकारों का आसानी से पता चल जायेगा।
भारत में मानव अधिकार आयोग होने और उनके संरक्षण के लिए कारगर कानून होने के बावजूद बच्चों और महिलाओं पर अत्याचार, तस्करी, ऑनर किलिंग, अस्पृश्यता, गरीबी, महिलाओं के साथ घर या सार्वजनिक तौर पर होने वाली हिंसा आजादी के 7 दशक बीत जाने के बाद भी जारी है। इसलिए हमें सब कुछ सरकार पर न छोड़कर अपने स्तर पर भी अपने आसपास होने वाले इन अपराधों को रोकने के लिए मिलकर कदम उठाने होंगे। हमें अपने अधिकारों का सही इस्तेमाल करना है तो यह तभी संभव होगा जब एक सभ्य समाज के नागरिक होने के नाते हम एक-दूसरे के दुःख दर्द को समझें और एक-दूसरे के अधिकारों को बना रहने दें। इसकी सार्थकता तभी होगी जब हम एक दूसरे के प्रति सद्भाव बनाये रखते हुए मानवाधिकारों की रक्षा के लिए समर्पित होंगे।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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