महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में जुटी लता कच्छवाहा

बाल मुकुन्द ओझा

रेतीले धोरों से आच्छादित राजस्थान के सीमावर्ती बाड़मेर जिले के निवासियों का मुख्य व्यवसाय कृषि और पशु पालन है। आजादी के बाद इस जिले ने निश्चय ही प्रगति और विकास की ऊंचाईयों को छुआ है। वर्षा की अनियमितता के कारण यह जिला अनेकों बार सूखे और अकाल का शिकार हुआ। मगर यहाँ के वाशिंदों ने विपरीत स्थितियो में भी जीना सीखा और अपने बुलन्द हौसले को बनाये रखा। यहाँ के लोगों के पास हुनर तो है मगर हुनर के विकास की सुविधा नहीं थी। मालाणी के गौरव पदमश्री मगराज जैन ने गरीबी झेल रहे दलित, गरीब ,वंचित और महिलाओं के सशक्तिकरण का बीड़ा उठाया तो लता कच्छवाहा के रूप में उन्हें एक सहकर्मी का साथ मिला। लता ने अपनी लगन और दूरदर्शिता से थार की हजारों महिलाओं को हुनरमंद बना उन्हें आर्थिक रूप से संबल दिया दिया। उन्होंने शुरू में नेहरू युवा केंद्र और बाद में स्वयंसेवी संस्था श्योर से जुड़कर महिलाओं के विकास एवं तरक्की में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लता का मानना था महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक उत्थान के बिना विकसित तथा समृद्ध समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हुनर कामयाबी का माध्यम बन सकता है। लता के मन में हमेशा यह बात चलती रहती थी कि महिलाएं आत्मनिर्भर बनें। महिलाएं किसी के आगे हाथ न फैलाएं। उनका मानना था महिलाओं में हुनर की कमी नहीं है। बस उस हुनर को तराशने की जरूरत है। एक महिला का आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना उसके परिवार को तो फायदा पहुंचाता ही है साथ ही यह उस महिला में आत्मविश्वास को भी भर देता है। 1980 से सेवा कार्य में जुटी लता ने अब तक बाड़मेर जिले में 63755 महिलाओं को आजीविका से जोड़कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया। खुद के पैरों पर खड़ा होने के लिए लताजी ने ग्राम्य अंचल की महिलाओं को खूब प्रोत्साहित किया। हजारों महिलाओं को हस्तशिल्प और दस्तकारी का प्रशिक्षण दे चुकी हैं। उनके द्वारा तैयार प्रोडक्ट विभिन्न मेलों में प्रदर्शित करने के साथ विक्रय की व्यवस्था करती है। थार क्षेत्र में अनूठी मिसाल पेश करने वाली लता महिला सशक्तिकरण की प्रेरणा हैं। महिला सशक्तिकरण के लिए लता जी द्वारा किये गए उल्लेखनीय कार्यों के फलस्वरूप उन्हें अनेक राज्य, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार और सम्मान से नवाजा गया।
सुश्री लता जोधपुर के प्रसिद्ध रामलाल कच्छवाहा के परिवार से है। आर्टस में मास्टर्स डिग्री पूरा करने के बाद सुश्री लता ने गरीब एवं जरूरतमंद परिवारों के उत्थान के लिए कार्य करने का फैसला लिया। कॉलेज लाइफ से ही कुछ अलग हट करने की ललक ने उन्हें इस फील्ड में आने को मजबूर किया। शुरू में कुछ दिक्कतों से दो चार होना पड़ा। लेकिन हिम्मत नहीं हारी। शिक्षा पूरी करने के बाद जोधपुर के कागा में हरिजन बच्चों को पढाई लिखाई से जोड़ने का कार्य अपने हाथ में लिया। घर की इकलौती लाडली बेटी ने बाद में घर की शान शौकत, आराम को छोड़ कर बाड़मेर के रेतीले धोरों को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। बाड़मेर में उनकी मुलाकात समाजसेवी मगराज जैन से हुई। जैन की प्रेरणा से सर्व प्रथम बाड़मेर के अभावग्रस्त चौहटन क्षेत्र से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की। मन में कुछ करने का जुनून, संघर्षो से टकराने का साहस और सपनों को सच करने का जज्बा हो तो सफलता की मंजिल मिलना तय है और इसे साकार किया है लता कछवाहा ने।
बाड़मेर सीमा क्षेत्र में 1965 व 1971 के भारत पाक युद्ध के बाद सैंकड़ों पाक विस्थापित परिवार आकर बसे। रोजी रोटी से जूझ रहे मेगवाल जाति के परिवारों की महिलाओं के पास पारम्परिक हुनर था। महिलाएं अपनी बेटियों के दहेज हेतु कांचली, अंगरखी, तकिया, रूमाल या दामाद की बुकानी, बटुआ आदि सुंदर वस्त्र, चादर, रालियां, घर सजाने के लिए तोरण, उंटों एवं घोड़ों को सजाने के लिए तन आदि बनाती थी। उनका यह हुनर मन को मोह लेने वाला था। आकर्षक रंगों के धागों व कांच का उपयोग कर बनाये जानेवाला यह हुनर उम्दा कारीगरी का बेहतरीन नमूना था। मगर महिलाओं को उनके हुनर का उचित मूल्य नहीं मिल पता। बिचौलिये उचित मूल्य के मार्ग में बाधा खड़ी कर रहे थे। लता जी ने 1986 में नेहरु युवा केंद्र से जुड़ कर सबसे पहले इन महिलाओं के हुनर की सुध बुध ली और उनके हुनर को पहचान दिलाई। केंद्र द्वारा युवक -युवतियों को ट्राईसेम योजना के तहत हस्तशिल्प यथा कांच कशीदा एप्लीक, चर्म कार्य, रेडियो मरम्मत सहित चालीस से अधिक विभिन्न व्यवसायों में प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही थी । लता जी ने इस दौरान 1700 से अधिक ग्रामीण और 1600 शहरी महिलाओं के साथ काम करना शुरू किया। इस अवधि में युवाओं द्वारा तैयार माल को बाजार की सुविधा दिलाना चुनौतीपूर्वक काम था। नेहरू युवा केन्द्र के माध्यम से देश के हर कोने में दस्तकारी सामग्री की ब्रिकी हेतु आयोजित मेलों में भाग लेकर युवाओं के हुनर को देशभर में पहचान दिलाने का कार्य किया। 1990 में मगराज जैन द्वारा स्थापित सोसायटी टू अपलिफ्ट रूरल इकोनामी नाम से गैर सरकारी संगठन से लता जुड़ गयी। तब से बाड़मेर जिले की हजारों महिलाओं को लाभान्वित करने के लिए सैकड़ों प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण कार्यक्रम, प्रदर्शन, बीज वितरण, चारा प्रबंधन, वित्तीय साक्षरता, बेहतर कृषि पद्धतियों, जैव-फर्म, वाड़ी तकनीक, वर्मी कम्पोस्ट, औषधीय पौधे, किचन गार्डनिंग और जैविक खेती के उपयोग को और अधिक प्रसार के लिए महिला प्रौद्योगिकी केन्द्र की स्थापना की गई। इसी दौरान सन् 1994 में दस्तकारों के प्रषिक्षण, डिजाइनिंग व मार्केटिंग के लिए बाड़मेर से 75 किलामीटर दूर बीजराड़ गांव जहां आसपास के गावों में दस्तकारों की अधिकता थी उनके बीच में क्राफ्ट डवलपमेंट सेंटर की स्थापना की जो आज तक उसी रफ्तार से कार्य कर रहा है। इसके साथ ही स्वयं सुश्री लता कच्छवाहा ने हस्तशिल्प को बढ़ावा देने हेतु सिंगापुर, थाईलैंड, बांगलादेष, श्रीलंका आदि देशों की यात्राएं की। लता जी के प्रयासों से महिलाओं के हुनर को वैश्विक पहचान मिली और उनके उत्पादों का सही मूल्य भी मिलने लगा।

 

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