जागरूकता ही एड्स से बचाव है

बाल मुकुन्द ओझा

विश्व एड्स दिवस 1988 से हर साल 1 दिसंबर को मनाया जाता है। इसे मनाए जाने का मुख्य मकसद लोगों को एचआईवी संक्रमण से होने वाली बीमारी एड्स के बारे में जागरूक करना है। 2020 में विश्व एड्स दिवस की थीम एचआईवी एड्स महामारी समाप्त करना लचीलापन और प्रभाव रखी गई है। एड्स का खतरा दुनिया में अभी थमा नहीं है। अभी भी यह दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में रोज 980 बच्चे एचआईवी वायरस के शिकार हो जाते हैं, जिनमें करीब 320 बच्चों की मौत हो जाती है। साल 1984 में वायरस की पहचान होने के बाद से अब तक लगभग 35 मिलियन से अधिक लोग एचआईवी यानि एड्स से मर चुके हैं, जो इतिहास में सबसे विनाशकारी महामारी के रुप में दर्ज है। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक 37.9 मिलियन लोग एचआईवी यानि एड्स के शिकार हो चुके हैं। भारत की बात करें तो पिछले 10 सालों में भारत में संक्रमण 38 प्रतिशत कम हुआ है। इससे पता चलता है कि इसे कम किया जा सकता है। इस समय भारत में 21 लाख लोग एचआईवी के साथ जी रहे हैं। यही नहीं एड्स से होने वाली मौतों में भी 56 प्रतिशत तक कमी आई है।
कभी विश्व में कोहराम मचा देने वाली बीमारी एड्स अब काबू में है। पिछले एक दशक के आकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे की पीड़ितों को मौत के आगोश में सुलाने वाली यह महामारी धीरे ही सही मगर अब पकड़ में आ गई है। विश्व स्तर पर चेतना और जागरूकता के कारण इस पर विजय हासिल की जा सकी। मगर इसका मतलब यह कतई नहीं है कि एड्स हमारे पूरी तरह नियंत्रण में आगया है। भारत अभी भी विश्व के उन पांच देशों में शुमार है जहाँ एड्स का प्रभाव सर्वाधिक है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार 2030 तक एड्स को जड़ मूल से समाप्त कर दिया जायेगा।
दुनिया के सबसे घातक बीमारियों में एक है एड्स। इस बीमारी का मुकम्मल इलाज अभी मुमकिन नहीं हो पाया है लेकिन कुछ रिसर्च हो रहे हैं। जिससे आप उम्मीद कर सकते हैं कि भविष्य में इसका एक मुकम्मल इलाज हो। विश्व एड्स दिवस हर साल 1 दिसम्बर को मनाया जाता है। इस दिन इस वायरस और बीमारी से बचने के लिए कई जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। लेकिन उसके बावजूद आम लोगों के दिमाग में कई सवाल घूमते रहते हैं। इसी वजह से इस जानलेवा बीमारी को लेकर कई तरह के मिथक बन जाते हैं। हर कोई अपनी जानकारी के हिसाब से दूसरे व्यक्ति को सलाह देता है, लेकिन कौन-सी बात कितनी सच है इसको लेकर लोग काफी कंफ्यूजन रहता है।
एड्स मानवीय प्रतिरक्षी अपूर्णता विषाणु ( एच.आई.वी ) से होता है जो मानव की प्राकृतिक प्रतिरोधी क्षमता को कमजोर करने के साथ साथ शरीर की रोग प्रतिरोधी क्षमता पर आक्रमण करता है। जिसका काम शरीर को विभिन्न संक्रामक बीमारियों से बचाना होता है। एच.आई.वी. रक्त में उपस्थित प्रतिरोधी पदार्थ लसीका-कोशो पर हमला करता है। ये पदार्थ मानव को जीवाणु और विषाणु जनित बीमारियों से बचाते हैं और शरीर की रक्षा करते हैं। जब एच.आई.वी. द्वारा आक्रमण करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता क्षय होने लगती है तो इस सुरक्षा कवच के बिना एड्स पीड़ित लोग भयानक बीमारियों क्षय रोग और कैंसर आदि से पीड़ित हो जाते हैं और शरीर को सर्दी जुकाम, फुफ्फुस प्रदाह इत्यादि घेर लेते हैं। जब क्षय और कर्क रोग शरीर को घेर लेते हैं तो उनका इलाज करना कठिन हो जाता है और मरीज की मृत्यु भी हो सकती है।
एचआईवी को लेकर एक चौंकाने वाला तथ्य यह भी सामने आया है कि विश्व में एचआईवी से पीड़ित होने वालों में सबसे अधिक संख्या किशोरों की है। यह संख्या 20 लाख से ऊपर है। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2000 से अब तक किशोरों के एड्स से पीड़ित होने के मामलों में तीन गुना इजाफा हुआ है जो कि चिन्ता का विषय है। ये चिन्ता तब और भी बढ़ जाती है जब ये जानने को मिलता है कि एड्स से पीड़ित दस लाख से अधिक किशोर सिर्फ छह देशों में रह रहे हैं और भारत उनमें एक है। एड्स हाथ मिलाने, गले लगने, छूने, छींकने से नहीं फैलता. इससे बचने के लिए जरूरी है कि लोग इस बीमारी के प्रति जागरूक हों। अगर एचआईवी पॉजिटिव हो, तो दवा लें, और अपना और अपने साथी का खास ख्याल रखें।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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