कृषि प्रधान देश मे कृषक बदहाल क्यो!

अभिजीत आनंद

करोना महामारी के दौरान कृषि क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या जिसका सामना किया गया, वो था सप्लाई चेन में व्यवधान, बाजार-पहुँच की समाप्ति, मंडियों का बंद होना एवं उपभोक्ता खाद्य मांग में कमी । इस दौरान सरकार द्वारा कृषि समस्याओं को दूर करने हेतु कई कदम उठाएँ गए एवं इस क्षेत्र से आशा व्यक्त की गयी कि शायद इससे देश की आर्थिकी पुनरुद्वार को बल मिले।कृषि का महत्त्व सिर्फ वर्तमान स्थिति में ही नहीं अपितु इसे मानव सभ्यता का मूलाधार माना जाता है।

भारत की पारंपरिक कृषि पर्यावरण हितैषी थी एवं उस समय कृषि गाय आधारित थी तथा किसानों की लागत काफी कम थी। उत्पादन भी इतना था कि जीवन-यापन आराम से हो सके। उस समय की कृषि उत्पादों की गुणवत्ता भी अच्छी थी। परंतु कृषि में तकनीकी के प्रवेश ने किसानों के आगत में वृद्धि की एवं भूमि तथा कृषि उत्पादों की गुणवत्ता में भी कमी आयी। आधुनिक तकनीकी ने उस कृषि अपशिष्ट को खेत में ही जलाने को मजबूर कर दिया, जो कि पशुओं का आहार था। गोबर खाद के स्थान पर रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग ने भूमि की उर्वरा शक्ति को नष्ट कर दिया। हरित क्रांति ने फसल विशेष के उत्पादन में वृद्धि तो की लेकिन अनेक समस्याओं को भी जन्म दिया। वर्तमान समस्या में जलवायु परिवर्तन के साथ इस क्षेत्र द्वारा आज कई प्रकार की चुनौतियों का सामना भी किया जा रहा है। आधारभूत संरचना का अभाव, सीमित निवेश, उत्पादकता में कमी, साख की कमी, मौसम आधारित कृषि एवं वाणिज्यकीरण का अभाव ,तकनीकी अलगाव तथा नवाचार, शोध एवं अनुसंधान की कमी इत्यादि इन चुनौतियाँ में शामिल हैं।

भारतीय कृषि की समस्याओं में सबसे निर्णायक बिंदु मानसून पर निर्भरता है। भारत में वर्षा की स्थिति न सिर्फ अनियमित हैं, बल्कि अनिश्चित भी है। वर्षा की अधिकता से आंधी, बाढ़, तूफान,कीटों का प्रकोप जैसी आपदाएँ जन्म लेती हैं, जिनसे भारतीय किसानों को क्षति उठानी पड़ती है।

विडंबना यह है कि इन समस्याओं का अभी तक कोई समुचित हल नहीं ढूंढा गया है एवं न ही कोई सुनिश्चित तंत्र विकसित हो पाया है। परिणामत: कृषक तमाम उद्यम के बावजूद निर्धनता का संजाल नहीं तोड़ पाए।

देश में सिंचाई के वैकल्पिक साधन मौजूद है लेकिन इनका वितरण बहुत ही असमान एवं अविकसित है। साथ ही सीमांत एवं छोटी जोतो तक इनकी पहुँच भी सुनिश्चित नहीं है। अन्य समस्या है भूमि की उर्वरा शक्ति का क्षीण होना जो कि सदियों से एक ही भूमि पर कृषि करते आने का परिणाम है। भू-क्षरण एवं जल रिसाव की समस्या ने भी देश के मिटी की उर्वरा शक्ति को क्षीण किया है।
साथ ही रासायनिक खादों के अंधाधुंध एवं अनियोजित प्रयोग से भूमि की उत्पादकता लगातार कम हो रही है। जोतों का लगातार छोटा होना भी कृषि की प्रमुख समस्या है। दोषपूर्ण भू-स्वामित्व और असमान वितरण की प्रणाली ने कृषि को पर्याप्त रूप से नुकसान पहुँचाया है। कृषि भारत की अधिकांश जनता की आजीविका का साधन है। कृषि पर बढ़ती जनसंख्या वृद्धि का दबाव सहज ही महसूस किया जा सकता है। यही कारण है कि भारतीय कृषि में सर्वाधिक छिपी और मौसमी बेरोजगारी पाई जाती है।
भारतीय कृषि में शिक्षा का नितांत अभाव पाया जाता है। अशिक्षा के कारण किसान अपनी समस्याओं का समाधान नहीं कर पातें। अशिक्षा के गंभीर परिणामों में ही किसानों में संगठनात्मक प्रवृत्ति का अभाव है। असंगठित क्षेत्र होने के कारण किसान प्रशासन और नीतियों का फायदा नहीं उठा पाते एवं शोषित होते रहते हैं। किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं की घटनाओं के मूल में सूदखोरों का उच्च ब्याज दर पर दिया गया ऋण होता है, जिसे कृषि उत्पादन द्वारा न चुका पाने की स्थिति में किसान मृत्यु का वरण विवशता में करता है। हाल के दिनों में कर्ज माफी द्वारा किसानों को कर्ज की समस्या से तुरंत राहत प्रदान करने की प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। लेकिन कर्जमाफी किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं है। कुछ ऐसा किया जाना चाहिये जिससे किसान कर्ज लेने को मजबूर न हो।
गाँधी जी ने कहा था कि स्थान विशेष की समस्या का समाधान उस स्थान विशेष से ही खोजा जा सकता है। विदेशी पद्धति का अनुसरण करने पर तात्कालिक राहत ही मिलती दिखाई दे सकती है लेकिन पूर्ण समाधान संभव नहीं है। वर्तमान में मौजूद चुनौतियों के समाधान हेतु सिंचाई व्यवस्था का विस्तार, आधारभूत संरचना का विकास, उत्पादकता को बढ़ाने के साथ विषमता में कमी लाने तथा कृषि क्षेत्र में संतुलन स्थापित करने हेतु दूसरी हरित क्रांति की आवश्यकता है, जिसे ‘इंद्रधनुषी क्रांति’ का नाम दिया गया है। इसके तहत कृषि क्षेत्र के विविधीकरण करने के साथ गेहूँ एवं चावल के उत्पादन के अलावा अन्य फसलों के उत्पादन पर बल प्रदान किया जाना है, जैसे- जूट उत्पादन, दालों का उत्पादन, मोटे अनाज का उत्पादन इत्यादि।

वर्तमान में कृषि क्षेत्र में आवश्यकता से अधिक मानव श्रम संलग्न है। अत: इस क्षेत्र से अतिरिक्त श्रम बल का स्थानांतरण कृषि संबद्ध क्षेत्रों में किया जाना चाहिये। जैसे- पशुपालन, डेरी उद्योग, मत्स्य पालन, फूलों की खेती, हर्बल खेती, रेशम कीट पालन, मधुमक्खी पालन इत्यादि। इसके साथ ही अतिरिक्त श्रम बल का प्रयोग कुटीर उद्योग के विकास में भी किया जा सकता है।

भविष्य में उत्पादकता बढ़ाने हेतु कृषि क्षेत्र का तकनीकी क्षेत्र से जुड़ाव अत्यंत आवश्यक है। किसानों को जागरूक बनाने के उद्देश्य से अनेक प्रकार के मोबाइल एप का विकास किया गया है। साथ ही विपणन व्यवस्था की कमियों को दूर करने हेतु राष्ट्रीय कृषि बाजार का विकास किया गया है। इससे देश की अन्य मंडियों को भी जोड़ा जा रहा है ताकि फसलों में कीमत संबंधी एकरूपता एवं पारदर्शिता बनी रहे। भारत सरकार द्वारा देश के कृषि क्षेत्र की भविष्य में दिशा तय करने हेतु नई राष्ट्रीय कृषि नीति की घोषणा की गई है, जिसमें निम्नलिखित बातों पर ज़ोर दिया गया है-
सभी कृषिगत उपजों हेतु अधिकतम बिक्री मूल्य को निश्चित करना। मूल्यों में उतार-चढ़ाव से किसानों की सुरक्षा हेतु बाज़ार जोखिम स्थिरीकरण कोष का गठनसूखा एवं वर्षा संबंधित जोखिमों से बचाव हेतु कृषि जोखिम कोष का गठन किसानों हेतु बीमा योजनाओं का विस्तार|
कृषि संबंधित मामलों में स्थानीय पंचायतों के अधिकारों में वृद्धि |इन सभी प्रयासों के बावजूद कुछ ध्यान देने योग्य मुद्दे हैं, जैसे- कृषि क्षेत्र में शोध एवं अनुसंधान पर व्यय की सीमा में वृद्धि एवं कृषि क्षेत्र को जैव प्रौद्योगिकी के लाभों से जोड़ना।भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ की जलवायु कृषि अनुरूप है। अत: प्राकृतिक एवं मानवीय प्रयासों के सम्मिलित परिणामस्वरूप यहाँ कृषि क्षेत्र का भविष्य उज्जवल परिलक्षित होता है। 21वीं सदी में कृषि क्षेत्र की कठिनाईयों को दूर कर देश का विकास सुनिश्चित किया जा सकता है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार एवं राष्ट्रिय खिलाडी हैं)

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