कोरोना ने छीन लिए गांधी परिवार के दो कद्दावर और वफादार नेता

नयी दिल्ली। कोरोना वायरस ने काग्रेस पार्टी को दो बड़े झटके दिए हैं। कांग्रेस पार्टी के लिए बीते 36 घंटे काफी भारी पड़े हैं, क्योंकि कोरोना ने असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के बाद अब अहमद पटेल को भी छीन लिया है। कांग्रेस के दिग्गज नेता अहमद पटेल का आज तड़के करीब तीन बजे निधन हो गया। अहमद पटेल कुछ हफ्ते पहले कोरोना वायरस से संक्रमित हुए थे और उसके बाद से ही वह बीमार रह रह थे। कांग्रेस पार्टी को अहमद पटेल के निधन से बड़ा झटका लगा है, क्योंकि अहमद पटेल कांग्रेस पार्टी के चाणक्य माने जाते थे। वहीं, इससे पहले 23 नवंबर की शाम को कांग्रेस के दिग्गज नेता और असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का निधन हुआ था।
असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का सोमवार को निधन हो गया था। पिछले दिनों वह भी कोविड-19 से संक्रमित हुए थे और उपचार के बाद ठीक हो गए थे लेकिन स्वास्थ्य संबंधी कुछ जटिलताओं के कारण उन्हें फिर से अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जिसके बाद वह सोमवार शाम को चल बसे। तरुण गोगोई को भी गांधी परिवार का काफी वफादार माना जाता था। ठीक इसके दो दिन बाद यानी आज 25 दिसंबर को तड़के अहमद पटेल का भी निधन हो गया।
कांग्रेस के संकटमोचक थे पटेल
21 अगस्त 1949 को गुजरात के भरुच में जन्मे अहमद पटेल आठ बार सांसद रहे हैं। अहमद पटेल ने तीन बार लोकसभा सांसद के तौर पर भरुच का प्रतिनिधित्व किया और पांच बार राज्यसभा सांसद के तौर पर। गांधी परिवार के सबसे वफादार माने जाने वाले अहमद पटेल कांग्रेस में काफी ताकतवर नेता थे। ऐसा कहा जाता है कि जब पार्टी सत्ता में थी, तब उन्हें कई बार मंत्री बनने का प्रस्ताव मिला, मगर उन्होंने बार-बार ठुकरा दिया। कांग्रेस पार्टी के चाणक्य माने जाने वाले अहमद पटेल सोनिया गांधी के विश्वासपात्र थे और उनके संकटमोचक भी।
देश के राजनीतिक इतिहास में सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने जितने भी शानदार प्रदर्शन किए, चुनाव जीते, उनमें अहमद पटेल का खासा योगदान माना जाता था। एक तरह से वह कांग्रेस पार्टी के वह सेनापति थे जो मुश्किलों का सामना करने के लिए आगे की पंक्ति में खड़ा रहते थे। साल 2004 का लोकसभा चुनाव हो या 2009 का, उन दोनों चुनावों में अहमद पटेल के योगदान को कांग्रेस के साथ-साथ इस देश ने देखा है। इसके अलावा भी किसी विधानसभा चुनाव में अभी अगर पार्टी विषम परिस्थिति में होती थी, तो अहमद पटेल ही एक ऐसे नेता थे, जिन पर सोनिया गांधी को पूरा भरोसा होता था कि वे इस संकट से पार्टी को उबार देंगे। उन्होंने अपनी रणनीतिक कौशल से कई बार अप्रत्यक्ष तौर पर कांग्रेस की सरकार बनवाई, मगर कभी मंत्री नहीं बने।
पटेल की कांग्रेस की सरकार बनाने में बड़ी भूमिका
अहमद पटेल साल 2001 से 2017 तक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव रहे थे। 2018 में राहुल गांधी ने अध्यक्ष बनने के बाद अहमद पटेल को कोषाध्यक्ष बनाया था। वैसे 1996 से लेकर 2000 तक पटेल इसी पद पर थे। हालांकि, राहुल गांधी के नेतृत्व के दौरान भी अहमद पटेल आलाकमान और नेताओं के बीच में एक अहम कड़ी बने रहे। 10 साल के यूपीए सरकार में भले ही वह लो प्रोफाइल में रहे, मगर उन्होंने इस दौरान अहम भूमिका निभाई। साल 1985 में राजीव गांधी ने अहमद पटेल को ऑस्कर फर्नांडीस और अरुण सिंह के साथ अपना संसदीय सचिव बनाया था। उस समय इन तीनों को ‘अमर-अकबर-एंथनी’ गैंग कहा जाता था। पहली बार अहमद पटेल तभी चर्चा में आए थे।
लगातार तीन बार मुख्यमंत्री रहे थे गोगोई
राजनीति के क्षेत्र में वह किसी विराट व्यक्तित्व की तरह स्थापित रहे और अपनी तीक्ष्ण बुद्धि तथा स्पष्टवादी व्यवहार से आगे रहकर असम का नेतृत्व किया। वर्ष 2001 में पहली बार असम की बागडोर संभालने पर उन्होंने कहा था कि उन्हें विश्वास है कि वह पांच साल तक पदस्थ रहेंगे, लेकिन उन्होंने कभी यह कल्पना नहीं की थी कि उनकी लोकप्रियता इतनी हो जाएगी कि वह लगातार तीन बार मुख्यमंत्री के पद पर रहेंगे। तीन बार के कार्यकाल में गोगोई ने असम को कई उपलब्धियां दिलाईं। वह खूंखार उल्फा सहित विभिन्न उग्रवादी संगठनों को बातचीत की मेज पर लेकर आए और संकटग्रस्त राज्य को फिर से विकास की पटरी पर भी लेकर आए।
गोगोई को अपने तीसरे कार्यकाल में पार्टी के भीतर असंतोष का सामना करना पड़ा जिसका नतीजा अंतत: 2016 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के सत्ता से अपदस्थ होने के रूप में निकला। असंतोष का नेतृत्व कांग्रेस के दिग्गज नेता हिमंत बिस्व सरमा ने किया जिनकी मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा थी, लेकिन गोगोई मंत्रालय में फेरबदल कर लगातार पद पर बने रहे। इसके बाद, सरमा ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया और अपने करीबी नौ विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए। इससे गोगोई और कांग्रेस दोनों का तगड़ा झटका लगा। छह बार सांसद रहे अविचलित गोगोई विपक्ष के नेता के रूप में खड़े रहे। उन्होंने संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ तथा राष्ट्रीय नागरिक पंजी से संबंधित मुद्दों पर आवाज उठाई।
गोगोई का बचपन और स्कूली शिक्षा
गोगोई का जन्म ऊपरी असम के जोरहाट जिले में एक अप्रैल 1936 को डॉक्टर कमलेश्वर गोगोई और उनकी पत्नी उषा गोगोई के घर में हुआ था। गोगोई के पिता चाहते थे कि उनका बेटा डॉक्टर या इंजीनियर बने, लेकिन गोगोई का दिल राजनीति के लिए धड़कता था। एक बार उन्होंने अपने एक शिक्षक से यह तक कह दिया था कि बड़े होकर वह प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। वह देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से बेहद प्रभावित हुए जब वह 1952 में जोरहाट के दौरे पर पहुंचे थे। उस समय वह कक्षा दस के छात्र थे। उन्होंने विभिन्न राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया जिससे उनके शिक्षक और माता-पिता नाराज थे। गोगोई हाईस्कूल में फेल हो गए और अगले साल निजी परीक्षार्थी के रूप में अच्छे नंबर लेकर आए।

स्कूल में पढ़ाई के बाद वह जगन्नाथ बारूह कॉलेज पहुंचे और छात्र राजनीति में सक्रिय हो गए। स्नातक के बाद वह कानून की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय पहुंचे। वह बीमार पड़ गए और वापस असम लौट आए। उन्होंने फिर गौहाटी विश्वविद्यालय से पढ़ाई की। भारत युवक समाज की असम इकाई के सक्रिय नेता गोगोई 1963 में कांग्रेस में शामिल हो गए और तब से आखिर तक वह पार्टी के वफादार रहे। इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और फिर सोनिया गांधी सहित गांधी परिवार का उन्होंने हमेशा समर्थन किया। वह पार्टी के महासचिव और संयुक्त सचिव भी रहे। उन्होंने चुनावी राजनीति की शुरुआत 1968 में नगर निकाय चुनाव से की। बाद में 1971 में वह पहली बार लोकसभा के लिए जोरहाट सीट से निर्वाचित हुए। गोगोई ने 1972 में जंतु विज्ञान में स्नातकोत्तर डॉली से शादी की। उनके दो बच्चे-बेटी चंद्रिमा और पुत्र गौरव हैं। चंद्रिमा अपने परिवार के साथ विदेश में रहती हैं, जबकि गौरव वर्तमान में लोकसभा में कांग्रेस के उपनेता हैं।

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