खोखले साबित हो रहे है महिला सुरक्षा के तमाम दावे

बाल मुकुन्द ओझा

महिलाओं पर होने वाली हिंसा को रोकने के लिये हर साल 25 नवंबर को दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस मनाया जाता है। वैश्विक स्तर पर आंकड़ों का विश्लेषण करें तो बेहद डरावनी स्थिति से रूबरू होना पड़ेगा। आँकड़ों के अनुसार दुनिया भर में हर साल 15-19 आयु सीमा की लगभग डेढ़ करोड़ किशोर लडकियाँ अपने जीवन में कभी-न-कभी यौन उत्पीड़न का शिकार होती हैं। तीन अरब महिलाएँ वैवाहिक बलात्कार की शिकार होती हैं। हिंसा की शिकार 50 प्रतिशत से अधिक महिलाओं की हत्या उनके परिजनों द्वारा ही की जाती है। प्रतिदिन 3 में से एक महिला किसी न किसी प्रकार की शारीरिक हिंसा का शिकार होती है।
भारत को संस्कार, संस्कृति और मर्यादा की त्रिवेणी कहा जाता है। भारतीय संस्कृति में नारी अस्मिता को बहुत महत्व दिया गया है। संस्कृत में एक श्लोक है- यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता। अर्थात जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। मगर आज सब कुछ उल्टा पुल्टा हो रहा है। न नारी की पूजा हो रही है और देवताओं की जगह सर्वत्र राक्षस ही राक्षस दिखाई दे रहे है। समाज के नजरिए में भी महिलाओं के प्रति अब तक कोई खास बदलाव देखने को नहीं मिला है। ऐसा लगता है जैसे हमारा देश भारत धीरे-धीरे बलात्कार की महामारी से पीड़ित होता जा रहा है। यौन अपराध चिंताजनक रफ्तार से बढ़ रहे हैं। पिछले चार दशकों में अन्य अपराधों की तुलना में रेप की संख्या में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी हुई है और दोषियों को सजा देने के मामले में हम सबसे पीछे हैं। दो साल की बच्ची से लेकर बुजुर्ग महिला तक दुष्कर्म की शिकार हो रही है। ऐसे में कानून के पालनहार कोई सख्त कदम उठाने के बजाय अपनी गलतियों को छिपाने के लिए नित नए बहाने ढूंढ रहे है।
आजकल रोज प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर महिलाओं के साथ दुष्कर्म और छेड़छाड़ की खबर दिखाई जाती रहती है परंतु इसकी रोकथाम के उपाय पर चर्चा कहीं नहीं होती है। इस तरह के अत्याचार कब रुकेंगें। क्या हम सिर्फ मूक दर्शक बन खुद की बारी का इंतजार करेंगे। लड़कियों पर अत्याचार पहले भी हो रहे थे और आज भी हो रहे हैं अगर इसके रोकने के कोई ठोस उपाय नहीं किये गये। आज भी हमारे समाज में बलात्कारी सीना ताने खुले आम घूमता है और बेकसूर पीड़ित लड़की को बुरी और अपमानित नजरों से देखा जाता है । न तो समाज अपनी जिम्मेदारी का माकूल निर्वहन कर रहा है और न ही सरकार। ऐसे में बालिका कैसे अपने को सुरक्षित महसूस करेगी यह हम सब के लिए बेहद चिंता की बात है।
भारत में महिलाओं को देवी के सामान पूजने की परंपरा है। इसी देश में आज महिला अस्मिता के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। आए दिन छेड़छाड़, हत्या और बलात्कार जैसी आमानवीय घटनाएं होती रहती है। सिर्फ महिलाएं ही नहीं अब छोटी बच्चियां भी सुरक्षित नही है। थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की एक रिपोर्ट में भारत को महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक मुल्क बताया गया था। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की वर्ष 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक इस साल औरतों के साथ होने वाली हिंसा में 7.3 फीसदी का इजाफा हुआ है। महिलाओं के साथ हिंसा की वारदातों में उत्तर प्रदेश पहले नंबर पर है। 2018 के मुकाबले 2019 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 2018 में महिलाओं के खिलाफ हुए 3,78,236 अपराधों के मुकाबले 2019 में 4,05,861 अपराध दर्ज किए गए। वर्ष 2019 में प्रतिदिन 87 प्रकरण बलात्कार के दर्ज हुए। यानि आलोच्य अवधि में भारत में बलात्कार के कुल 31,755 मामले दर्ज किए गए । सबसे ज्यादा 5,997 मामले राजस्थान में दर्ज किए गए । उत्तर प्रदेश में 3,065 मामले और मध्य प्रदेश में 2,485 मामले दर्ज किए गए।
सच तो यह है कि एक छोटे से गांव से देश की राजधानी तक महिला सुरक्षित नहीं है। अंधेरा होते-होते महिला प्रगति और विकास की बातें छू-मंतर हो जाती हैं। रात में विचरण करना बेहद डरावना लगता है। कामकाजी महिलाओं को सुरक्षित घर पहुँचने की चिंता सताने लगती है। देश में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में कमी नहीं आरही है। भारत में आए दिन महिलाएं हिंसा और अत्याचारों का शिकार हो रही हैं। घर से लेकर सड़क तक कहीं भी महिला सुरक्षित नहीं है। देश में महिला सुरक्षा को लेकर किये जा रहे तमाम दावे खोखले साबित हुए है। महिला सुरक्षा को लेकर देशभर से रोजाना अलग-अलग खबरें सामने आती रहती हैं। देश में महिलाओं की स्थिति पर हमेशा ही सवाल खड़े होते रहे हैं। महिलाओं की सुरक्षा के तमाम दावों और वादों के बाद भी उनकी हालत जस की तस है। महिलाएं रोज ही दुष्कर्म, छेड़छाड़, घरेलू हिंसा और अत्याचार से रूबरू होती हैै।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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