कांग्रेस में कलह का कोहराम

बाल मुकुन्द ओझा

बिहार चुनाव के साथ विभिन्न राज्यों के उपचुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस में गुटबाजी और आपसी कलह थमने का नाम नहीं ले रही है। पार्टी नेतृत्व को लेकर अलग-अलग स्तरों पर विरोध के स्वर खुलकर मुखर होते जा रहे हैं। कपिल सिब्बल और चिदंबरम के बाद राज्य सभा में कांग्रेस दल के नेता गुलाम नबी आजाद ने पार्टी की कार्य प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। आजाद ने वीआईपी कल्चर को बदलने की जरूरत बताते हुए जमीनी स्तर पर पार्टी कमजोर होने की बात स्वीकार की है। पिछले 72 सालों में कांग्रेस सबसे निचले पायदान पर है। आजाद ने कहा हम सुधारवादी है विद्रोही नहीं। कपिल सिब्बल ने भी एक बार फिर कहा पार्टी बिना अध्यक्ष के चल रही है। ऐसा होता है क्या किसी पार्टी में।

कांग्रेसी नेताओं की बयानबाजी को देखकर लगता है गाँधी परिवार के पक्ष और विपक्ष में कांग्रेसी नेता दो धड़ों में बंट गए है। यह पार्टी की सियासी सेहत के लिए सुखद नहीं है। नीचे से ऊपर तक संगठनात्मक चुनाव की मांग जोरदार तरीके से उठने लगी है। वहीँ कांग्रेस आलाकमान ने चुनाव की तैयारियां शुरू करदी है। राजनीतिक टिप्पणीकारों का मानना है गाँधी परिवार से अध्यक्ष पद के लिए शायद ही कोई सामने आये। राहुल गाँधी पहले ही इंकार कर चुके है। पक्ष और विपक्ष में जोरदार बयानबाजी शुरू हो गयी है जो कांग्रेस के लिए शुभ संकेत नहीं कहे जा सकते। कथित असंतुष्ट घड़े का कहना है यदि अभी भी हमने कांग्रेस को मजबूत बनाने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाये तो पार्टी को अकाल मौत से कोई नहीं बचा पायेगा। वहीँ गाँधी परिवार के पक्षधर नेताओं का कहना है राहुल और प्रियंका ने सड़क पर आकर आंदोलन किया उस दौरान सवाल उठाने वाले नेता कहाँ थे। तारीक अनवर ने तो यहाँ तक कह दिया चुनाव की मांग करने वाले गुलाम नबी आजाद खुद राज्य सभा में मनोनीत नेता है। लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने सिब्बल और आजाद की आलोचना करते हुए कहा कांग्रेस को ये लोग ही कमजोर कर रहे है। इनके विचार पार्टी से नहीं मिलते तो वे पार्टी से बाहर हो सकते है।
इससे पूर्व भी 23 नेता कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठा चुके है। दूसरी तरफ सिब्बल के नजदीकी लोगों का कहना है उन्हें और अन्य 23 नेताओं में से अधिकतर को चुनाव प्रचार से दूर रखा गया था। अब सोनिया गाँधी भी क्या जवाब दे क्योंकि उनके सलाहकार अहमद भाई बीमार है।
हालिया बिहार चुनाव और उप चुनावों के बाद देशभर में नेताओं और कार्यकर्ताओं में एक अजीब सी बेचौनी छाई हुई है। पार्टी के सामने अस्तित्व का संकट आ खड़ा हुआ है। पार्टी इस संकट से कैसे उभरे इस पर मंथन हो रहा है। सभी नेता अपने अपने तरीके से सोच रहे है। कुछ का मानना है अब समय आगया है पार्टी को वंशवाद से मुक्ति का। कुछ अन्य सोच रहे है गाँधी परिवार से कोई नेतृत्व नहीं करेगा तो पार्टी बिखर जाएगी। राहुल गाँधी कई बार पार्टी अध्यक्ष पद सँभालने से इंकार करने पर कांग्रेस की स्थिति सांप छुछुंदर सी हो गयी है। फिलहाल आलाकमान का त्रिगुटा चुप्पी धारण किये हुए है।
कांग्रेस के आजादी के बाद के इतिहास को देखें तो एक दर्जन से अधिक गैर नेहरू और गैर गाँधी परिवारों के नेता अध्यक्ष बने है जिनमें आचार्य कृपलानी से लेकर नरसिंग राव और सीताराम केसरी तक शामिल है। इनमें ज्यादातर नेता इन खास परिवारों के सहमति से अध्यक्ष बने है। बिना सहमति अध्यक्ष बनने वाले नेता ज्यादा नहीं चल पाए। अब एक बार फिर राहुल गाँधी के अध्यक्ष बनने से मना करने के बाद गाँधी परिवार से बाहर अध्यक्ष बनने की चुनौती में कांग्रेस फंसी है। इसके लिए पार्टी के दोनों गुटों के नेताओं में मंथन चल रहा है। यह मंथन कई बार बयानबाजी के रूप में फूट रहा है। यह तो आने वाला समय ही बता पायेगा की आजादी के गर्भ से निकली देश की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी कांग्रेस इस अंदरूनी कलह से उबर पायेगी या नहीं। बहरहाल भाजपा इस दौरान खुद को सुखद महसूस कर रही है और कांग्रेस मुक्त भारत के अपने सपने को साकार होते देख बल्ले बल्ले है।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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