घृणा के सियासी बोल

बाल मुकुन्द ओझा

हालिया बिहार चुनाव ने घृणा की सारी हदें पार करदी। घृणा के बोलों ने यहाँ नया इतिहास रच दिया। कल तक एक दूसरे की गलबहिंया थामे हमारे नेता आज एक दूसरे पर घृणा के ऐसे ऐसे तीर छोड़ रहे थे जैसे भारत पाक जैसे दुश्मन देशों में भी एक दूसरे पर नहीं छोड़े जाते। घृणा पर भाषा का भ्रष्टाचार शिष्टाचार बनकर लोकतंत्र पर सिर चढ़कर बोल रहा है। आखिर घृणा है क्या जिस पर भारी सियासी बहस छिड़ी है। जब एक वर्ग में एक दूसरे के प्रति बिना वजह जाति, धर्म, रंग और अर्थ के आधार पर घृणा फैली हो उसे वैमनस्यता कहा जाता है। मगर हमारे देश की सियासत में घृणा के एक नहीं अनेक रूप देखने को मिल रहे है। एक दूसरे को गुंडा बताने वाले यूपी के बुआ-बबुआ हो या बिहार के चाचा भतीजा अथवा कश्मीर में भाजपा और महबूबा कभी गलबहिंया तो कभी घृणा के बोल सभी ने देखे है। राजस्थान की बात करें तो गहलोत ने निकम्मा, नकारा कहने के बाद सचिन को गले लगाते देर नहीं की। एनआरसी के दौरान भी घृणा के बोल आसमान को छू रहे थे। प. बंगाल सर्वत्र घृणा में डूबा हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी के लिए कुछ लोग अपने घृणा के बोल छुपाते नहीं है। कश्मीर पर अब्दुल्ला और महबूबा के बोल घृणा की पराकाष्टा है। ऐसा लगता है घृणा के सियासी बोलों में सभी राजनीतिक पार्टिया डुबकी लगा रही है।
चुनावी घमासान, राजनीति में घमासान, खेलों में घमासान, फिल्मों में घमासान, धर्म और सियासत पर घमासान आदि सुने सुनाये शब्द है। इनका प्रयोग अक्सर मीडिया में होता रहता है। मगर अब घृणा पर भी घमासान हो रहा है। राजनीतिक पार्टियों सहित हमारे देदीप्यमान नेताओं को इसके लिए बधाई दी जासकती है। लगे हाथ सोशल मीडिया को भी बधाई दी जानी चाहिए जिसने आग में घी डालने का काम कर वातावरण को शांत करने के बजाय जहरीला बनाने में अधिक योगदान दिया है। आज छोटे से लेकर बड़े नेता तक ने जैसे घृणा फैलाने का ठेका ले लिया है। चुनाव के दौरान इसका अधिक उपयोग होने लगा है। चुनाव भी अब लगभग हर तीसरे महीने कहीं न कहीं होने लगा है जिसका प्रतिफल यह निकल रहा है कि नेता लोग इस अचूक ब्रह्मास्त्र को एक दूसरे पर धड़ल्ले से साध रहे है। घृणा की इस बहती गंगा में हाथ धोने से कोई भी नहीं चूक रहा है। समूचे ब्रम्हांड में जैसे घृणा के काले पीले बादल मंडरा रहे है।
राम और कृष्ण के देश में सहनशीलता केवल कागजों और बयानों तक सीमित होकर रह गई है। सर्वत्र घृणा के जहरीले तीर मानव को छलनी कर रहे है। संसद और उसके बाहर जिन शब्दों का प्रयोग हो रहा है वे हमारी सांस्कृतिक और लोकतान्त्रिक मर्यादाओं को छिन भिन्न कर रहे है। सहनशीलता का शब्दिक अर्थ है शरीर और मन की अनुकूलता और प्रतिकूलता को सहन करना। स्वयं के विरूद्ध किसी भी आलोचना को स्वीकार नहीं करना मोटे रूप में असहिष्णुता है। सहिष्णुता मनुष्य को दयालु और सहनशील बनाती है वहीं असहिष्णुता मनुष्य को दम्भी या अहंकारी बनाती है। अहंकार अंधकार का मार्ग है जो मनुष्य और समाज का सर्वनाश कर देता है। हम एक दूसरे के विरुद्ध ऐसे बयान जारी कर रहे है जिससे कटुता और घृणा का बाजार गर्म हो रहा है।
जब से सोशल मीडिया ने हमारी जिंदगी में दखल दिया है तब से हम एक दूसरे के दोस्त कम दुश्मन अधिक बन रहे है। समाज में भाईचारे के स्थान पर घृणा का वातावरण ज्यादा व्याप्त हो रहा है। फेसबुक, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर एक साल के लिए रोक लगादी जाये तो नेता और उनके अंध भक्त सुधर जायेंगे। साथ ही देश का भी भला हो जायेगा। प्रिंट मीडिया आज भी अपनी जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन कर रहा है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर हो रही बहस घृणास्पद और निम्नस्तरीय है। ऋषि मुनियों की इस पावन धरा को घृणा के विष बीज से मुक्ति नहीं मिली तो भारत को पतन के मार्ग पर जाने से कोई भी ताकत नहीं रोक पायेगी।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)

 

 

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