भुखमरी के खिलाफ दुनिया को चेताया

बाल मुकुन्द ओझा

संयुक्त राष्ट्र ने एक बार फिर दुनिया के देशों को भुखमरी के खिलाफ स्पष्ट रूप से चेताया है और कहा है कोरोना संक्रमण के वर्तमान रुख को देखते हुए भूखे पेट सोने वालों की संख्या में कमी नहीं होंगी। दुनिया में हर रोज 82 करोड़ लोग भूखे सोते हैं और अगर कोरोना का कहर यूं ही जारी रहा तो इसमें 13 करोड़ लोग और जुड़ जाएंगे। इस बारे में भूख के खिलाफ लड़ने वाली संस्था विश्व खाद्य कार्यक्रम प्रमुख का कहना है कोविड-19 वायरस दोबारा फैल रहा है। गरीब और मध्य आय वाले देशों की अर्थव्यवस्थाएं लगातार बिगड़ रही हैं अगर हमें अरबों डॉलर की सहायता नहीं मिली तो 2021 में हमारा सामना व्यापक स्तर पर भुखमरी से होगा। संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य कार्यक्रम को कोरोना काल में शांति के नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया है। शांति पुरस्कार की दौड़ में 300 से भी ज्यादा नाम शामिल थे, लेकिन दुनिया में भुखमरी मिटाने की मुहिम में जुटी विश्व खाद्य कार्यक्रम को इस सम्मान से नवाजा। हालांकि इससे पहले भी शांति का यह पुरस्कार कई संगठनों को मिल चुका है, लेकिन इस बार विश्व खाद्य कार्यक्रम को यह पुरस्कार दिया जाना बहुत महत्वपूर्ण कहा जा रहा है।
विश्व खाद्य कार्यक्रम के प्रमुख डेविड बेस्ले ने एक साक्षात्कार में कहा है की पुरस्कार ने उनकी जिम्मेदारियां बढ़ा दी है और उनका कर्तव्य है की वह दुनिया को आगाह करें और वस्तुस्थिति से अवगत कराएं। उन्होंने कहा कि अगला वर्ष इस वर्ष की तुलना में और खराब होगा और अगर अरबों डॉलर की सहायता अगर नहीं मिली तो ‘2021 में भुखमरी के मामले बेतहाशा बढ़ जाएंगे। उन्होंने सुरक्षा परिषद में अप्रैल माह में कही उस बात को याद किया कि विश्व एक ओर तो महामारी के जूझ रहा है और ‘यह भुखमरी के महामारी जैसे हालात के मुहाने पर भी खड़ा है। उन्होंने कहा कि डब्ल्यूएफपी को अगले साल 15 अरब डॉलर की जरूरत है, जिनमें से भुखमरी से निपटने के लिए पांच अरब डॉलर और एजेंसी के वैश्विक कार्यक्रमों के लिए 10 अरब डॉलर की जरूरत है।
दुनिया भर में भूखे पेट सोने वालों की संख्या में कमी नहीं आई है। यह संख्या आज भी तेजी से बढती जा रही है। विश्व में आज भी कई लोग ऐसे हैं, जो भूखमरी से जूझ रहे हैं। विश्व की आबादी वर्ष 2050 तक नौ अरब होने का अनुमान लगाया जा रहा है और इसमें करीब 80 फीसदी लोग विकासशील देशों में रहेंगे। एक ओर हमारे और आपके घर में रोज सुबह रात का बचा हुआ खाना बासी समझकर फेंक दिया जाता है तो वहीं दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें एक वक्त का खाना तक नसीब नहीं होता। कमोबेश हर विकसित और विकासशील देश की यही कहानी है।
विश्वभर में हर 8 में से 1 व्यक्ति भूख के साथ जी रहा है। भूख और कुपोषण की मार सबसे कमजोर पर भारी पड़ती हैं । दुनिया में 60 प्रतिशत महिलाएं भूख का शिकार हैं। गरीब देशों में 10 में से 4 बच्चे अपने शरीर और दिमाग से कुपोषित हैं। दुनिया में प्रतिदिन 24 हजार लोग किसी बीमारी से नहीं, बल्कि भूख से मरते हैं। इस संख्या का एक तिहाई हिस्सा भारत में आता है। भूख से मरने वाले इन 24 हजार में से 18 हजार बच्चे है और 18 हजार का एक तिहाई यानी 6 हजार बच्चे भारतीय है। एक तरफ देश में भुखमरी है वहीं हर साल सरकार की लापरवाही से लाखों टन अनाज बारिश की भेंट चढ़ रहा है। हर साल गेहूं सड़ने से करीब 450 करोड़ रूपए का नुकसान होता है।
भारत की आबादी में देश की आजादी के बाद बहुत विस्तार हुआ है। बढ़ती हुई आबादी के साथ रोजगार के साधनों के अभाव के फलस्वरूप देश को गरीबी, भुखमरी, अनपढ़ता और कुपोषण का सामना करना पड़ रहा है। भारत में गरीबी उन्मूलन और खाद्य सहायता कार्यक्रमों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद कुपोषण लगातार एक बड़ी समस्या बनी हुई है। अनुमान है कि दुनिया भर में कुपोषण के शिकार हर चार बच्चों में से एक भारत में रहता है। जनसंख्या वृद्धि के कारण खाद्यान्न समस्या का सबसे अधिक सामना विकासशील देश कर रहे हैं। सवा अरब आबादी वाले भारत जैसे देश में, जहां सरकारी आकलनों के अनुसार 32 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं, अत्यंत शोचनीय है।
आज भारत विश्व भुखमरी सूचकांक में बेहद लज्जाजनक सोपान पर खड़ा है तो इसके पीछे भ्रष्टाचार, योजनाओं के क्रियान्वयन में खामियां और गरीबों के प्रति राज्यतंत्र की संवेदनहीनता जैसे कारण ही प्रमुख है। गरीबी भूख और कुपोषण से लड़ाई तब तक नहीं जीती जा सकती है, जब तक कि इसके अभियान की निरंतर निगरानी नहीं की जाएगी।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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