लोकतंत्र का प्राण है सहिष्णुता

बाल मुकुन्द ओझा

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा विश्व सहिष्णुता दिवस हर साल 16 नवम्बर को मनाया जाता है। सहनशीलता का जिंदगी में बहुत महत्त्व है। जिसने जीवन में सहन करना सीख लिया वह जिंदगी की हर जंग जीत सकता है। सहिष्णुता जीवन शक्ति का पर्याय है। विश्व के देशों में सहनशीलता का निरंतर क्षरण हो रहा है। शासक एक दूसरे के विरुद्ध ऐसे बयान जारी कर रहे है जिससे विश्व में कटुता और असहिष्णुता का बाजार गर्म हो रहा है। विश्व सहनशीलता दिवस मनाने के पीछे यह तर्क दिया जारहा है कि विश्व समुदाय एक दूसरे का सम्मान करें और अपने नागरिकों में उन भावनाओं को पुष्ट करें जिससे किसी भी स्थिति में सहिष्णुता को हानि नहीं पहुंचे।
सहिष्णुता भारतीय जनजीवन का मूल मंत्र है। मगर देखा जा रहा है कि समाज में सहनशीलता समाप्त होती जारही है और लोग एक दूसरे के खिलाफ विषाक्त वातावरण बना रहे है जिससे हमारी गौरवशाली परम्पराओं के नष्ट होने का खतरा मंडराने लगा है। सहिष्णुता को लेकर इस समय देश की सियासत गरमाई हुई है। नेताओं के जहरीले बयानों और भाषणों से वातावरण विषाक्त हो रहा है। इससे हमारी लोकतांत्रिक परम्परायें कमजोर और क्षतिग्रस्त हुई हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पदों पर विराजमान व्यक्तियों सहित देश के विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के लिए जिस प्रकार की शब्दावली का उपयोग और प्रयोग हो रहा है वह हम सब के लिए बेहद चिंता और निराशाजनक है। सोशल मीडिया इसमें सबसे आगे है जहाँ ऐसे ऐसे शब्दों को देखा जा रहा है जिनकों इस आलेख में लिखा जाना कतई मुनासिब नहीं है। इसके लिए कोई एक पक्ष दोषी नहीं है। इस मैली गंगा में सभी अपना हाथ धो रहे है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर हो रही बहस घृणास्पद और निम्नस्तरीय है।
जीवन में आगे बढ़ने के लिए सहनशील होना आवश्यक है। सहनशीलता व्यक्ति को मजबूत बनाती है, जिससे वह बड़ी से बड़ी परेशानी का डटकर मुकाबला कर सकता है। अक्सर देखा जाता है हम छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा कर देते हैं, जिससे बात आगे बढ़ जाती है और अनिष्ट भी हो जाता है। ऐसी ही छोटी-छोटी बातों को मुस्कुराते हुए सुनने वाला व्यक्ति ही सहनशील है। सहनशीलता का शब्दिक अर्थ है शरीर और मन की अनुकूलता और प्रतिकूलता को सहन करना। मानव व्यक्तित्व के विकास और उन्नयन का मुख्य आधार तत्व सहिष्णुता है। स्वयं के विरूद्ध किसी भी आलोचना को स्वीकार नहीं करना मोटे रूप में असहिष्णुता है। सहिष्णुता मनुष्य को दयालु और सहनशील बनाती है वहीं असहिष्णुता मनुष्य को अहंकारी बनाती है। अहंकार अंधकार का मार्ग है जो मनुष्य और समाज का सर्वनाश कर देती है।
भारत में प्राचीन काल में वैदिक परम्परा का बहुत अधिक प्रभाव था। मध्यकाल आते-आते समाज में वर्ण व्यवस्था हावी हो गई। इसके साथ ही सम्पूर्ण समाज जातियों और वर्गों में विभाजित हो गया। अंधविश्वास, सामाजिक कुरीति, जात-पांत, छुआछूत, ऊँच-नीच के साथ महिला और पुरूष के मध्य भेदभाव का बोलबाला हो गया। समाज और राष्ट्र रूढ़िवादिता में फंस गया। चौदहवीं और पन्द्रहवीं शताब्दी को समाज सुधार की दिशा में अग्रणी माना गया है। इस अवधि में समाज सुधार आंदोलन फैला और सामाजिक बुराइयों को चुनौती मिली। समाज सुधार के इस आंदोलन का नेतृत्व संतों और समाज सुधारकों ने किया। इन सन्तों ने जाति प्रथा, धार्मिक कट्टरता और अंध विश्वास के विरूद्ध लोगों में चेतना के बीज बोये। संतों ने समाज में बराबरी, समता, भाईचारे और प्रेम का सन्देश फैलाया। आपसी कटुता और बैरभाव के विरूद्ध लोगों को चेताया। संत कबीरदास से लेकर गुरूनानक, रैदास और सुन्दरलाल आदि संतों में समाज में सहिष्णुता का भाव उत्पन्न कर सामाजिक समरसता को जन जन तक पहुंचाया। इससे समाज में सही अर्थों में सहिष्णुता की भावना बलवती हुई। संत कबीर हिन्दु-मुस्लिम एकता के प्रतीक थे। उन्होंने राम-रहीम को एक माना और कहा ईश्वर एक है भले ही उसके नाम अलग-अलग क्यों न हों।
सहिष्णुता ही लोकतंत्र का प्राण है। मनुष्य को सहनशील और संस्कारी बनाने के लिए प्रारम्भ से ही सहिष्णुता की शिक्षा दी जानी चाहिये ताकि वे बड़े होकर चरित्रवान और संस्कारी बने। हम बड़ी बड़ी बातें सहनशीलता की अवश्य करते है मगर उस पर अमल नहीं करते। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने कथनी और करनी के भेद को मिटाकर सही मायनों में सहिष्णुता को अपनाएं तभी देश और समाज को आगे बढ़ा पाएंगे।
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार व पत्रकार हैं)

 

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