मायावती का क्यों उमड़ा भाजपा प्रेम !

विष्णुगुप्त

मायावती हमेशा राजनीतिक अभिशाप के घेरे में रहती हैं जिससे निकलने की वह पूरी कोशिश तो करती है पर निकल नहीं पाती हैं। पहला राजनीतिक अभिशाप केन्द्रीय सरकार के समर्थन में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रहना और दूसरा अभिशाप मायावती के विधायकों-सांसदों का टूटना, विरोध कर दूसरी राजनीतिक पार्टियों के साथ चला जाना है। ये दोनों अभिशापों के काट के लिए मायावती कभी-कभी आश्चर्यजनक ढंग राजनीतिक पैंतरेबाजी भी दिखाती है। राजनीतिक पैंतरेबाजी के कारण उन्हें भारतीय राजनीति में सर्वाधिक अविश्वसनीय राजनीतिज्ञ माना गया है।
फिर भी मायावती की राजनीतिक हैसियत बनी रहती है, कभी वह महत्वहीन की श्रेणी में नहीं होती है। इसका कारण क्या है? इसका कारण दलित अस्मिता का प्रहरी होना है। निश्चित तौर पर मायावती दलित राजनीति की सर्वश्रेष्ठ और हस्तक्षेप कारी प्रहरी है। उत्तर प्रदेश जैसे देश के बडे राज्य पर वह स्वयं के बल पर कभी अपनी सरकार बनाने में वह कामयाब हो चुकी हैं, करिश्मा कर चुकी है। कभी भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी भी उत्तर प्रदेश में मायावती के साथ गठबंधन कर चंुकी है। यह अलग बात है कि मायावती हर बार गठबंधन के धर्म के विरूद्व गयी और गठबंधन वाले दल को कोसने और खिल्ली उड़ाने में भी पीछे नहीं रही। अविश्वसनीय हो जाना, बार-बार निष्ठांए बदल देना एक नुकसानकुन राजनीतिक प्रक्रियाएं हैं जिस पर चलने वाली राजनीतिक पार्टियां और राजनेता लंबे समय तक अपने आप को भारतीय राजनीति में हस्तक्षेपकारी भूमिकाओं में असफल ही साबित होते हैं। जब तक काशी राम की छ़त्रछाया थी तब तक दलित संवर्ग पूरी तरह आंख मुंद कर बसपा पर विश्वास करते थे, बसपा के समर्थन में उफान उत्पन्न करते थे, राष्ट्रीय राजनीति में बसपा के समर्थक अपनी उपियोगिता और भूमिका में चर्चित रहते थे। काशी राम की छत्रछाया उठने के बाद मायावती के सामने बसपा को भारतीय राजनीति में हस्तक्षेपकारी भुमिका निभाने में कामयाबी नहीं मिली है। बसपा का जनाधार धीरे-धीरे घट रहा है, बसपा की उफान की राजनीति भी लगभग दम तोड़ चुकी है।
मायावती ने फिर पैंतरेबाजी दिखायी है, फिर आश्चर्यचकित की है। मायावती की यह पैंतरेबाजी और आश्चर्यचकित करने की राजनीति ने देश की राजनीति का ध्यान खींचा है। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि मायावती की पैंतरेबाजी क्या है, मायावती की आश्चर्यचकित करने वाली राजनीति क्या है? दरअसल मायावती ने वर्षो बाद एक बार फिर भाजपा प्रेम दिखायी है। मायावती ने घोषणा कर डाली है कि वह भाजपा प्रेम से भी पीछे नहीं हटेगी, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव को राजनीतिक रूप से हाशिये पर भेजने के लिए वह भाजपा के साथ दोस्ती करने के लिए तैयार है, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि उसने बिहार के विधान सभा चुनावों में भाजपा का समर्थन करने की भी घोषणा कर डाली। उनकी इस घोषणा से भारतीय राजनीति आश्चर्यचकित है। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि कांग्रेस की भी आलोचना करने में मायावती पीछे नहीं रहती हैं। कांग्रेस ने इधर उत्तर प्रदेश में अपनी सक्रिया निश्चित तौर पर बढायी है, उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी जरूर है, समाजवादी पार्टी के बाद बसपा तीसरी शक्ति की पार्टी है। पर राजनीतिक घटनाओं के लेकर समाजवादी पाटी और बसपा की सक्रियता उतनी उफान वाली नहीं होती है, उतनी चर्चित नहीं होती है जितनी उनसे उम्मीद थी या फिर जितनी चर्चित भूमिकाएं कांग्रेस निभाती है। हाथरस जैसी घटनाएं हो या फिर लोकडाउन जैसे संकट हर मामले में कांग्रेस सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को संकट में डालने और भाजपा की आलोचना में आगे रहने की भूमिका निभायी है। उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की सक्रियता काफी सशक्त रही है, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की राजनीतिक सक्रियता के कारण भाजपा काफी दबाव में रही है। जब-जब राहुल गांधी और प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में सक्रिय होकर राजनीतिक उफान उत्पन्न करते हैं तब तब मायावती विरोध में खडी हो जाती है, मायावती कांग्रेस, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को दलित विरोधी ठहरा कर भाजपा का काम या संकट को आसान कर देती है।
मायावती की वर्तमान राजनीति पैंतरेबाजी की दो राजनीतिक श्रेणियां है। पहली श्रेणी भाजपा के समर्थन में खडी होना, दूसरी श्रेणी है अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी को मटियामेट करने का अहम भरना। दोनों श्रेणियों के पीछे कारण क्या है? आखिर मायावती अचानक भाजपा प्रेम क्यों आ गयी और अखिलेश को मटियामेट करने की कसम क्यों खाने लगी?दसअसल राजनीतिक पैंतरेबाजी की यह दोनों श्रेणियां उत्तर प्रदेश राज्यसभा के चुनाव से निकली हैं। मायावती का सीधा आरोप है कि अखिलेश यादव ने उनके साथ विश्वासघात किया है, बसपा को तोडने का कार्य किया है। वास्तव में इसके पीछे अखिलेश यादव की राजनीतिक चाल भी है। मायावती कहती है कि उसने अखिलेश यादय से बात कर ही राज्यसभा चुनाव में अपना प्रत्याशी उतारा था। लेकिन ने अखिलेश ने निर्दलीय उम्मीदवार का समर्थन कर विश्वासघात किया है। मायावती के करीब आठ विधायकों ने बगावत कर दिया। इस बगावत के पीछे अखिलेश यादव की कारस्तानी मानी थी। हालांकि मायावती को कोई नुकसान नहीं हुआ। भाजपा की वजह से मायावती का राज्य सभा चुनाव में खडा प्रत्याशी चुनाव जीतने में सफल हो गया। भाजपा के पास नौ प्रत्याशियों को जीताने के लिए वोट थे लेकिन उसने आठ ही प्रत्याशी खडी की थी। इस कारण मायावती का प्रत्याशी भी चुनाव जीत गया। अगर भाजपा ने नौ प्रत्याशी चुनाव में उतारे होती तो निश्चित तौर पर बसपा का प्रत्याशी चुनाव हार जाता और बसपा अखिलेश यादव की कारस्तानी की शिकार हो जाती।
मायावती का भाजपा प्रेम क्यों जागा? इस पर विचार करेंगे तो पायेंगे कि यह तो मायावती की राजनीतिक चरित्र में शामिल है। वह केन्द्रीय सत्ता के साथ कभी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रत्यक्ष तौर साथ रहती है। मायावती कभी भी केन्द्रीय सरकार के विरोध में रह ही नहीं सकती है। उदाहरण भी देख लीजिये। कांग्रेस के दस साल की सरकार का वह बाहर से अप्रत्यक्ष तौर पर समर्थन की थी। कांग्रेस के पास पूर्ण बहुमत भी नहीं था फिर भी कांग्रेस ने बसपा से समर्थन भी कभी नहीं मांगा। फिर मायावती समर्थन में खडी रही। संसद में बसपा कभी जरूरत के अनुसार बायकॉट कर देती थी तो कभी जरूरत के अनुसार संसद के अन्दर कांग्रेस के समर्थन में बसपा खडी हो जाती थी। ऐसा इसलिए करती थी कि उन पर कांग्रेस सरकार की तलवार हमेशा लटकती रहती थी? अब आप कहेंगे कि कैसी तलवार? मायावती के भ्रष्टचार और आय से अधिक संपति रखने का हथकंडा कांग्रेस पकड कर रखी थी। जब-जब मायावती कांग्रेस के खिलाफ जाने की कोशिश करती तब तब कांग्रेस भ्रष्टचार और आय से अधिक संपत्ति रखने का हथकंडा चला देती थी, फिर मायावती कांग्रेस के पक्ष में मिमियाती रहती थी। नरेन्द्र मोदी सरकार के समय में भायावती के भाई के घर छापा पडा था। आयकर विभाग ने छापा मारा था। आयकर विभाग के छापे में जो कुछ बरामद हुआ और सामने आया उससे देख कर लोग आश्चर्यचकित थे। मायावती के भाई का कोई बडा ब्यापार नहीं था, उसकी कोई फैक्टरी नहीं थी, सोना उगलने वाला कोई खान नहीं था फिर भी उसके यहां से चार सौ करोड़ से अधिक की संपत्ति पायी गयी थी। अगर इस पर आयकर विभाग की वीरता होती और इसके घेरे में मायावती को लिया जाता तो फिर शशिकला की तरह मायावती भी जेल की चक्की पिसती रहती और फिर मायातवी की राजनीति पूरी तरह से समाप्त हो जाती।
भाजपा प्रेम से मायावती को क्या मिलेगा? शायद मायावती को कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। केन्द्र में भाजपा को पूर्ण बहुमत है, उत्तर प्रदेश में भी भाजपा को पूर्ण बहुमत है। इसलिए भाजपा को काई खास लाभ होने वाला नहीं है। रही बात 2022 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव की तो उसमें भी भाजपा को कोई खास लाभ होने वाला नहीं है। भाजपा यह जानती है कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी अलग-अगल लडती है तो फिर उसका लाभ भाजपा को ही मिलेगा। मायावती जितना भी अखिलेश यादव और कांग्रेस के खिलाफ बोलेंगी उतना ही भाजपा को लाभ होगा। भाजपा को मुस्लिम वोटों के एकीकरण से परेशानी होती है। समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी अलग-अलग लडेगी तो फिर मुस्लिम वोटों का विभाजन होगा। मुस्लिम वोट तो वहां जरूर बंटेगा जहां पर मुस्लिम प्रत्याशी टकरायेंगे या फिर समाने होंगे। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बसपा मुस्लिम वोटों के लिए पागल ही रहती है, इनमें होड भी होती है। इसलिए मायावती से अलग रहना ही भाजपा के लिए फायदेमंद हैं। इस समीकरण पर मायावती का भाजपा प्रेम घाटे का सौदा है।
क्षणे रूष्टा, क्षणे तुष्टा की राजनीति से कोई विश्वसनीयता नहीं बनती है। मायावती को इससे हानि होती है, उनकी राजनीति विश्वसनीयता की सहचर नहीं होती है बल्कि विश्वासघात की श्रेणी में खडी हो जाती है। मायावती को अब राजनीति के संपूर्ण पक्ष को आत्मसात करना चाहिए। सिर्फ दलित उफान और मुस्लिम तुष्टिकरण से सरकार बनाने की शक्ति हासिल नहीं हो सकती है। अगर ऐसा होता तो मायावती निश्चित तौर पर मायावती हमेशा सरकार में बनी रहती। दलितों का भी अब मायावती से मोह भंग हो रहा है। दलित वर्ग पर भाजपा का वर्चस्व बढ रहा है। इसलिए मायावती को विश्वसनीय बनने की जरूरत है।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)

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