माय डियर ! आप ऐसे कैसे जा सकते हैं ? 

पत्रकार स्व. मुनीश जोशी को साहित्यकार एवं पत्रकार पुरुषोत्तम पंचोली की कलम से श्रद्धांजलि

“माय डियर “ उनका तकिया कलाम था। छोटा हो या बड़ा , नेता हो कि अफसर , उनकी बात-चीत में  ” माय डियर ” गूंज ही जाता था।
रात को एक किताब के पन्ने पलट रहा था कि  ” चंदू जी ” का फोन आया। उन्होंने बिना भूमिका के बताया –  ” माय डियर ” चले गए। फिर उन्होंने ” माय डियर ” के मुतल्लिक कुछ जानकारियां चाही। मैं बेमन से बताता रहा पर रह रह कर  ” माय डियर ” का चेहरा मेरी आँखों में झिलमिलाता रहा।
अमूमन चंदू जी की खबरें सच ही होती हैं फिर भी फेस बुक ,इस गरज से देखने लगा कि शायद किसी ने इस बाबत कोई पोस्ट डाली हो। अनिल भाई ने फोटो सहित  उनके अलविदा कहने की पुष्टि कर डाली थी।
हाथों की किताब बंद की तो वक्त की किताब के पन्ने फड़फड़ाने लगे…
उनका नाम था तो माँगीलाल जोशी पर शायद ही कोई उन्हें इस नाम से जानता हो ? वे खुद को मुनीष जोशी बताते थे।  ” मायसेल्फ  मुनीष जोशी “  कह कर वे सुनने वाले को समझा देते थे कि अंग्रेजी उन्हें आती है ,और कोई उन्हें गाँव-गवंई का देसी-बासी पत्रकार समझने की भूल न करे।
मुनीष जोशी उन बिरले पत्रकारों में से थे , जिनकी पढ़ाई-लिखाई या अध्ययन – स्वाध्याय भले ही रेखांकनीय न रहा हो पर किसी भी राजनेता या अफसर से बात करते हुए उनका आत्मविश्वास इतना लबालब रहता कि किसी को उनकी पढ़ाई-लिखाई तो क्या उनके वास्तविक नाम पूछने की भी हिम्मत नहीं होती थी।
मुनीष जोशी से मेरा पहला परिचय तब हुआ जब मैं कोटा के कॉमर्स कालेज ( तब वाणिज्य- परिषद) के छात्रसंघ का प्रथम निर्वाचित अध्यक्ष  घोषित किया गया और छात्रसंघ के पदाधिकारियों के शपथ-ग्रहण समारोह में बतौर मुख्यातिथि तब के तिलस्मी नेता और सांसद डॉ.सुब्रह्मण्यम स्वामी कोटा आए। इस समारोह के कवरेज के लिए मेने मुनीष जी को भी आमंत्रित किया था। समारोह सम्पन्न हुआ और उसके घंटे भर बाद ही आकाशवाणी जयपुर-बीकानेर ( उस समय आकाशवाणी कोटा का अस्तित्व नहीं था ) से इस समारोह की खबर प्रसारित हुई । डॉ स्वामी तो खैर अन्तर राष्ट्रीय व्यक्तित्व के धनी थे पर मुझ अकिंचक का नाम भी ईथर पर गूंज रहा था , जाहिर ही मैं परम प्रसन्न था , पर दूसरे दिन ही मुनीष जी ने मुझसे पचपन रुपये यह कह कर ले लिए कि आकाशवाणी को खबर भेजने के लिए उन्होंने टेलीग्राम किया था और उस पर पचपन रुपये खर्च हुए हैं। मेने उन्हें पैसे तो दे दिए पर ततक्षण ही से पत्रकारों के प्रति जो उदात्तता मेरे मन में थी , तड़क गई।
यह घटना 1978 की है। मैं उन दिनों भी पत्रकारिता करता था , जैसे कि कॉलेज के दिनों मे छोटे-मोटे अखबारों में लिखने , खबरे भेजने के अलावा मैं  दिल्ली से प्रकाशित होने वाली – ” जाह्नवी” पत्रिका का ” कॉलेज – प्रतिनिधि ” था ,पर मैं मुनीष जोशी जैसा नामवर पत्रकार कतैई नहीं था।
यह पत्रकारिता का सत्तर का दशक था और कोटा में मुनीष जोशी आकाशवाणी के अलावा नवभारतटाइम्स में भी खबरे भेजते थे , राजस्थान पत्रिका का कोटा संस्करण अभी शुरु नहीं हुआ था ,अलबत्ता  ‘ पत्रिका ‘ का एक छोटा- सा केबिन  ” चमन न्यूज ऐजेंसी ” की  सीलिंग में बना हुआ था।उस समय चन्द्रभान सिंह जी पत्रिका के लिए खबरे भेजते थे ,उनके सहायक के तौर पर थोड़े समय तक राम भाई भी रहे थे।भवंर शर्मा ” अटल ”  अपने दैनिक अखबार ” जननायक ” को जमाने को जिद्दोजहद में लगे हुए थे।आनन्द लक्षमण खान्डेकर जी ,राष्ट्रदूत में स्थानीय सम्पादक थे तो पीयूष जैन ,  ” अधिकार ” के प्रभारी सम्पादक थे। कोटा से उस समय तकरीबन दर्जन भर दैनिक और उससे दोगुने साप्ताहिक – पाक्षिक अखबार प्रमुखता या कहना चाहिए नियमित प्रकाशित होते थे।
कहना न होगा कि मुनीष जोशी उस काल में कोटा के पत्रकारिता – क्षितिज के चमचमाते सितारे थे। कोटा में प्रेस क्लब की शुरुआत कब हुई यह तो उसके रजिस्ट्रेशन के वर्ष और तारीख से पता चल जाता है लेकिन निष्क्रिय व फाईलों में कैद प्रेस क्लब के मुनीष जोशी लम्बे समय तक सचिव रहे। पूरे हाड़ौती सम्भाग में मुनीष जोशी ही थे जो अस्सी से पहले दशक में टाई लगाते थे और कभी-कभार अपनी अति  साधारण अंग्रेजी में प्रेस कांफ्रेंस में राजनेताओं या अफसरों से सवाल पूछते थे।
कोटा खुला विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद यहाँ पत्रकारिता विभाग शुरु हुआ तो डॉ रमेश जैन इस विभाग के सर्वेसवा थे। पत्रकारिता के डिप्लोमा कोर्स और डिग्री कोर्स की पढ़ाई के लिए विद्यार्थियों के शिक्षण शिविर आयोजित किए जाते थे , मुनीष जोशी इस आयोजन के समन्वयक थे। हालांकि मैं उनकी  गुडबुक में कभी नहीं रहा पर यह उनकी सदाशयता ही थी कि मुझे शिक्षण शिविर में पत्रकारिता के विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए आमंत्रित करते थे।
जोशी जी  का जलवा और प्रशासन पर प्रभाव की  यह मिसाल ही कही जा सकती है कि शहर की प्राइम लोकेशन वाली कॉलोनी में उन्हें पत्रकार कोटे में आवास आवंटित हुआ। वह अनेक वर्षों तक मंगलम सीमेन्ट फेक्ट्री , सीएफसीएल व रामगंजमंडी की कोटा स्टोन कम्पनी के लिए अखबारों के निमित्त दिए जाने वाले विज्ञापनों का निर्धारण व वितरण भी करते रहे।
मुनीष जी , प्रजापिता ब्रह्माकुमारी संस्थान से भी जुड़े रहे और इस जुड़ाव के खातिर उन्होंने एकाधिक बार संस्थान के मुख्यालय माउंट आबू का आतित्थ्य प्राप्त किया।
सन 2002 में मैं रोहतक (हरियाणा) में  ” हरिभूमि ” अखबार में काम कर रहा था। सर्दियों के दिन थे ,सूरज दिनों तक गुम रहता था कि अचानक फोन की घंटी बजी । मेने  हेलो बोला ही था कि उधर से खनकती आवाज आई – ” माय डियर , पंचोली बोल रहे हो क्या ?”
 मैं उनकी आवाज पहचान गया। मेने कहा – ” जी , आपने सही पहचाना , कैसे याद किया मुझे ? “
जोशी जी ने कहा कि वे अभी अभी अमृतसर पहुंचे ही हैं और उनको यहाँ दो दिन ठहरना है ।उन्हें कोटा में किसी से यह मालुम हुआ था कि मै पंजाब या हरियाणा में किसी अखबार में काम कर रहा हूँ , सो अमृतसर में कोई सरकारी/ गैरसरकारी विश्रामालय में उनके ठहरने की व्यवस्था मैं कर दूँ।
मेने उन्हें एक नम्बर दिया और कहा कि आप इस नम्बर पर मेरा हवाला दे कर फोन कर लीजिए ,आपके रुकने का इंतजाम हो जाएगा। वे  फोन पर बार बार – ” थेंक्यू माय डियर , थेंक्यू माय डियर ” कहते रहे।
आज जब मुनीष जोशी जी को याद कर रहा हूँ गुजरे जमाने की वे सारी तस्वीरे खयाल में आ रही है… और याद आ रहा है पत्रकारिता का वह दौर जब परस्पर भरोसा और विश्वास इतना गहरा था कि अपने निजी सुख-दुख , व्यक्तिगत परैशानियों को भी हम मदद की आस में निश्छल मन से साझा कर देते रहे।
 इस कोरोना- काल में जब पारस्परिक भरोसा भी भरभरा कर टूट रहा हो ,आपको तो इस तरह यकायक नहीं चले जाना था –  माय डियर !
                   (पत्रकार स्व. मुनीश जोशी को साहित्यकार एवं पत्रकार पुरुषोत्तम पंचोली की कलम से श्रद्धांजलि)
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