मां कालरात्रि की उपासना से दूर होंगे संकट

बाल मुकुन्द ओझा

संसार में धर्म की रक्षा तथा दैत्यों के विनाश के लिए ऋषि-मुनियों ने जब-जब ईश्वर से प्रार्थना की तब-तब उस ईश्वर ने किसी शक्ति को धरा के कल्याण के लिए दैवीय शक्ति को उत्पन्न किया। ऐसे ही परम शक्ति माँ आदिशक्ति दुर्गा भवानी की उत्पत्ति ईश्वरीय इच्छा से हुई जिसमें अनेक देवी देवताओं की शक्ति समाहित है। माँ दुर्गा की सांतवी मूर्ति देवी माँ कालरात्रि की उत्पत्ति नवरात्रि के सातवें दिन होती है जो इस संसार के मानव का कल्याण करती है।
शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन महासप्तमी होती है। इस दिन मां दुर्गा के सातवें स्वरूप कालरात्रि की पूजा का विधान है। मां दुर्गा की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है। मां कालरात्रि को यंत्र, मंत्र और तंत्र की देवी कहा जाता है। इनका रंग काला है और ये तीन नेत्रधारी हैं। मां कालरात्रि के गले में विद्युत् की अद्भुत माला है। इनके हाथों में खड्ग और कांटा है और गधा इनका वाहन है। मां कालरात्रि को शुभंकरी भी कहते हैं। शक्ति का यह रूप शत्रु और दुष्टों का संहार करने वाला है। पौराणिक मान्यता है कि मां कालरात्रि ही वह देवी हैं जिन्होंने मधु कैटभ जैसे असुर का वध किया था। कहते हैं कि महासप्तमी के दिने विधि-विधान से कालरात्रि की पूजा करने पर मां अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। मान्यताओं के अनुसार, मां कालरात्रि साधक के शत्रुओं का विनाश करने वाली हैं और हर परेशानी से भक्तों की रक्षा करती हैं। तंत्र साधकों के लिए मां कालरात्रि की पूजा विशेष फल देने वाली होती है। यही वजह है कि तांत्रिक आधी रात में मां कालरात्रि की विशेष पूजा करते हैं।
ऐसा भी कहा जाता है कि मां कालरात्रि की पूजा करने वाले भक्तों को किसी भूत, प्रेत या बुरी शक्ति का भय नहीं सताता। ये ग्रह-बाधाओं को भी दूर करने वाली हैं। इस दिन साधक का मन सहस्त्रार चक्र में होता है। मां के इस स्वरूप को अपने हृदय में अवस्थित कर साधक को एकनिष्ठ भाव से उनकी अराधना करनी चाहिए।
माँ काल रात्रि प्रत्येक भक्त का कल्याण करने वाली है। माँ के विषय में पुराणों में कई कथानक मिलते हैं। जिसमें सबसे प्रमाणिक दुर्गा सप्तशती है, जो दुर्गा के नवरूपों की उत्पत्ति के विषय को बड़े ही सार गर्भित रूप से जानकारी देती है। इसके अतिरिक्त भागवत तथा अन्य पुराणों में भी माँ की कथा व महिमा के अंश प्राप्त होते है। काल रात्रि को काली का ही रूप माना जाता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं)

 

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