कश्मीर के खुराफाती नेता न मानें तो सख्त कारवाई हों

आर.के. सिन्हा

जम्मू-कश्मीर के नज़रबंद नेताओं ने रिहा होते ही फिर से अपनी पुरानी खुऱाफात चालू कर दी है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्रियों फारूख अब्दुल्ला, महबूबा मुफ़्ती, उमर अब्दुल्ला और जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ़्रेंस, माकपा तथा जम्मू-कश्मीर अवामी नेशनल कॉन्फ़्रेंस के नेताओं ने हाल ही में यह मांग कर दी कि भारत सरकार राज्य के लोगों को वो सारे अधिकार फिर से वापस लौटाए जो पाँच अगस्त 2019 से पहले उनको हासिल थे। मतलब यह कि वे यह चाहते हैं कि संविधान के अनुच्छेद 370 की पुनः बहाली हो जो संसद के दोनों सदनों ने रद्द कर दिया है, ताकि ये मौज कर सकें। ये तो भारत के कट्टर शत्रु चीन और पाकिस्तान की ही भाषा तो बोल रहे हैं। ये दोनों देश भी तो यही चाहते हैं कि भारत जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे की पुनः बहाली करे। इन नेताओं की बैठक में एक प्रस्ताव भी पारित किया गया जिसे गुपकार घोषणापत्र नाम दिया गया था। हालांकि इन नेताओं की मांग अब ख्वाबों में भी पूरी तो नहीं होती दिख रही । जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने के हक में संसद और सरकार के साथ सारा देश ही खड़ा था। आखिर पता तो चले कि अनुच्छेद 370 में क्या बात है जिसकी मांग कश्मीरी नेता कर रहे हैं? क्या यह सच नहीं है कि अनुच्छेद 370 कश्मीर और भारत को एक दूसरे से पूरी तरह नहीं जोड़ती था? गृह मंत्री अमित शाह ने सही कहा था कि अनुच्छेद 370 ने भारत और दुनिया के मन में यह गलत और भ्रामक शंका पैदा कर दी थी कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है या नहीं? अब यह सारा देश जानता है कि बिना अपनी कैबिनेट को विश्वास में लिए आकाशवाणी के माध्यम से कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने की विवादास्पद घोषणा पंडित जवाहर लाल नेहरू ने की थी।

किधर हैं हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता

जरा देखिए तो सही कि पाकिस्तान से चंदा मांगने वाले अब यह मांग कर रहे कि कश्मीर में पुरानी व्यवस्था फिर से बहाल हो। अब किधर हैं हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता ? वे तो दिन-रात पाकिस्तान का ही गुणगान किया करते थे। सारा देश अब यह भलीभांति जानता है कि अनुच्छेद 370 के कारण ही कश्मीर में अलगाववाद बढ़ा था। क्या कभी अब्दुल्ला या महबूबा मुफ्ती ने राज्य के अल्पसंख्यकों के हक भी आजतक में बोला?

क्या वहां हिंदू, जैन, बौद्ध और सिख नहीं रहते? अनुच्छेद 370 से राज्य के अल्पसंख्यकों के साथ घोर अन्याय हो रहा था। राज्य में 1989 से लेकर 2019 तक हजारों लोग बिना वजह मारे गए। क्या अब जब वहां पर हालात सामान्य हो चुके हैं तो फिर देश उसी पुराने रास्ते पर चले जिस पर वह पिछले 70 सालों से गलत ढंग से चल रहा था?

क्यों कश्मीर के नेता या उनके लिए आंखें नम करने वाले उनके हिमायती यह नहीं बताते कि अनुच्छेद 370 किस तरह कश्मीर का कल्याण कर रहा था? बेशक यह विकास, महिला और गरीब विरोधी और आतंकवाद को बढ़ावा देने वाला था और वहां के मुठ्ठी भर परिवारों को भ्रष्टाचार की खुली छूट दे रखी थी जो पूरी तरह बंद हो जाने से वहां के इन भ्रष्ट नेताओं में बेचैनी फैली हुई है ।

जिस अनुच्छेद 370 की बहाली की मांग हो रही है, उसकी वजह से राज्य में बाल विवाह कानून लागू नहीं कर सकते थे ? क्या कश्मीरी नेता फिर से यही चाहते है? इसी के चलते वहां पर कभी अल्पसंख्यक आयोग भी नहीं बना। वहां हिन्दू, जैन, सिख और बौद्ध अल्पसंख्यकों के रूप रहते हैं। हालांकि शिक्षा का अधिकार देश की संसद ने सबको दिया पर जम्मू-कश्मीर के बच्चों को यह अधिकार नहीं था, क्योंकि वहां अनुच्छेद 370 लागू था। कश्मीर में अब खारिज कर दिए गए ये नेता यह क्यों नहीं बताते कि राज्य में आरटीआई एक्ट लागू क्यों नहीं हो पाया? इसी धारा 370 के कारण न ? ऐसे अनेकों उदहारण हैं जिससे कश्मीर में घोर असमानता, अन्याय, अत्याचार और खुले भ्रष्टाचार को छूट मिली हुई थी I

शांति की बहाली हो गई

बहरहाल, कश्मीरी नेताओं की बैठक में कांग्रेस का कोई नुमाइंदा नहीं था। यह अच्छी बात कही जा सकती है। तो क्या माना जाए कि कांग्रेस ने भी अब महसूस करना चालू कर दिया है कि उसका अबतक राज्य में धारा 370 को समर्थन करना गलत था? हालांकि कांग्रेस के नेता तो यह भविष्यवाणी कर रहे थे कि इसके निरस्त करने के बाद खून खराबे की स्थिति बन जाएगी। जबकि इसके हटने के बाद वहां अभूतपूर्व शांति की बहाली हो गई। कोरोना काल से पहले वहां पर स्कूल भी खुल गए थे। उनमें परीक्षाएं हो रही थीं। श्रीनगर में अस्पताल भी खुल गए थे।

दरअसल अब कश्मीरी नेताओं को जमीनी हकीकत समझने और व्यवहारिक होने की जरूरत है। उन्हें जमीनी हकीकत तो अब समझ आ ही जानी चाहिए। अब उनकी बकवास कोई सुनने वाला नहीं है। वे चाहें तो कर के देख लें आंदोलन। उन्हें समझ आ जाएगा कि वे राज्य की जनता का विश्वास पूरी तरह खो चुके हैं। उनसे अब सारा देश सवाल पूछ रहा है कि वे चीन और पाकिस्तान की भाषा क्यों बोल रहे हैं?

चीन कह रहा है कि जम्मू- कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा खत्म करना अवैध और अमान्य है। वह भारत के आंतरिक मामले में दखल देकर अपनी औकात के बाहर चला गया I चीन ने पिछले साल भारत सरकार की तरफ से धारा 370 को हटाने के कदम को ‘अस्वीकार्य’ करार दिया था। उधर, कश्मीर पर भारत सरकार के कदमों से पाकिस्तान की नींद तो उड़ी ही हुई है। भारत द्वारा लिए गए फैसले के बाद पाकिस्तान में जबर्दस्त खलबली मच गई।

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने संसद का संयुक्त सत्र बुलाया। संयुक्त सत्र में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भारत सरकार के फैसले को आरएसएस के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाला कदम बताया। दिमाग से सनकी हो गए इमरान खान ने भारत के मुसलमानों को भड़काने और उकसाने वाली पूरी बकवास की। वे तब से बार-बार यह कह रहे हैं कि भारत में मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है। इस तरह की बयानबाजी करके इमरान खान ये ही साबित करते रहे कि वे घनघोर भारत विरोधी हैं और वे यही चाहते हैं कि पाकिस्तान में जो वे हिन्दुओं, सिखों और ईसाइयों के साथ अन्याय कर रहे हैं, वही भारत मुसलमानों के साथ यहाँ भी करे । वे भारत के मुसलमानों को भड़काने की कोशिश कर आहे हैं जिसमें वे कभी सफल न होंगे I तो इस आलोक में ये कैसे न कहा जाए कि कश्मीरी नेता भारत के दुश्मनों के हाथों में खेल रहे हैं। जब चीन और पाकिस्तान भारत को जंग की धमकी दे रहे हैं तब कश्मीरी नेता वही अनाप-शनाप मांगे रख रहे हैं जो कभी पूरी नहीं होने वाली। इन्हें समझ आ जाना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर की तरह भारत की एक-एक इंच भूमि पवित्र और खास है। कोई जगह कम या अधिक विशेष नहीं है। देश हित और कश्मीरी नेताओं के हित में यही होगा कि अब ये राज्य के विकास में सरकार का साथ दें और जनता का विश्वास पुनः प्राप्त करने की कोशिश करें । वे राज्य के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा से मिल कर काम करें। मनोज सिन्हा बेहद समझदार नेता हैं। वे सबको साथ लेकर चलने में यकीन भी करते हैं। लेकिन, चिंता तो यह है कि यदि राज्य का विकास हो जायेगा तो इनको पूछेगा कौन ?

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तभकार और पूर्व सांसद हैं)

 

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