सृजन, पालन और संहार करने वाली परमशक्ति हैं स्कंदमाता

बाल मुकुन्द ओझा

स्कंदमाता हमें बताती हैं कि मानव जीवन अच्छाई-बुराई के बीच एक संग्राम है और हम स्वयं अपने सेनापति हैं। इस संग्राम में हमें सैन्य सञ्चालन की शक्ति मिलती रहे इसलिये माँ की पूजा करनी चाहिये।
शारदीय नवरात्रि चल रही है जिसमें हर दिन मां दुर्गा के अलग स्वरूप की पूरे विधि-विधान से पूजा अर्चना की जाती है। मां के हर स्वरूप का अपना अलग ही महत्व होता है। इसी के अंतर्गत नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है। भागवत के अनुसार देवी ही ब्रह्मा ,विष्णु एवं महेश के रूप में सृष्टि का सृजन ,पालन और संहार करती हैं। अर्थात यही सृजन, पालन और संहार करने वाली आद्या परमशक्ति हैं। ये ही पराशक्ति नवदुर्गा, दस महाविद्या हैं। नवरात्रि के पांचवें दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है। स्कंदमाता को वात्सल्य की मूर्ति कहा जाता है। मां स्कंदमाता अत्यंत दयालु है। माता के इस रूप में उन्होंने अपने पुत्र को अपनी गोद में बैठा रखा है। इस दिन मां स्कन्दमाता को जौ बाजरे का भोग लगाया जाता है। अगर किसी व्यक्ति को शारीरिक कष्टों का निवारण चाहिए तो इस दिन माता को केले का भोग लगाएं।
पौराणिक मान्यता है कि इनकी पूजा करने से संतान योग की प्राप्ति होती है। स्कंदमाता को सृष्टि की पहली प्रसूता स्त्री माना जाता है। भगवान स्कंद कुमार कार्तिकेय की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है। उसके अलावा ये शक्ति की भी दाता हैं। स्कंदमाता शेर पर सवार रहती हैं। उनकी चार भुजाएं हैं। ये दाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा से स्कंद को गोद में पकड़े हुए हैं। नीचे वाली भुजा में कमल का पुष्प है।
हिन्दू मान्यताओं में स्कंदमाता सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं। बताते हैं कि जो भक्त सच्चे मन और पूरे विधि-विधान से स्कंदमाता की पूजा करता है उसे ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में स्कंदमाता की पूजा का काफी महत्व बताया गया है। माना जाता है कि इनकी उपासना से भक्त की सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। मन को एकाग्र और पवित्र रखकर इस देवी की आराधना करने वाले साधक या भक्त को भवसागर पार करने में कठिनाई नहीं आती है।

 

 

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