कोरोना के दौर में मानसिक सेहत हैं गंभीर समस्या

डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

सुसाइड प्रिविंशन इन इंडिया फाउंडेशन की पिछले दिनों आई सर्वे रिपोर्ट ना केवल गंभीर चेतावनी देती है अपितु देश में लोगों की बदलती मानसिकता को भी दर्शाने वाली है। कोरोना के कारण लोग अवसाद या यों कहे कि डिप्रेशन के तेजी से शिकार हो रहे हैं। डिप्रेशन की यह समस्या हमारे यहां ही नहीं अपितु समूचे विश्व को अपने आगोश में लेती जा रही है। केवल अंतर यह है कि हमारे यहां डिप्रेशन या यों कहें कि मनोरोग के ईलाज की जिस तरह की व्यवस्था या आधारभूत संरचना होनी चहिए वह अभी कोसों दूर है। दुनिया में सबसे अधिक आत्महत्या करने वाले देशों में हमारा देश शुमार है। कोरोना के इस दौर में जिस तरह से लोग अवसाद की षिकार होते जा रहे हैं वह अपने आप में गंभीर चिंता का विषय है। हालात यहां तक देखने को मिल रहे हैं कि कोरोना अवसाद के कारण चिकित्सक तक मौत को गले लगाने में नहीं हिचकिचा रहे हैं। पिछले दिनों कोविड सेंटरों पर आत्म हत्याओं के मामलें देश के अलग अलग कोनों में देखेने को मिले हैं। कोरोना ने एक तरह से सबकुछ हिला कर रख दिया है। हांलाकि दोष केवल कोरोना को ही नहीं दिया जा सकता है। हां कोरोना के कारण डिप्रेशन के हालात बहुत अधिक बढ़ें हैं। दरअसल कोरोना का भय और शुरुआती दौर में दुर्भाग्य से कोरोना संक्रमित होने पर जिस तरह से उसे कोविड सेंटरों में आइसोलेट करने की तस्वीर देखने को मिली है उससे लोगों में दहसत और अधिक बढ़ गई है। शुरुआती दिनों में कोविड संक्रमितों को घर से लेजाने, फिर घर को सेनेटाइज करने और फिर आसपास के इलाकें को सील करने की तस्वीर डिप्रैशन बढ़ाने में और अधिक सहायक रही है। इसके साथ ही जिस तरह से कोरोना के कारण लाॅकडाउन के दौरान घर में कैद होने और सभी आर्थिक गतिविधियों के ठप्प होने के कारण रोजगार की समस्या ने एकाएक डिप्रेशन के हालात अधिक पैदा किए हैं। लाॅकडाउन के कारण जो जहां था वह वहीं बंद होकर रह गया। उद्योग धंधें बंद होकर रह गए। नौकरी पर तलवार लटक गई तो कहीं नौकरी से निकालने का सिलसिला चला तो सैलेरी कम करने या भत्तों में कमी आम हो गई। इसके साथ ही वर्क टू होम को अभी आदत में लाना मुश्किल भरा काम हो गया है। कुछ समय तक तो वर्क टू होम ठीक लगा। कुछ ऐसे काम धंधें रहे है जो लाॅकडाउन हटने के बाद भी पटरी पर नहीं आ सके हैं। इनमें होटल्स, माॅल्स, सिनेमा, स्कूल, कोचिंग, टूरिज्म और इसी तरह के अन्य धंधें है जिनके पटरी में आने में समय लगेगा। देखा जाए तो कोरोना के कारण मेडिकल खासतौर से निजी चिकित्सालयों के हालात भी काफी बदल गए हैं। ऐसे में लोगों में डिप्रेशन आम होता जा रहा है।
पिछले दशकों में जिस तरह से हमारी संयुक्त परिवार व्यवस्था छिन्न भिन्न होने लगी है, जिस तरह से रहन-सहन व जीवन शैली बदली है उससे डिप्रेशन के मामलें कुछ ज्यादा ही तेजी से बढ़ने लगे हैं। पति-पत्नी दोनों के ही नौकरीपेशा होने, एक ही बच्चा होने, बच्चे के बचपन के स्थान पर प्रतिस्पर्धा में धकेलने और भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उधार संस्कृति डिप्रेशन के प्रमुख कारकों में षामिल है। घर, वाहन या अन्य के लिए लिए गए लोन की किश्तें तनाव का कारण बन रही है। आय के साधन सीमित होने की संभावना से तनाव हो रहा है, कुंठा बढ़ रही है। गलाकाट प्रतिस्पर्धा के चलते भविष्य को लेकर अधिक चिंता होने लगी है। व्यक्ति के सोच में बदलाव आने लगा है तो उसकी प्राथमिकताएं भी बदलने लगी है। दरअसल कोरोना ने सामूहिकता के स्थान पर व्यक्तिगतता को बढ़ावा दिया है। जिस एकाकीपन को सजा माना जाता था वह कोरोनाकाल में जीवन रक्षक बन गई है। एक जो सबसे बड़ा कारण बनता जा रहा है वह है नेगेटिवता प्रसार। कोरोना की इस संकट की घड़ी में थोड़ी भी पोजिटिवनेस रहती है तो वह बड़ा संबल होगी।
इंडियन साइक्रेटिक सोसायटी ने अपने अध्ययन में यह पाया है कि लाॅकडाउन मेें ढ़ील के बाद भी लोगों के मन में भविष्य को लेकर अनिश्चितता और चिंता का भाव उन्हें डिप्रेशन की और धकेल रहा है। अप्रेल में किए गए एक सर्वें में शामिल लोगों में 40 फीसदी लोगों को अवसादग्रस्त पाया गया। हो सकता है यह अतिशयोक्तिपूर्ण फीगर हो पर चिंता व विचार का विषय अवश्य है। कोरोना के इस दौर में अब मनोचिकित्सकीय सुविधाओं के विस्तार की अधिक आवश्यकता हो गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की माने तो एक मोटे अनुमान के अनुसार 30 लाख लोगों पर एक मनोचिकित्सक व कुछ मनोवैज्ञानिक है वहीं अमेरिका में 30 लाख लोगों पर 100 मनोचिकित्सक व 300 मनोविज्ञानी है। योरोपीय देशों में भी स्थिति में सुधार है तो दुनिया के देशों में इंग्लैण्ड ने पहल कर के इसके लिए अलग ही मंत्रालय व मंत्री बना दिया है ताकि डिप्रेशन के कारण आत्महत्याओं को रोका जा सके। लोगों की सही तरीके से काउंसलिंग हो सके। कोरोना के हालातों में अब दुनिया के देशों में मनोचिकित्सकों और मनोविज्ञानियों की अधिक आवश्यकता हो गई है और इस दिशा में विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित देषों की सरकारों को ठोस प्रयास करने होंगे।

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