कृषि सुधार अधिनियम ऐतिहासिक ही नहीं बल्कि साहसिक कदम भी है 

अशोक ठाकुर

हरित क्रांति के बाद देश से अन्न संकट क्या समाप्त हुआ | कृषि एवं किसान दोनों ही सरकारों के एजेंडे से बाहर हो गये।देश की अर्थव्यवस्था में भले ही कृषि की भागीदारी लगातार कम होती चली गयी हो या किसानों की आय लगातार घटती चली गयी  परन्तु किसी भी सरकार ने पिछले 55 सालों से उस व्यवस्था को बदलने का साहस नहीं किया। आज के दिन ये महत्वपूर्ण नहीं है कि ये सरकार का ये प्रयास सार्थक होगा अथवा नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि आखिर किसी ने तो एक असफल व्यवस्था को बदलने का साहस किया। अर्थात ये साहस पहले की सरकारों में नहीं था, मैं इस साहसिक कदम के लिए मोदी सरकार को हार्दिक बधाई देता हूँ ।
संसद द्वारा पारित अधिनियमों पर कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों के विरोध एवं आपत्तियाँ केवल राजनीतिक हैं। इन दलों ने पिछले पचपन सालों में सत्ता में रहते हुए किसानों के हितों के लिए कुछ भी नहीं किया। प्रारंभ से ही कांग्रेस ने कानून के नाम पर देश के किसानों को धोखा दिया है । हरित क्रांति के बाद समय-समय पर कृषि सुधार नहीं किये गए जो अत्यंत आवश्यक थे। परिणामस्वरुप  किसानों की आय एवं जीडीपी में कृषि की भागीदारी लगातर गिरती चली गयी। खेती की लागत लगातार बढती चली गयी। आज जब मोदी सरकार कृषि आय को दुगना करने के लिए सुधार कर रही है तो विपक्ष शोर मचा रहा है और किसानों को गुमराह कर रहा है।

सबसे बड़ी तो बात ये है कि 2013 में स्वयं राहुल गांधी ने खुद कहा कि कांग्रेस पार्टी द्वारा शासित 12 राज्य एपीएमसी अधिनियम से फलों और सब्जियों को बाहर कर देंगे और अब वे खुद ही एपीएमसी अधिनियम में बदलाव का विरोध कर रही है । चुनावों के समय, कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में कहा था कि वह एपीएमसी (MSP) अधिनियम को बदल देगी, किसानों के व्यापार पर कोई कर नहीं लगेगा और अंतरराज्यीय व्यापार को बढ़ावा दिया जाएगा। सन 2019 के चुनाव घोषणापत्र में, कांग्रेस ने स्पष्ट रूप से कृषि पर ’वादों के 11 वें बिंदु’ में स्पष्ट रूप से कहा है कि कांग्रेस कृषि उपज बाजार समितियों के अधिनियम को निरस्त करेगी और कृषि उपज में व्यापार को निर्यात और अंतरराज्यीय व्यापार सहित सभी प्रतिबंधों से मुक्त करेगी ।अब, यदि कांग्रेस इन अधिनियमों का विरोध कर रही है, तो उन्हें देश को बताना चाहिए कि उन्होंने अपने घोषणा पत्र में किसानों से झूठ बोला था | अत: कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में जिन कृषि सुधारों के बारे में बात की है, अब राजनैतिक स्वार्थों के चलते अगर उन्हीं कृषि सुधारों का विरोध कर रही है जो अनैतिक है | कांग्रेस को मोदी सरकार के किसानों को सशक्त बनाने के कदमों और किसानों को गुमराह करने से बाज आना चाहिए।

किसानों में यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि कृषि सुधार अधिनियमों के माध्यम से न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी (MSP) प्रणाली को समाप्त करने की योजना है । जबकि MSP पर स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री जी के समय का बनाया गया कानून जो आज भी यथावत है और उसमें कोई बदलाव नहीं किया गया है उल्टा मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में MSP व्यवस्था को मजबूत बनाने का काम किया है और उसे ज्यादा प्रभावी तरीके से लागू किया है यही नहीं 2009-14 के बीच MSP पर, कांग्रेस सरकार के समय में मात्र 1.25 लाख मीट्रिक टन दालों की खरीद की गई थी । जबकि मोदी सरकार ने 2014 से 2019 के बीच 76.85 लाख मीट्रिक टन दालों की खरीद की है । यह 4,962% की वृद्धि है धान और गेहूं की खरीदी भी कांग्रेस शासन के मुकाबले दुगुनी की है यदि MSP पर किसनों को भुगतान की बात करें तो, मोदी सरकार ने पिछले 6 साल में किसानों को 7 लाख करोड़ का भुगतान किया है, जो कि यूपीए सरकार के कार्यकाल के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा है और वह भी सीधा किसानों के खाते में किया गया है जिसके कारण आढ़तियों के शोषण से भी उसको काफी हद तक मुक्ति मिली है।

इसके अलावा मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान, फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी वृद्धि की गई है। यूपीए शासन (2013-14) के दौरान, जहां मसूर की एमएसपी 2,950 रुपये थी, अब यह बढ़कर 5,100 रुपये हो गई है। इसी तरह, उड़द का एमएसपी 4,300 रुपये से बढ़कर 6,000 रुपये हो गया है। इसी तरह मूंग, अरहर, चना और सरसों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में भी भारी वृद्धि की गई है । स्वयं माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी एवं कृषि मंत्री श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बार-बार दोहराया है कि एमएसपी की प्रणाली जारी रहेगी, और कोई बदलाव नहीं किया जाएगा ।

वास्तव में, इन अधिनियमों का MSP और APMC प्रणाली से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है | पहला तो, MSP पर पहले से ही कानून है और न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने के लिए आयोग भी बना है अत: नया कानून बनाने की आवश्यकता नहीं है दूसरा, आज देश में 70 साल के बाद लगातार प्रयास करने के बाबजूद लगभग 7700 मंडियां का ही निर्माण हो पाया है जबकि एक अनुमान के अनुसार देश में आज 42000 मंडियों की आवश्यकता है इसका मतलब लगभग 35000 नयी मंडियों बनाने के जरूरत है जो इन कृषि सुधारों के बाद निजी क्षेत्र के सहयोग से बनना ही संभव हो सकता है | जिसके सरकार ने 1 लाख करोड़ के आत्मनिर्भर भारत कोष की भी घोषणा की है अत: आज देश में मंडियां समाप्त करने के लिए नहीं बल्कि नयी एवं आधुनिक मंडियां बनाने के लिए अधिनियम लाया गया है इस अधिनियम के आने के बाद किसानों की मंडियों का न केवल विस्तार होगा बल्कि किसानों को मंडी कर में लगभग 6 प्रतिशत का लाभ मिलेगा।

विपक्ष के किसी भी सदस्य ने संसद में चर्चा के दौरान अधिनियमों के किसी भी प्रावधान का विरोध नहीं किया | इन कृषि सुधारों के तहत, किसान अब अपनी उपज को बाजार के बाहर बेच सकेंगे और वह भी मंडी कर में छुट के साथ अपनी कीमत पर बेचेगा । अब किसानों को मंडियों से बाहर फसल बेचने पर कोई कर नहीं देना होगा।

आज तक कांग्रेस ने किसानों को सशक्त बनाने के लिए कुछ नहीं किया। केवल एक बार, अपने 55 साल के शासन में, कांग्रेस ने किसानों का कर्ज माफ किया और उसमें भी एक बड़ा घोटाला हुआ। मीडिया रिपोर्ट बताती है कि किसानों को भी इससे कोई फायदा नहीं हुआ। जबकि मोदी सरकार में प्रधान मंत्री किसान सम्मान निधि के तहत, किसानों को अब तक 92,000 करोड़ रुपये से अधिक दिए गए हैं ।2009-10 में UPA के दौरान, कृषि बजट मात्र रुपये 12,000 करोड़ था | जिसे बढ़ाकर माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा रूपये 1.34 लाख करोड़ कर दिया है | मोदी सरकार द्वारा 10,000 नई एफपीओ बनाने पर 6,850 करोड़ खर्च किए जा रहे हैं | कृषि क्षेत्र के लिए आत्मनिर्भर भारत पैकेज के तहत 1 लाख करोड़ खर्च करने की घोषणा की है | किसानों को ऋण उपलब्ध कराने के लिए पिछली सरकार के रूपये 8 लाख करोड़ के मुकाबले मोदी सरकार ने 15 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है | मोदी सरकार ने स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट को लागू कर उत्पादन लागत पर एमएसपी (MSP) को 1.5 गुना तक बढ़ा दिया है जो अब 22 से ज्यादा फसलों पर लागू है | इसके साथ ही प्रधान मंत्री किसान मान-धन के तहत, 60 वर्ष की आयु पूरी करने बाले किसानों को न्यूनतम 3,000 रुपये / माह पेंशन का प्रावधान किया गया है ।
उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम का उदेश्य:-

● किसानों को कानूनी प्रतिबंधों से मुक्त किया जाएगा । किसानों को अब मंडियों में लाइसेंस प्राप्त व्यापारियों को अपनी उपज बेचने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा । सरकारी मंडियों के कर से भी किसानों को मुक्ति मिलेगी |

● किसान अपनी मर्जी का मालिक होगा । उन्हें अन्य स्थानों पर उपज बेचने के विकल्प प्रदान करके उन्हें सशक्त बनाया गया है | अब, किसान लाभकारी कीमतों पर बेचने के अन्य विकल्पों का भी लाभ उठा सकेंगे |

● किसानों को भुगतान सुनिश्चित करने के लिए, एक प्रावधान है कि डिलीवरी की रसीदें, भुगतान की देय राशि का उल्लेख करने के साथ ही उसी दिन किसानों को तुरंत दी जानी होगी

● केंद्र सरकार, किसी भी केंद्रीय संगठन के माध्यम से, किसानों की उपज के लिए मूल्य सूचना और बाजार खुफिया प्रणाली की एक प्रणाली बना सकती है ।

● देश में प्रतिस्पर्धी डिजिटल व्यापार होगा और पूरी पारदर्शिता के साथ काम किया जाएगा |

● अंतत: इसका उद्देश्य किसानों को पारिश्रमिक मूल्य मिलना है ताकि उनकी आय में सुधार हो सके |

मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा पर कृषि (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता अधिनियम का उदेश्य:-

● अनुसंधान और विकास (आर एंड डी) के लिए सहयोग करना |

● उच्च और आधुनिक तकनीकी इनपुट उपलब्ध कराने के लिए अन्य स्थानीय एजेंसियों के साथ साझेदारी विकसित करने में मदद करना |

● अनुबंधित किसानों को सभी प्रकार के कृषि उपकरणों की सुविधाजनक आपूर्ति करना |

● क्रेडिट या नकदी पर गुणवत्ता वाले कृषि उपकरणों की समय पर आपूर्ति सुनिश्चित करना |

● प्रत्येक अनुबंधित किसान से उपज की शीघ्र खरीद/ वितरण सुनिश्चित करना |

● अनुबंधित किसान को नियमित और समय पर भुगतान सुनिश्चित करना |

● सही लॉजिस्टिक सिस्टम बनाए रखना और वैश्विक विपणन मानकों को सुनिश्चित करना |

आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020:-

इस अधिनियम के माध्यम से, कृषि में संपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत किया जाएगा, किसानों को भी सशक्त बनाया जाएगा, और निवेश को प्रोत्साहित किया जाएगा। यह उत्पाद, उत्पाद रेंज, आंदोलन, वितरण और आपूर्ति की स्वतंत्रता प्रदान करेगा और कृषि बिक्री अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में मदद करेगा।

मेरा स्पष्ट मानना है कि उपरोक्त कृषि सुधार अधिनियमों को अगर ईमानदारीपूर्वक लागू किया जाता है तो इससे किसानों का मुनाफा तो बढ़ेगा ही साथ ही साथ किसान सशक्त भी होंगे | उनको अपनी उपज बेचने के लिए नए अवसर मिलेंगे, जिससे उनके मुनाफे में वृद्धि की संभावनाएं बढ़ेंगी । इन कानूनों के आने से कृषि क्षेत्र को आधुनिक तकनीक का लाभ मिलेगा । न्यूनतम समर्थन मूल्य एवं मूल्य स्थितिकरण कोष से सरकारी खरीद यथावत जारी रहने से बाजार नियमन की शक्तियां सरकारों में निहित रहेगी । ये अधिनियम किसानों को उनकी फसलों के भंडारण और बिक्री के लिए तो स्वतंत्रता देंगे ही बल्कि उन्हें बिचौलियों के चंगुल से भी बचायेंगे ।

(लेखक  नेफेड(भारत सरकार) के निदेशक हैं)

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