बदनीयती से नहीं प्यार से आगे बढे

प. दीनदयाल उपाध्याय जयंती पर विशेष

बाल मुकुन्द ओझा

भारतीय जनता पार्टी के पितृपुरुष और आदर्श प. दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था, सहिष्णुता भारतीय संस्कृति का आधार है, लोकतंत्र केवल बहुमत का राज नहीं। उपाध्याय के मुताबिक लोकतंत्र की मुख्यधारा सहिष्णु रही है। इसके बिना चुनाव, विधायिका आदि कुछ भी नहीं है। सहिष्णुता भारतीय संस्कृति का आधार है। उपाध्याय के विचार आज भी सामयिक है। उपाध्याय के असहिष्णुता के मुद्दे पर विचारों का उनके लेखन में कई जगह जिक्र देखने को मिलता है। उन्होंने कहा था, वैदिक सभा और समितियां लोकतंत्र के आधार पर आयोजित की जाती हैं और मध्यकालिन भारत के कई राज्य पूरी तरह से लोकतांत्रिक थे। उन्होंने कहा था, ‘आपने जो कहा मैं उसे नहीं मानता, लेकिन आपके विचारों के अधिकार की मैं आखिरी वक्त तक रक्षा करूंगा। 25 सितम्बर को उपाध्यायजी की जयंती है। इस अवसर पर हम सहिष्णुता पर उनके विचारों की विशद व्याख्या और मंथन कर सहिष्णु समाज का निर्माण कर सकते है। उनके विचारों के अनुयायी सहिष्णुता पर कही उनकी बातों को आत्मसात कर भारत को मजबूत और स्वावलम्बी बनाने के सपने को पूरा करने की महती जिम्मेदारी का निर्वहन करने संकल्प करें तो यह देश की बड़ी सेवा होगी।
देश में इस समय जैसा सियासी वातावरण बन रहा है वह निश्चय ही हमारी एकता, अखंडता और सहिष्णुता पर गहरी चोट पहुँचाने वाला है। इसके लिए कौन दोषी है और कौन निर्दोष है उस पर देशवासियों को गहनता से मंथन करने की जरुरत है। किसान बिल को लेकर जैसा माहौल देश में खड़ा किया गया है उससे हमारी सहिष्णुता एक बार फिर तार तार हुई है। राज्य सभा में हुए हंगामे और उप सभापति के साथ जैसी छीना झपटी हुई उससे हमारी लोकतान्त्रिक प्रणाली और मर्यादा निश्चित रूप से भंग हुई है। पिछले कुछ दिनों में कृषि बिल को लेकर विपक्ष की जो प्रतिक्रिया देखने को मिली है वह लोकतान्त्रिक नहीं कही जा सकती। विपक्ष को कोई आपत्ति है तो स्वस्थ बहस के जरिये सरकार पर हमला करें न की अराजकता और विध्वंश का माहौल उत्पन्न कर देश की सहिष्णुता को ही खत्म करें। सामाजिक चिंतक प्रो कमल कोठरी ने राज्य सभा की कार्यवाही पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा की यह गांधीगिरी थी तो गुंडागर्दी किसको कहते हैं? आप के पास विधेयक रोकने लायक संख्या नहीं थी तो पहले औरों को साथ लेने का प्रयत्न करते, फिर भी नहीं तो कोर्ट जाते, जन-अदालत में जाते। परन्तु कुछ दलों के कुछ सदस्यों को शायद लगता है कि वे ही सब कुछ हैं, उनका चाहा ही होना चाहिए। उनका बहुमत, प्रक्रिया कोई मायने नहीं रखता। अपने बहुमत वाले सदनों में प्रतिपक्ष को संख्या बल के कारण बोलने नहीं देते, स्वयं जहां अल्पमत में हैं वहां हंगामा करते हैं. ऊपर से विक्टिम कार्ड भी खेलेंगे पर जनता ने सब कुछ देखा है। सत्तारूढ़ दल पूर्णत मर्यादित रहा अन्यथा पूर्ण अराजक स्थिति बन जाती।
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों विशेषकर किसानों को विश्वास दिलाया है की किसान बिल में उनके सारे अधिकार सुरक्षित है। भाजपा को चाहिए की वह किसानों के बीच जाये और कहीं भ्रम का वातावरण है तो वह दूर करें। जब से मोदी सरकार आयी है लगता है तभी से अंध विरोध का विपक्ष ने जामा पहन लिया है। सरकार की प्रत्येक बात का अंध विरोध प्रजातान्त्रिक मूल्यों के खिलाफ है। पहले नागरिकता कानून को लेकर और अब किसान बिल को लेकर कुछ स्थानों पर आंदोलन किया जा रहा है। यह आंदोलन शांति और अनुशासन से आगे बढे तो यह लोकतंत्र की जीत कही जाएगी मगर कुछ लोग इसे सियासी दुर्भावना से भटकाए तो यह लोकतंत्र के किए हानिकारक होगा। अब देशवासियों को यह फैसला करना होगा की क्या सही और क्या गलत है।
भारत सदा सर्वदा से प्यार और मोहब्बत से आगे बढ़ा है। हमारा इतिहास इस बात का गवाह है हमने कभी असहिष्णुता को नहीं अपनाया। हमने सदा सहिष्णुता के मार्ग का अनुसरण कर देश को मजबूत बनाया। सहिष्णुता भारतीय जनजीवन का मूलमंत्र है। मगर देखा जा रहा है कि समाज में सहिष्णुता समाप्त होती जारही है और लोग एक दूसरे के खिलाफ विषाक्त वातावरण बना रहे है जिससे हमारी गौरवशाली परम्पराओं के नष्ट होने का खतरा मंडराने लगा है।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार व पत्रकार हैं)

 

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