किसान बिल के बाद उपजे हालात

श्याम सुन्दर जैन

भारत सरकार द्वारा किसानों से जुड़े दो कृषि विधेयकों को लोकसभा और राज्यसभा में पास कर दिया गया है, जिसका व्यापक विरोध हो रहा है। कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य विधेयक 2020 तथा कृषक कीमत आश्वासन और कृषि सेवा का करार विधेयक 2020 हालांकि पास तो हो गए हैं, मगर इसे लेकर देशभर में बवाल मचा हुआ है। इसके पास होने से पहले ही वर्तमान केंद्र सरकार के सहयोगी दल की एक मंत्री के त्याग पत्र की बलि भी लगी प्रतीत हुई है। शिरोमणि अकाली दल, एनडीए में भागीदार भी हैं एवं सबसे पहले सख्त विरोध उनके द्वारा ही किया गया। इसके अलावा ऐसा भी लगता है कि एनडीए में इसे लेकर मतभेद बढ़ सकते हैं। इधर विपक्षी दल भी अपनी ओर से पूरा जोर लगा रहे हैं और हरियाणा के हालातों को देखते हुए तो ऐसा भी लगता है की दुष्यंत चौटाला पर भी इसके लिए दबाव पड़ सकता है कि वह भाजपा का समर्थन बंद करे। चौधरी देवी लाल और उनके परिवार को किसानों का खैर खवाह माना जाता हैं।
शिरोमणि अकाली दल से संबंधित मंत्री हरसिमरत कोर ने इस्तीफा देते हुए यह स्पष्ट कह दिया कि पंजाब में किसान बहुत डरे हुए हैं तथा वह इस बिल को अपने हितों के विपरीत मान रहे हैं। ऐसा ही हरियाणा सहित अन्य कई प्रांतों में भी होता नजर आ रहा है। इस्तीफा देने वाली मंत्री ने तो यहां तक कह दिया है कि किसानों से जुड़े इन बिलों को पारित करने से पहले उनसे कोई सलाह है कि नहीं ली गई और भाजपा ने अपने हिसाब से ही विधेयक का मसौदा बना लिया।
अब यह बात तो सहयोगी पार्टियां जाने की क्या हुआ और कैसे हुआ ? लेकिन यह अवश्य प्रतीत होती है कि विधेयकों को पहले जब अध्यादेश के रूप में लागू किए गए थे, तब से अब तक केंद्र सरकार ने साथी दलों तथा आम जनता के संदेह को दूर करने के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठाए। अब बहुमत के सहारे कानून तो बन गए, मगर कानून पारित हो जाने के साथ ही सरकार के कर्तव्य और जिम्मेदारी की इतिश्री नहीं हो जाती है। जहां मामला आम जनता और विशेष रूप से काश्तकारों से संबंधित हो, वहां ऐसी आवश्यकता है कि जनता को और विशेष रूप से संबंधित लोगों को तो विश्वास में लिया जाना चाहिए था। अब जिस प्रकार विरोध हो रहा है एवं अवज्ञा जैसा माहौल बना हुआ है, ऐसे में सरकार को सोचना पड़ेगा कि अब क्या किया जाए ? विरोध या गतिरोध के लिए विरोधियों पर ही जिम्मेदारी डालना तो उचित होता है और ना ही इस से काम चल सकता है।
एक उल्लेखनीय बिंदु यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद यह कहा है कि किसानों को भ्रमित करने के लिए कई शक्तियां लगी हुई है। यदि ऐसी स्थिति है तो यह सवाल यह भी पैदा होता है कि इन भ्रांतियों और ऐसी शक्तियों को निष्प्रभावी करने के लिए सरकार, सहयोगी दल और उसके मंत्री अभी तक क्या कर रहे हैं ? वो आगे क्यों नहीं आए हैं ? प्रधानमंत्री ने अपनी बात को ट्वीट करके कहा है, पर ऐसी बात और हालातों से किसानों और साथी दलों को यथासमय समझा दिया होता तो आज दृश्य कुछ और ही होता। एक और बात यह भी है कि मात्र यह कह देना काफी नहीं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद की व्यवस्था भविष्य में बनी रहेगी। इस बात का यकीन दिलवाना होगा कि यह विधेयक किसानों को और विकल्प प्रदान कर उन्हें सही मायने में सशक्त करने वाले हैं।
आवश्यकता यह थी कि इस प्रकार के महत्वपूर्ण व क्रांतिकारी परिवर्तन से पहले कम से कम किसान संगठनों व किसानों को तो विश्वास दिलाया जाना जरूरी था। अब आंदोलन चाहे किसी राज्य के किसानों का हो या विपक्षी दलों का हो। सब प्रकार के हालातों की ओर यथोचित ध्यान देना केंद्र सरकार का प्रजातांत्रिक दायित्व बनता है। अच्छा रहता कि सड़कों पर उतरे किसानों की सहानुभूति और विश्वास की चर्चा के बाद यह कानून लाये जाते। हो सकता है इस कानून के दूरगामी अच्छे परिणाम भी सामने आ सकते हैं, मगर इस समय हालात ऐसे हैं कि चारों तरफ संदेह, भय जैसा माहौल है और किसान सड़कों पर उतर चुके हैं। इस प्रकार की स्थिति में आवश्यकता है कि सत्तारूढ़ सरकार हर प्रकार से स्थिति को स्पष्ट करते हुए किसानों को संतुष्ट करने का प्रयास ही नहीं करें, अन्नदाता को पूरा विश्वास दिलवाए।

(लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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