संपदा प्रॉपर्टी क्षेत्र को प्रोत्साहन की आवश्यकता

चन्द्र मेहता

देश के रोजगार सृजन में संपदा प्रॉपर्टी क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। कोरोना संकट के दौरान सर्वाधिक श्रमिकों का पलायन शहरों से ग्रामीण क्षेत्र की ओर संपदा प्रॉपर्टी क्षेत्र से हुआ है। हजारों करोड़ रुपये की निर्माणाधीन परियोजनाओं पर किया गया निवेश गैर निष्पादित संपत्ति में परिवर्तित हो गया है। यही नहीं बैंकों की खस्ता हालत में भी इन संपत्तियों के स्टॉक व बिक्री न होना एक महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रही है। आज सरकार तीन चरण के अनलॉक की घोषणा कर चुकी है लेकिन इन परियोजनाओं की ओर ग्राहकों का रूझान देखने को नहीं मिल रहा है क्योंकि आम नागरिक अर्थव्यवस्था व रोजगार के भविष्य को लेकर आशंकित है। ऐसे हालात में नये निवेश के बारे में सोच नहीं पा रहा है। निश्चित रूप से अंतर्राष्ट्रीय फंड्स का निवेश कुछ परियोजनाओं की ओर आकर्षित हुआ है जिन्हें बहुत कम मूल्य पर संपत्तियां इस समय डवलपर कंपनियां व बैंक मिलकर बेचने का कार्य भी कर रहे हैं ताकि दायित्व से मुक्त हो सके। आज यह क्षेत्र बहुत कठिनाई के दौर से गुजर रहा है तथा इस उद्योग के संदर्भ में अगर बैंक ऋण का पुनर्गठन भी करते हैं तो भी हालात सुधरने वाले नहीं लगते हैं। इसके लिए सरकार को कुछ विशेष वित्तीय प्रोत्साहन की पहल करनी होगी ताकि देश के बैकिंग उद्योग की वित्तीय हालत सुधर सके, हाउसिंग क्षेत्र में गतिशीलता लौट सके तथा ग्रामीण क्षेत्र में पलायन कर चुके लाखों श्रमिक पुनः हाउसिंग निर्माण क्षेत्र की ओर आकर्षित हो सके। इसी संदर्भ में सरकार को सर्वप्रथम हाउसिंग ऋण पर 3 प्रतिशत तक अनुदान की घोषणा करनी चाहिये। सभी हाउसिंग परियोजनाओं के ऋण का पुनर्गठन उदार शर्तों पर करने का निर्देश बैंकों को करना चाहिये। सभी जानते हैं कि हाउसिंग क्षेत्र के साथ देश के सैंकड़ों अन्य उद्योग जुड़े हुए हैं। स्टील इलेक्ट्रीकल्स, इलेक्ट्रिक ड्यूरेबल्स, सेनेटरी फीटिंग, लकड़ी का फर्नीचर, हाउसिंग उपकरण, टाईल्स, प्लास्टिक केबल सभी इस उद्योग से जुड़े हुए हैं।
आज के हालात में बहुत कम संपदा प्रॉपर्टी क्षेत्र के डवलपरों को बैकिंग सुविधा प्राप्त है और जिन्होंने वित्त पोषण किया है वह गैर निष्पादित संपत्ति में परिवर्तित हो गया है। हाउसिंग फाईनेंस कंपनियां भी डवलपरों का वित्त पोषण नहीं करती है हालांकि इनके द्वारा मकान फ्लैट खरीदने वालों का वित्त पोषण अवश्य किया जाता है लेकिन इनकी ब्याज दर व धन की लागत अधिक होने के कारण इन कंपनियों को भी गैर निष्पादित संपत्तियों के साथ वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है खरीददार निवेश बाजार से गायब हो गये हैं। आज हाउसिंग डवलपर कंपनियों में बहुत कम परियोजनायें ऐसी है जिन्हें स्टैंडर्ड एसेट की संज्ञा दी जा सकती है। रिजर्व बैंक ने अभी हाल ही में केवल एक मार्च 2020 को स्टैंडर्ड एसेट की स्थिति वाली संपत्तियों के ही पुनर्गठन की अनुमति ऋण पुनर्गठन के संदर्भ में दी है इससे हाउसिंग डवलपर कंपनियों को लाभ होने की संभावना नहीं है। रिजर्व बैंक ने हालांकि केवी कामथ की अध्यक्षता में एक समिति का गठन करके इस संबंध में नियमों के निर्माण का दायित्व इस समिति के लिए दिया गया है। ऐसे हालात में हालांकि प्रयास तो हो रहा है लेकिन संपूर्ण क्षेत्र के हित में सरकार व रिजर्व बैंक को मिलकर एक वृहत्तर कार्य योजना का निर्माण अवश्य करना चाहिये। सर्वप्रथम स्टैंडर्ड संपत्तियों की संभावना वाली परियोजनाओं पर विचार किया जाना चाहिये ताकि अतिरिक्त वित्तीय प्रोत्साहन उपलब्ध करके ऐसी संभावित परियोजनाओं को स्टैंडर्ड एसेट का रूप दिया जा सके।
सरकार ने नये सिरे से 10000 करोड़ रुपये की धनराशि एनबीएफसी हाउसिंग फाईनेंस कंपनियों के वित्त पोषण हेतु आरक्षित किया है जो नाबार्ड व नेशनल हाउसिंग बैंक के माध्यम से पुर्न वित्त पोषण के रूप में उपलब्ध किया जोगा। यह सभी ऐसी परियोजनायें हैं जिन पर 70 प्रतिशत निर्माण कार्य संपन्न हो चुका है। एक वर्ष पूर्व भी हाउसिंग क्षेत्र के लिए सरकार ने 25000 करोड़ रुपये के वित्तीय सहयोग की घोषणा की थी लेकिन बहुत कुछ उपलब्ध नहीं किया ज सका है क्योंकि ऋण संबंधित नियम व कार्यप्रणाली इतनी जटिल है कि तनावग्रस्त संपत्तियों का वित्त पोषण संभव नहीं हो पाया है। सरकार को इस संबंध में व्यवहारिक स्तर पर उदार नीति का अनुसरण करना होगा। आज ऋण व पुनर्गठन की शर्तों में उदारता लाने का प्रयास किया जाना चाहिये तथा बैकिंग उद्योग की देखरेख में इन परियोजनाओं के क्रियान्वयन को अंतिम रूप दिया जाना चाहिये। ऐसी भी परियोजनायें जिन पर निर्माण का कार्य 30 से 70 प्रतिशत पूरा हो चुका है। इन परियोजनाओं को पूर्णता के लिए वृहत्तर स्तर पर पूंजी व वित्तीय सहयोग की आवश्यकता है।
(लेखक वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार हैं)

 

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