बुनियादी ढांचे के विकास के लिए नजरिया बदलने की जरूरत

चन्द्र मेहता

बुनियादी ढांचे के विकास के प्रति नजरिया बदलने की जरूरत है। हाल ही प्रधानमंत्री ने कहा कि देश के समग्र ढांचागत विकास को नई दिशा देने की आवश्यकता है, ताकि भारत तेजी से आधुनिकता की तरफ बढ़ सके। उन्होंने कहा देश इस पर सौ लाख करोड़ रूपये से अधिक खर्च करने जा रहा है। सरकार का दावा अपनी जगह है लेकिन प्रतिवर्ष 8 लाख करोड़ रुपये के राजकोषीय घाटे व नये कर्ज को देखते हुए सरकार के लिए यह निवेश अपने स्वयं के संसाधनों से किया जाना संभव नहीं है लेकिन यह निवेश व वित्त पोषण देश में मजबूत कॉरपोरेट बॉण्ड बाजार के विकास, विदेशी निवेशकों की भारत के बुनियादी ढांचागत क्षेत्र में निवेश में रूचि पर ही निर्भर करता है। बुनियादी ढांचागत विकास के लिए दीर्घावधि के वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता कम से कम दस से पन्द्रह वर्ष तक की अवधि के लिए होती है और इस कार्य में बैंकों में धन का उपयोग नहीं किया जा सकता है क्योंकि बैंकों के धन की जमा अवधि औसत दो तीन वर्ष की होती है। ऐसे हालात में बैंकों के समक्ष जमा व ऋण का असंतुलन उत्पन्न हो सकता है तथा बुनियादी ढांचागत संपत्तियों के गैर निष्पादित संपत्ति बनने की आशंका हमेशा बनी रहती है। ऐसा हम गत एक दशक के दौरान देख चुके हैं। इसी संदर्भ में बॉण्ड बाजार के विकास के साथ उसमें पारदर्शिता व कुशलता लाने की आवश्यकता है। बैंकों के माध्यम से इसका वित्त पोषण होने से बैंकों के समक्ष संपत्ति दायित्व के असंतुलन की भी संभावना बढ़ने की संभावना है।
आज के हालात में देश को दीर्घावधि के वित्त पोषण के साथ मजबूत कॉरपोरेट बॉण्ड बाजार के विकास की आवश्यकता है ताकि उसके माध्यम से बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं का सहज ही वित्त पोषण संभव हो सके इसके लिए देश के वित्त मंत्रालय व रिजर्व बैंक के साथ-साथ अन्य नियामक संस्थाओं की आवश्यकता है। इसके सहयोग से देश में एक पारदर्शी कॉरपोरेट डेब्ट मार्केट का विकास किया जा सकता है और ऐसे मजबूत कॉरपोरेट डेब्ट मार्केट में विदेशी संस्थागत निवेशकों की रूचि भी बढ़ सकती है। आज देश के बुनियादी ढांचागत विकास के लिए दीर्घावधि के वित्त पोषण की आवश्यकता है और बॉण्ड बाजार से यह संभव हो सकता है। इसके लिए परियोजनाओं को अंतिम रूप देने व उनके बारे में निरंतर पारदर्शिता के साथ जानकारी सुलभ करने की आवश्यकता है ताकि निवेशक इन परियोजनाओं के बारे में अधिक पारदर्शी व गुणवत्ता के साथ जानकारी प्राप्त करके निवेश का निर्णय ले सके। बैंक भी इस बॉण्ड बाजार में निवेश कर सकते हैं अर्थात दीर्घावधि का परियोजनाओं में निवेश करने की बजाय बॉण्ड बाजार में निवेश करके मार्क टू मार्केट के आधार पर अपने वित्तीय तंत्र का प्रबंधन कर सकते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर बॉण्ड की खरीद बिक्री बाजार से कर सकते हैं। ऐसा ही कार्य देश का म्युचुअल फंड उद्योग भी कर सकता है। कॉरपोरेट बॉण्ड बाजार में व्यक्तिगत स्तर पर रिटेल निवेशक भी हिस्सा ले सकते हैं क्योंकि इस बाजार में निश्चित रूप से नकद तरलता का प्रवाह तेजी से बढ़ने की संभावना है तथा निवेशक किसी भी समय अपने निवेश को बेचकर नकद राशि भी प्राप्त कर सकता है। कॉरपोरेट बॉण्ड का जब निर्गम किया जाता है तो इसका निजी स्तर पर आवंटन बड़ी मात्रा में होना चाहिये तथा इसको हेल्ड टू मेच्योरिटी के आधार पर निर्गमित किया जा सकता है लेकिन आवश्यकता के अनुसार तथा वित्तीय बाजार को लचीला बनाने के उद्देश्य से इसमें बदलाव की भी आवश्यकता है तथा इसे क्रेडिट रिस्क हैजिंग उत्पाद के रूप में विकसित किया जा सकता है। निवेशकों व निर्गम करने वाली कंपनियों को डेरिवेटिव उत्पाद के रूप में ब्याज की है। मुद्रा की जोखिम को ध्यान में रखकर इसके विकास का कार्य करना होगा। भारत में इस बाजार के विकास के लिए मार्केट मेकर्स की भी आवश्यकता होगी जैसा सरकारी प्रतिभूतियों के संदर्भ में हमें देखने को मिलता है इसमें कॉरपोरेट बॉण्ड की गुणवत्ता की जानकारी विश्वसनीयता के साथ निवेशकों को प्राप्त हो सकेगी। इसके साथ ही कॉरपोरेट बॉण्ड के संदर्भ में देश को एक समान मूल्यांकन नीति की दिशा में भी आगे बढ़ना होगा।
(लेखक वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार हैं)

 

 

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