पर्यावरण संरक्षण में विद्युत शवदाह गृहों की उपयोगिता

बाल मुकुन्द ओझा

शव को जलाने की परंपरा हिंदु संस्कृति में है। शव जलने में ढेर सारी लकड़ियों का इस्तेमाल होता है। इससे लकड़ियाँ तो अनावश्यक रूप से जलाई ही जाती है ऊपर से प्रदूषण हवा में ही फैलता है। आस-पास खड़े लोगों के फेफड़ों में भी वही प्रदूषित हवा सांसों के द्वारा शरीर में जाती है। पर्यावरण को शुद्ध बनाए रखने और पेड़ों को बचाने की मुहिम के तहत राजस्थान की राजधानी जयपुर में अंतिम संस्कार के लिए 6 सितम्बर से विधुत मोक्षधाम गृह, चांदपोल विधिवत शुरू हो गया है। इसके लिए जयपुर जैन सभा समिति बधाई की पात्र है जिसके अथक प्रयासों से जयपुर नगर निगम ने सञ्चालन का सहमति पत्र दिया। प्रबंध समिति, सर्व समाज विधुत मोक्षधाम गृह ने इसका कार्यभार भी संभाल लिया है। इसके व्यवस्थापक का जिम्मा विजय खंडेलवाल उठा रहे है। मोक्षधाम के प्रमुख कार्यकर्ताओं में सुदीप बगड़ा, आर के सारा, नवीन बिलटीवाला और रवि जैन है। सर्व समाज विधुत मोक्षधाम गृह की प्रबंध समिति के अनुसार स्वेच्छिक राशि से दाह संस्कार की व्यवस्था का प्रावधान किया गया है। दान में दी गई राशि की प्राप्ति रसीद भी दी जाएगी। सर्व समाज समिति के मुताबिक किसी भी ज्वलनशील पदार्थ (घी, चंदन का बुरादा आदि) की इस कार्य में आवश्यकता नहीं होगी। मृत्यु पश्चात तीन वृक्षों को जीवनदान देखकर पुण्य के भागी बनेंगे। परिवार पर्यावरण की सुरक्षा में सहयोगी बनेगा। दाह संस्कार परिवार के सदस्य से अग्नि प्रज्वलित (मशीन का बटन चालू) करवाकर किया जाता है। शवदाह मशीन बिजली व गैस दोनों से चलती है। विद्युत मोक्षधाम गृह मैं दातारों द्वारा दी गई किसी भी वस्तु पर किसी भी व्यक्ति, समाज या संस्था का नाम अंकित नहीं किया जाता है। शव वाहन को विद्युत मोक्षधाम गृह तक लाया जा सकता है आए हुए प्रिय जनों के लिए भी पार्किंग की पूर्ण सुविधा है। प्रबंध समिति ने आशा व्यक्त की है कि शव को दाह संस्कार के लिए मशीन मैं रखने से पूर्व उपस्थित जनों द्वारा हाथ जोड़कर अंतिम विदाई के साथ श्रद्धांजलि देनी चाहिए। दाह संस्कार प्रक्रिया शुरू होने के आधे घंटे पश्चात आए हुए प्रियजनों को विदा किया जा सकता है। समिति ने सर्व समाज के सभी लोगों से अपील की है अपने परिवार, मित्रों व प्रियजनों को विद्युत शवदाह गृह में दाह संस्कार के लिए प्रेरित करें ।
चांदपोल मोक्षधाम गृह में पूर्व में बने विधुत शवदाह गृह की असफलता और लोगों के द्वारा इनका उपयोग न किये जाने के तमाम कारणों को ध्यान में रखते हुए इस बार जयपुर जैन सभा समिति ने नये सिरे से इसका पुनरुद्धार कर इसे सर्व समाज समिति को सौंपा है। सब के सहयोग से एक पड़ाव पूरा किया है। पर अब सबको मिलकर अपने अपने समाज में जागृति लाकर विद्युत शवदाह गृह में दाह संस्कार के लिए प्रेरित करना है। समिति के मुताबिक आज के समय में स्वेच्छा राशि से दाह संस्कार आप सब के सहयोग से बहुत बड़ा कदम है जिसे हम समाज में जागृति के रूप में उपयोगी बना तीन वृक्षों को जीवन दान दे सकते हैं।
.पर्यावरणविदों के अनुसार, अंतिम संस्कार में मानव शरीर को जलाने के लिए लकड़ी का उपयोग इस विश्वास के साथ किया जाता है कि आत्मा को शांति मिल सके, लेकिन वास्तव में यह पर्यावरण के लिए एक खतरा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, पूरे वर्ष भारत में लगभग 50 से 60 मिलियन पेड़ों को अंतिम संस्कार के लिए काटकर जला दिया जाता है। यह लकड़ी जलते समय, दस लाख टन कार्बन डाइ ऑक्साइड गैस का उत्सर्जन भी करती है जो पर्यावरण के लिए अच्छा नहीं है। अंतिम संस्कार की पारंपरिक विधि के दो मुख्य दोष वायु प्रदूषण और वनों की कटाई हैं। इसके अलावा, खुले मैदान में अंतिम संस्कार करने से बड़ी मात्रा में राख उत्पन्न होती हैं, जो बाद में नदियों और जलाशयों, विशेषकर गंगा नदी में प्रवाहित कर दी जाती है, जिससे जल प्रदूषित होता है। इस अंतिम संस्कार की वजह से पर्यावरणीय खतरा उत्पन्न होता है।
पारंपरिक अंतिम संस्कार के लिए लगभग 500-600 किलोग्राम जलाऊ लकड़ी, तीन लीटर केरोसीन और देसी घी की आवश्यकता होती है। रिश्तेदार अंतिम संस्कार के कुछ घंटों के भीतर नश्वर अवशेष ले सकते हैं। बिजली से अंतिम संस्कार करने में, लकड़ियां नहीं जलायी जाती हैं और इससे किसी भी प्रकार की गैस का उत्सर्जन नहीं होता है। यह लकड़ी, केरोसीन आदि जैसे संसाधनों को बचाने में मदद करता है। बिजली शवदाह अंतिम संस्कार करने के लिए सबसे किफायती विकल्प है। बिजली से अंतिम संस्कार का मतलब है कि पेड़, पानी और पर्यावरण जैसे मूल्यवान संसाधनों को बचाया जा सके। शिक्षण संस्थाओं, धर्म गुरुओं, पंडितों के माध्यम से विद्युत शवदाह गृह में अंतिम संस्कार के लिए लोगों को वृहत और जमीनी स्तर पर जागरूक करने की महती आवश्यकता है तभी हम अपने उद्देश्यों में सफल होंगे।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)  

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