गांवों से ही मिलेगी आत्मनिर्भर भारत अभियान को गति

जड़ों की ओर लौटने से ही हासिल होगी हर स्तर पर आत्मनिर्भरता

@ chaltefirte.com               मुजफ्फर नगर। कोविड-19 के दौर में वैश्वीकरण और विश्वग्राम की अवधारणा की कमियां व खामियां खुल कर सामने आ जाने और चीन की चालबाजी व विस्तारवादी नीतियों के कारण सरहद पर बने अशांति के माहौल के बीच भारत सरकार की ओर से जिस आत्मनिर्भर भारत अभियान की शुरूआत की गई है उसके विभिन्न आयामों के बीच एक बात खुलकर सामने आ गई है कि इस अभियान के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को ही देश की आर्थिक प्रगति का इंजन बनाने की जरूरत है। चुंकि भारत की आत्मनिर्भरता को सबसे अधिक नुकसान गांवों की अनदेखी के कारण ही हुआ है लिहाजा अब पहली प्राथमिकता ग्रामीण अर्थव्यस्था को मजबूत करने और पुश्तों से पुरखों द्वारा स्थापित सांस्कृतिक, आर्थिक व व्यावहारिक परंपराओं को दोबारा अपनाते हुए जड़ों की ओर लौटने की होनी चाहिये। भारतीय ग्रामीण व्यवस्था में हर स्तर पर हमेशा ही आत्मनिर्भरता रही है और सीमित संसाधनों का अधिकतम सदुपयोग करके ग्रामवासियों ने रोजगारों का भी सृजन किया है और देश के विकास के आधार को भी मजबूत किया है। लेकिन बीते कुछ दशकों में भारतीय ग्रामीण व्यवस्था, परंपरा व संस्कृति पर जिस तरह से विदेशी कंपनियों ने कब्जा जमाया और उसमें घुसपैठ की उसका नतीजा रहा कि तमाम संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद विदेशी उत्पादों पर भारत की निर्भरता लगातार बढ़ती चली गई। लेकिन अब जिस तरह से आत्मनिर्भर भारत अभियान को गति देने की मुहिम शुरू हुई है और स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता दिये जाने का अभियान चल रहा है उस परिकल्पना को मजबूत आधार देने के लिए बेहद आवश्यक है कि इसका आधार ग्रामीण अर्थव्यवस्था में स्थापित किया जाए।

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति व जनजाति आयोग के अध्यक्ष रह चुके भाजपा के वरिष्ठ प्रवक्ता व पूर्व सांसद डाॅ विजय सोनकर शास्त्री ने सेन्ट्रल इलेक्ट्राॅनिक्स लिमिटेड (सीईएल) के सौजन्य से आत्मनिर्भर भारत अभियान के विषय पर सखा समिति द्वारा आयोजित एक सेमिनार को वीडियो काॅन्फ्रेसिंग के माध्यम से संबोधित करते हुए कहा कि बीते दो-तीन दशकों में विदेशी कंपनियों ने भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बहुत अधिक नुकसान पहुंचाया है जिस पर गंभीर चर्चा की जरूरत है। डाॅ शास्त्री के मुताबिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था हमारे देश की संस्कृति, पर्व त्यौहार और सांस्कृतिक ढ़ांचे से जुड़ी हुई है और जब भारतीय संस्कृति पर प्रहार करते हुए विदेशी कंपनियां द्वारा हमारे पर्व-त्यौहार और संस्कृति में हस्तक्षेप करती हैं तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका सीधा असर पड़ता है। उन्होंने कहा कि चीन की ओर से सीमा पर तनाव पैदा किये जाने के बाद देश के लोगों में चीनी कंपनियों के प्रति अविश्वास और घृणा का माहौल बन गया है और भारत की अखंडता और संप्रभुता पर चीन की ओर से उठाई गई गलत निगाह के नतीजे में डब्ल्यूटीओ के नीति-नियम शिथिल हो रहे हैं जिससे भारत को आत्मनिर्भर बनाने के प्रधानमंत्री के आह्वान के साथ देश के सभी नागरिक पूरी तरह जुड़ गए हैं। अब जाति, भाषा, क्षेत्र व दल की विविधता से आगे बढ़कर देश के हर वर्ग के लोग इस अभियान में अपना योगदान करने के लिए आगे आ रहे हैं जिससे भारत को आपदा के दौर में उज्जवल भविष्य बनाने का अवसर मिल गया है। इस मौके पर यूपी सरकार के पूर्व मंत्री दीपक कुमार, वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार संजय राय, केएल फाउंडेशन के अध्यक्ष कुलदीप शर्मा और समाजसेवी जगदम्बा सिंह ने भी अपने विचार प्रकट किये। संजय राय ने भी डाॅ शास्त्री की ही बातों को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ग्रामीण व्यवस्था में आत्मनिर्भरता की अवधारणा हमेशा से रही है और प्राकृतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक ताने-बाने के साथ संतुष्टि, समृद्धि व परस्पर विकास के मूल मंत्र ने ही भारत की अर्थव्यवस्था को हमेशा मजबूती दी है। लेकिन प्रकृति और संस्कृति से दूर होकर सुविधाभोगी सोच के नतीजे में विदेशी कंपनियों को अपनी जड़ें जमाने और भारत का आर्थिक दोहन करने का मौका मिल गया। लिहाजा आवश्यक है कि दोबारा अपनी जड़ों की ओर लौटा जाए, प्रकृति व संस्कृति से तादात्म्य की कमजोर पड़ चुकी डोर को मजबूत किया जाए ताकि न सिर्फ व्यक्तिगत बल्कि सामाजिक व राष्ट्रीय स्तर पर भी आत्मनिर्भरता हासिल की जा सके।

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