किस बात का हिंदी दिवस !

देवानंद राय

तो आज हिंदी दिवस है ! आज पूरे देश में हिंदी के शान में खूब कसीदे पढ़े जाएंगे,हिंदी के गौरव गान किए जाएंगे और फिर कल कहीं कोई हिंदी बोलता दिख जाए तो यह कह कर आगे निकल जाएंगे कि मेरी हिंदी थोड़ी वीक है,कैन यू स्पीक इन इंग्लिश। इस देश का दुर्भाग्य देखिए कि जिस भाषा में देश की बहुसंख्यक जनता अपने भावों को व्यक्त करती है एक दूसरे से संवाद करती है उस भाषा के प्रति सम्मान हमें याद दिलाना पड़ता है। उस सम्मान को याद दिलाने के लिए हमें हफ्तों पहले से कार्यक्रम शुरू करने पड़ रहे हैं। सामाजिक जागरूकता के नजरिए से यह ठीक है। परंतु सम्मान तो खुद-ब-खुद आता है जैसे तिरंगा को देखते ही हमारा सीना खुद-ब-खुद चौड़ा हो जाता है।जन-गण-मन सुनते ही रोम-रोम पुलकित हो जाता है फिर कोई हिंदी में बात करें तो हंसी क्यों आता है ? इस पर विचार किया जाए। अब तो हिंदी, हिंदी नहीं रही अब वो हिंग्लिश बन चुकी है मतलब सौ में से नब्बे शब्द अंग्रेजी के और दो-चार शब्द हिंदी को जोड़कर बोल दे तो हम मॉडर्न और केवल हिंदी बोलने वाले तो देहाती। हिंदी का दर्द समझना है तो आईएएस का एग्जाम देने वाले से पूछिए कि इस देश जिन्हें देश की प्रशासनिक व्यवस्था संभालने उन्हें हिंदी नहीं अंग्रेजी आनी चाहिए। इस साल के सिविल सर्विस एग्जाम का आंकड़ा उठाकर देख लीजिए आंखें फटी की फटी रह जाएंगे। हिंदी माध्यम से चयनित होने वाले लोगों की संख्या मुट्ठी भर ना होगी। इधर सिविल सेवा का यह हाल है उधर राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषा पर फोकस किया जा रहा है। आखिर किसे बेवकूफ बनाया जा रहा है यह भी सोचने की आवश्यकता है। अधिक सिलेक्शन अंग्रेजी माध्यम के लोगों का ही हो रहा है तो फिर कोई क्यों हिंदी पढ़ना चाहेगा वैसे भी इस साल यूपी बोर्ड में लाखों बच्चे हिंदी में ही फेल हो गए क्या करें जो हिंदी वह बोलते हैं वह खिचड़ी वाली हिंदी कहलाती है थोड़ा छोटे शहरों में चले जाए तो खिचड़ी वाली हिंदी से इंग्लिश हो जाती है और मेट्रो सिटी में भी अंग्रेज अंग्रेजी की अंग्रेजी में नजर आते हैं समस्या यह है कि इस प्रकार का दिवस मना कर हमें क्या लाभ मिल रहा है सरकार ना तो सुन रही है और ना सुनना चाहती है पिछले कुछ सालों से सिविल सेवा में कई बार यह आवाज उठती रही और इस बार भी उठी कि आखिर हिंदी माध्यम के छात्रों के साथ दोयम दर्जे का बर्ताव क्यों हो रहा हैलेकिन कहीं कुछ भी बदलाव नजर नहीं आता जबकि वर्तमान सरकार ने हिंदी भाषा को बढ़ाने का पूरा प्रयास किया है स्वयं प्रधानमंत्री हमेशा हिंदी बोलते नजर आते हैं यहां तक कि वैश्विक मंचों पर भी कई बार में इस भाषा का प्रयोग कर चुके हैं चलिए यह तो बात हुई हिंदी की दुर्दशा की जो वह व्यवस्था द्वारा उत्पन्न हुई है कुछ समस्याएं हिंदी के तथाकथित पंडितों या यूं कहें नए शब्द बनाने वाले भाषाओं में भी है अब अगर किसी को भारत में किसी से पूछे कि क्या आपको चलन प्रहार के बारे में जानते हैं जवाब नहीं में मिलेगा यह निश्चित है पर अगर आप इसी सवाल को बदलकर अगर आप यह पूछे कि क्या आप सर्जिकल स्ट्राइक के बारे में जानते हैं तो देश का हर बच्चा 56 इंच का सीना करके इसके बारे में बतला सकता है अब क्या यह संभव नहीं कि सर्जिकल स्ट्राइक का कोई व्यवहारिक हिंदी अर्थ हो या नया शब्द जोगड़ा जाए वह व्यवहारिक हो ना कि एकदम और व्यवहारिक शब्द जिससे जिससे किसी ने सुना ना हो यह हाल अभी हाल ही में निकले यूपीपीसीएस एग्जाम के रिजल्ट का भी है जिसमें औपबंधिक शब्द का प्रयोग किया गया है अब लोगों को औपबंधिक सूची का मीनिंग खोजने के लिए इंग्लिश डिक्शनरी का प्रयोग करना पड़ रहा है तो जाकर पता चलता है कि यह तो प्रोविजनल होता है जिसके बारे में हर छात्र जानता है कहने का अर्थ यह है कि हिंदी का प्रचार-प्रसार और उपयोग में सरकारी संस्थाएं इतनी कठिन हिंदी का प्रयोग क्यों करती है जो आम जनमानस के समझ से बाहर है यह अब तक समझ नहीं आया अगर हिंदी का अर्थ समझने के लिए अंग्रेजी में उसकी मीनिंग खोजनी पड़े तो यह बताने के लिए काफी है कि हमारा युवा पीढ़ी हिंदी से कोसों दूर हो चुका हैकुछ ऐसे ही मजेदार उदाहरण है यह भी है कि अब अगर आज के समय में कोई आपसे कहे कि क्या आपके पास दत्त है तो चकरा मत जाइएगा अरे भैया यूपीएससी के अनुसार डाटा का हिंदी अनुवाद है यह ऐसे ही सुखद कुछ समझ आया नहीं ना प्लास्टिक को ही उन्होंने शिवभक्त बताया है गोल्डर्स को विशाल गोला फ्री एनर्जी को प्राप्त एवं उर्जा दीमक को बरुथी जैसे शब्दों से नवाजा है2019 की सिविल सेवा परीक्षा में 829 में से मात्र 15 ही चयनित हुए हिंदी माध्यम से यह हिंदी माध्यम की दुर्दशा बताने को काफी है वैसे यह दुर्दशा चार-पांच वर्ष पहले ही शुरू हो चुकी थी वर्ष 2013 में जब सिलेबस में बदला हुआ तभी से हिंदी माध्यम के छात्रों की संख्या में गिरावट आने लगी आंकड़े देखें तो तस्वीरें बिल्कुल साफ हो जाती है जहां वर्ष 2013 में हिंदी माध्यम के सफल अभ्यर्थियों 17% थे जो सिलेबस में बदलाव के बाद 2014 में 2.11% 2015 में 4.28% 2016 में 3.45% तो वहीं 2017 में 4.06% और 2018 में 2.16% से होते हुए 2019 में तो 2% पर ही सिमट गए 543 सदस्य लोकसभा में लगभग 200 सांसद हिंदी भाषी क्षेत्र से आते हैं पर कभी भी वे इस तरह हो रहे भेदभाव पर सवाल नहीं खड़े करते कम से कम देश की संसद को सबसे अधिक सांसद देने वाले उत्तर प्रदेश के सांसदों को तो इस भेदभाव पर बोलना चाहिए हम हर साल कहते हैं 14 सितंबर को हिंदी पर गर्व करें पर कैसे गर्म करें यह नहीं बतलाया जाता जब हिंदी माध्यम के विद्यार्थी का सिलेक्शन रुक जाता है इंटरव्यू से इंटरव्यू में बाहर हो जाते हैं ग्रुप डिस्कशन में बहुत अधिक जानते हुए भी आपको कम आता जाता है तो सिर्फ गर्म करके क्या मिलयही कारण है कि आज हिंदी पर गर्व करने के लिए हमें बताया जाता है और अंग्रेजी सुनते ही 46 लोगों पर रौब वैसे ही जम जाता है यही अंतर है हिंदी रोजगार की भाषा बनने में अभी दूर है समय यह है कि हिंदी की हिंसा को दूर करने का प्रयास किया जाए आखिर सरकारी सिविल सेवा में हिंदी माध्यम के छात्रों को प्रोत्साहित क्यों नहीं करते एक बार प्रोत्साहन देकर तो देखें देखिए किस प्रकार का परिणाम आता है यूपी में एक रोचक पहलू यह भी है कि यहां पर आपको ऐसे भी छात्र मिल जाएंगे जिन्हें अगर चॉइस बेस्ट सब्जेक्ट का विकल्प मिले तो वह हिंदी छोड़ने के को तैयार बैठे हैं खैर चलते-चलते हिंदी दिवस हिंदी पर गर्व करें पर यह भी सोचे कि क्यों हिंदी दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएं।

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