जगत की बेटी कंगना की रगों में है मेवाड़ी खून

फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत से जुड़ी दिलचस्प कहानी

विमलेश शर्मा

फ़िल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत मामले के बाद महाराष्ट्र सरकार खासकर शिवसेना के आंखों की किरकिरी बनी फि़ल्म अभिनेत्री कंगना रणौत जगतश् की बेटी हैं और उसके डीएनए में मेवाड़ी खून हैं। तभी बेख़ौफ़ होकर अकेले शिवसेना जैसी पार्टी और उसके नेताओं को नाकों चने चबाए हुए हैं और इन विवादों के चलते ही देशभर में सबसे अधिक सुर्खियों में हैं। जी हां! जगत की इस बेटी के बारे में ज्यादातर देश को यहीं पता हैं कि कंगना हिमाचल की बेटी हैं पर इससे इतर एक बड़ा सच यह हैं कि कंगना के पूर्वज राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र से उदयपुर से कोई 50 किलोमीटर दूर जगत गांव से उठकर हिमाचल जाकर बस गए थे। यानी कंगना के डीएनए में मेवाड़ हैं और उसकी रगों में महाराणा प्रताप के रणक्षेत्र का खून दौड़ रहा हैं। कंगना मेवाड़ी वीरांगनाओं की तरह शस्त्र थाम अपने विरोधियों से लोहा लेने में जुटी हुई हैं।
कंगना ने ही की थी खोज
जगत वह क्षेत्र हैं जिसे मिनी खुजराहों भी कहा जाता हैं। पुरातन मंदिरों की इस नगरी जगत में मां अम्बिका मंदिर हैं जो कंगना के परिवार की इष्टदेवी हैं। इस इष्टदेवी की खोज स्वयं कंगना ने ही अपनी मां के कहने पर की थी। मां ने कहा था कि उसके स्वप्न में एक बालिका आती हैं वह हमारी इष्टदेवी हैं। कंगना ने समाज के बड़े बुजुर्गों से पूछताछ कर आखिर राजस्थान के उदयपुर के पास जगत में अम्बिका माता की इष्टदेवी के रूप में खोज की। कंगना की जगत स्थित अम्बिका माता के प्रति इतनी श्रद्धा व आस्था हैं कि वे यहां आकर ना केवल अनुष्ठान करवा चुकी हैं बल्कि यहां की ज्योत ले जाकर हिमाचल के धबोई गांव में माता का भव्य मंदिर भी बनवाया हैं। पिछले वर्ष ही धबोई में बने इस मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा करवाने उदयपुर से ही पंडित अलकेश कुमार पंड्या के साथ पंडितों की टीम गई थी। पंड्या ही 15 अक्टूबर 2018 को कंगना को पहली बार जगत लेकर गए थे। अम्बिका माता के पुजारी शंकर गिरी गोस्वामी बताते हैं कि 2019 में भी कंगना पूरे परिवार के साथ आई थी तथा यहां अनुष्ठान भी करवाया था। बेदला के कमलेन्द्र सिंह के अनुसार जगत के पास बेदला और कुरावड़ में रणौत ;राणावतद्ध के आज भी कई परिवार हैं। इस क्षेत्र के लोग इष्टदेवी के रूप में अम्बिका माता को पूजते हैं। कंगना तो स्वयं अनेको बार कह चुकी हैं कि उन्हें लड़ने की शक्ति और साहस माता अम्बिका ही प्रदान करती हैं।
क्यों कहते हैं जगत को मिनी खुजराहों
सरस्वतीए नृत्य भाव में गणपतिए महिषासुर मर्दिनीए नवदुर्गाए वीणाधारिणीए यमए कुबेरए वायुए इन्द्रए वरूणए प्रणय भाव में युगलए अंगड़ाई लेते हुए व दर्पण निहारती नायिकाए शिशु क्रीडाए वादनए नृत्य आकृतियां एवं पूजन सामग्री सजाये रमणी आदि कलात्मक प्रतिमाओं का अचंभित कर देने वाली मूर्तियों का खजाना और आदित्य स्थापत्य कला को अपने में समेटे जगत का अम्बिका मंदिर राजस्थान के मंदिरों की मणिमाला का मोती कहा जा सकता है। मूर्तियों का लालित्यए मुद्राए भावए प्रभावोत्पादकताए आभूषणए अलंकरणए केशविन्यासए वस्त्रों का अंकन और नागर शैली में स्थापत्य का आकर्षण इस शिखरबंद मंदिर को खजुराहो और कोणार्क मंदिरों की श्रृंखला में ला खड़ा करता है। मंदिर के अधिष्ठानए जंघाभागए स्तम्भोंए छतोंए झरोखों एवं देहरी का शिल्प.सौन्दर्य देखते ही बनता है।
प्राचीन शक्तिपीठ
गर्भ गृह की परिक्रमा के लिए सभा मण्डप के दोनों ओर छोटे.छोटे प्रवेश द्वार बनाए गए हैं। गर्भ गृह की विग्रह पट्टिका मूर्तिकला का अद्भुत खजाना है। यहां द्वारपाल के साथ गंगाए यमुनाए सुर.सुंदरीए विद्याधर एवं नृत्यांगनाओं के साथ.साथ देवप्रतिमाओं के अंकन में शिल्पियों का श्रम देखते ही बनता है। गर्भ गृह की देहरी भी अत्यन्त कलात्मक है। गर्भ गृह में प्रधान पीठिका पर अम्बिका माता की प्रतिमा स्थापित है। यहां से प्राप्त प्रतिमाओं के आधार पर इतिहासकारों का मानना है कि यह स्थान पांचवी व छठी शताब्दी में शिव.शक्ति संप्रदाय का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है। इस मंदिर का निर्माण खजुराहो में बने लक्ष्मण मंदिर से पहले करीब 960 ईस्वी के आसपास माना जाता है। मंदिर के स्तम्भों पर उत्कीर्ण लेखों से पता चलता है कि ग्यारहवीं शताब्दी में मेवाड़ के शासक अल्हट ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। धार्मिक महत्व की दृष्टि से यह प्राचीन शक्तिपीठ है। मंदिर को पुरातत्व विभाग के अधीन संरक्षित स्मारक घोषित किया हुआ है।

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